मम अंतर्नाद

मम अंतर्नाद
मेरा एकल ग़ज़ल संग्रह

शनिवार, 18 जनवरी 2020

गीत: बुध्द जैसा ये मना है।





सूर्य ने साँकल बजाई 
पक्षियों ने नीड त्यागे
फिर कोई सन्यास ले
गृह त्याग कर के चल पड़ा है

बुध्द जैसा ये मना है।

रंग केसरिया हुआ है
नभ नवल परिवेश में है
है प्रकृति भी गुनगुनाती
एक नए आवेश में है
एक नया संकल्प ले मन
आज गिरि जैसा तना है

बुध्द जैसा ये मना है।

पूछता है फिर हृदय ये
भक्ति कैसे पाऊँ तेरी
बस रहा हर ओर जब तू
क्यों तुझे पाने में देरी
बंद नयनों के पटल
मस्तिष्क पर अब तू बना है

बुध्द जैसा ये मना है।

टेरता रहता तुम्हारा नाम 
नित जीवन सरीखा
जब हृदय विक्षिप्त सा था
बस तेरा ही मार्ग दीखा
इस तिमिर क्षण में तुम्हारा 
साथ ही संबल बना है

बुध्द जैसा ये मना है।

बुधवार, 8 जनवरी 2020

गीत: बोलो तुमने क्या पाया



दो पल सुलगा कर , 
धुआँ उड़ा कर , 
बोलो तुमने क्या पाया
ये जीवन स्वर्ग सरीखा था 
बर्बाद किया कुछ न पाया

तुमने सोचा भोकाल बना , 
तुम जग भर को भरमाओगे
ये ही पुरुषत्व जतायेगा, 
इससे सम्मान कमाओगे
पर व्यथित हृदय माँ का रोया, 
जब तुमने क्षय, क्षय कर पाया

ये जीवन स्वर्ग सरीखा था 
बर्बाद किया कुछ न पाया
दो पल सुलगा कर , 
धुआँ उड़ा कर , 
बोलो तुमने क्या पाया।

पहला कश था मित्रता हेतु, 
दूसरा तेरी लालसा बना
तीसरा तेरी आदत बन कर
तेरे जीवन का त्रास बना
तुमने ये अद्भुद जीवन
विष की भेंट चढ़ा कर क्या पाया 

ये जीवन स्वर्ग सरीखा था 
बर्बाद किया कुछ न पाया
दो पल सुलगा कर , 
धुआँ उड़ा कर , 
बोलो तुमने क्या पाया।

प्रेयसी तुम्हें समझे युग का 
बस इसी आस में पिये रहे
जग को बहलाने की खातिर
तुम स्वयं नशे में जिये रहे
पर जीवन है अनमोल नशा
इसको उलझा कर क्या पाया

ये जीवन स्वर्ग सरीखा था 
बर्बाद किया कुछ न पाया
दो पल सुलगा कर , 
धुआँ उड़ा कर , 
बोलो तुमने क्या पाया।









मंगलवार, 7 जनवरी 2020

गीत:- उतनी बड़ी व्यथाएँ होंगी



जितनी बड़ी कथाएं होंगी 
उतनी बड़ी व्यथाएं होंगी।

राम राम तब बन पाए जब
मात पिता घर उपवन त्यागे
कृष्ण कृष्ण तब कहलाये जब
छोड़ राज पद हृदय विराजे
ऊँचे शिखरों की भी अपनी
कुछ अनकही सजाएं होंगी,

जितनी बड़ी कथाएं होंगी 
उतनी बड़ी व्यथाएं होंगी।

मिला सभी कुछ जिसे उसे भी
खाली हाथ विदा होना है
और रहे जो हाथ रिक्त 
उन हाथों को जीवन ढोना है
भिन्न अगर है भाग्य सभी के
निश्चित अलग तथायें होंगी

जितनी बड़ी कथाएं होंगी 
उतनी बड़ी व्यथाएं होंगी।

वेदनाएँ जब प्रबल हुई तो
खुद ने खुद को स्वयं संभाला
हर कठिनाई से खुद जूझे
उलझन से भी स्वयं निकाला
अपनी धुन में रहने वालों की
अपनी गाथाएँ होंगी

जितनी बड़ी कथाएं होंगी 
उतनी बड़ी व्यथाएं होंगी।

नई राह पर जो चलते हैं 
वही क्रांति के दिव्य जनक हैं
तप कर कुंदन जो बनते हैं
वही सत्य में सिद्ध कनक हैं
हर नव पथ को चुनने वालों 
की कुछ नई प्रथाएँ होंगी

जितनी बड़ी कथाएं होंगी 
उतनी बड़ी व्यथाएं होंगी।








शुक्रवार, 3 जनवरी 2020

गीत:-नयन चिर नींद मांगे है।



गीत:-नयन चिर नींद मांगे है।


रहे सोए ,न जागें है
नयन चिर नींद मांगे है।

हृदय में अब विषमता है
नयन में भी तरलता है
नही सुनते पटल कुछ भी
भरी रसना गरलता है
सुखद कुछ भी नहीं लगता
दुःखों के भाग जागे हैं

नयन चिर नींद मांगे है।

कलश सब सोम के फूटे
सभी सपने लगे झूठे
अकेलापन हुआ अपना
मेरे अपने थे जब रूठे
यही एक सत्य जीवन का
की तुम बिन हम अभागे है

नयन चिर नींद मांगे है।

बुलाता भाग्य है मुझको
कि गिरि को लाँघना है अब
चले आओ चले आओ
कि नभ को बाँधना है अब
मगर क्यों ये करूं अब मैं
यही एक प्रश्न आगे है

नयन चिर नींद मांगे है।





गीतिका:- रेल की पटरी पे ज़िंदगी



दो समांतर पटरियों पर 
चल रही है जिंदगी
नित नई राहों पे देखो 
ढल रही है जिंदगी।

भूख से तड़पी कहीं तो 
प्यास से बोझिल हुयी
रोज़ पारे की तरह से 
गल रही है जिंदगी।

दोस्तों ने साथ छोड़ा , 
छोड़ कर दुश्मन हुए
बस इसी कारण मुझे अब 
खल रही है जिंदगी।

अनुभवों से सीख कर भी ,
कुछ न हासिल कर सके
देख कर अपनों की फितरत 
जल रही है जिंदगी

रेल की पटरी सी उलझी , 
भिन्न राहों की ललक में
आज खुद को खुद ही देखो 
छल रही है जिंदगी।

दो समांतर पटरियों पर 
चल रही है जिंदगी
नित नई राहों पे देखो 
ढल रही है जिंदगी।