मम अंतर्नाद

मम अंतर्नाद
मेरा एकल ग़ज़ल संग्रह

शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2019

गीत : एक तरफा रिश्ता




भूल जाती हूँ 
कि रिश्ता
एक तरफा है हमारा
और तुमसे मांग उठती हूँ
मैं अक्सर प्यार।

याद है मुझको अभी तक
जुगनुओं की रोशनी में 
हम खड़े थे साथ तेरे ,
थाम तेरा हाँथ
कह रहे थे हम 
वही एक बात
तुम कहीं भी हो
किसी के हो 
हमें न फर्क कोई 
हम सदा से हैं तुम्हारे 
और सदा तक ही रहेंगे
हर तरह से साथ
तुम भी थे स्तब्ध 
पर मुझसे छुड़ा कर हाँथ
तुमने ये कहा था
मैं अकेला ही चला हूँ
और अकेला ही चलूँगा
तुम किसी को थाम लेना
है दुआ मेरी 
करेगा वो भी तुमसे
तुम सरीखा प्यार,


भूल जाती हूँ 
कि रिश्ता
एक तरफा है हमारा
और तुमसे मांग उठती हूँ
मैं अक्सर प्यार।

मान कर आदेश सा
तेरा कहा
मैं चल पड़ी उस ओर
जिसका था न कोई छोर
थाम कर मैं कल्पना में
बस तुम्हारी उंगलियों की पोर
थी उस रात रोयी
फूट कर 
जब तक दिखी न भोर,
चुप हुई फिर सोच कर ये
कोई मुझको देख ना ले
और मेरी लाल आंखों से 
चुरा न पाए
मन का शोर
और कोई पढ़ सके न
रात भर मैंने लिखा जो ग्रंथ
अपने अश्रुओं से
उसमें बसता प्यार,

भूल जाती हूँ 
कि रिश्ता
एक तरफा है हमारा
और तुमसे मांग उठती हूँ
मैं अक्सर प्यार।

तुम गए हो भूल 
वो एक रोज़
जब तुमने छुआ था प्रेम से
अस्तित्व मेरा
भूल थी शायद तुम्हारी 
बचपने में हो गयी थी
और मैं अब तक सिहरती सी
बस तुम्हें ही 
ढूंढने में लग गयी थी
तुम बने थे कृष्ण 
बस एक पल की खातिर
और मैं मीरा सी 
जोगन हो गयी थी
नाम तेरा रट रही थी
स्वांस के संग
बिन अपेक्षाओं के 
भोगन हो गयी थी,
है बहुत मुश्किल 
तुम्हें समझाऊं कैसे
हो गया कैसे 
कहाँ ,कब और इतना
मुझको तुमसे प्यार,

भूल जाती हूँ 
कि रिश्ता
एक तरफा है हमारा
और तुमसे मांग उठती हूँ
मैं अक्सर प्यार।

अब बहुत मुश्किल है
इसको खत्म करना
ये समय के साथ 
जीवट हो गया है
तुम मिलो या न मिलो 
तुम साथ ही हो
इस तरह का अब ये 
जीवन हो गया है
है नहीं कोई अपेक्षा
अब हमारी 
तुम मिलो मुझको 
या कर लो हमसे थोड़ी बात
या पकड़ कर हाँथ मेरा 
ये कहो हमसे कभी तुम
प्रिय चलोगी क्या
वहाँ तक तुम हमारे साथ?
आँख के सम्मुख 
न होकर भी हमारे
तुम हो रहते बस हमारे पास
बोलते तुम कुछ नहीं मुझसे
मगर अब बिन कहे भी
कह ही जाते हो
न जाने कितनी सारी बात।
सोचती हूँ आज
तो लगता है 
मुझको चाहिए था
इस तरह का 
योग और संयोग
ऐसा सतयुगी सा प्यार

भूल जाती हूँ 
कि रिश्ता
एक तरफा है हमारा
और तुमसे मांग उठती हूँ
मैं अक्सर प्यार।












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