मम अंतर्नाद

मम अंतर्नाद
मेरा एकल ग़ज़ल संग्रह

शुक्रवार, 30 अगस्त 2019

सरस्वती वंदना




हे हंसवाहिनी सुन लो तुम,
मेरे मन की बस एक पुकार,
हर अबला को सबला करना,
देकर तुम अपना वरद हाँथ।

कर बांध प्रार्थना करती हूँ,
शिक्षा का मार्ग प्रशश्त करो,
ये शिक्षा नहीं किताबी हो,
अनुभव का मार्ग प्रदत्त करो,
शारदा भवानी सुन लो तुम,
मन आँगन में नित वास करो,
सद्भाव हृदय में रहे सदा,
तुम जग को भाव प्रधान करो,
हे ममतामयी जननी जग में,
तुमको ही करना है प्रकाश,

हे हंसवाहिनी सुन लो तुम,
मेरे मन की बस एक पुकार।

नवयुवकों में नवप्राण भरो,
गाण्डीवों में संधान भरो,
सदमार्ग प्रदर्शित हो उनको,
संकल्पों का वरदान भरो,
त्यागें कलुषित कर्मों को वो,
और राम कृष्ण से हो जाये,
बन श्रवण उठे दायित्व सदा,
ध्रुव बन आकाश चमक जाए,
वे स्वयं बढ़े सच्चे पथ पर,
मित्रों का मार्ग प्रशस्त करें,
जग भर के त्राण हरें सारे,
हृदयों को वो आश्वस्त करें,
संभ्रांत बने ये जग सारा,
फैले अतुलित अनुपम प्रकाश,
सब क्षोभ कलुषता हर जाए,
बस प्रेम भरा हो ये जहान,
सब ज्ञान गंग जल में डूबें,
सबका नित हो निर्मल विकास,

हे हंसवाहिनी सुन लो तुम,
मेरे मन की बस एक पुकार।

साहित्य सदा पोषित हो और,
साहित्यकार अच्छा लिखें,
रचनाओं में सार्थकता हो,
जो भी लिखें सच्चा लिखें,
लेखनी वरण करने वाले,
भी सैन्य योद्धा हो जाएं,
हर बात उजागर जो कर दे,
उस अंशुमान से हो जाएं,
रस छंद युक्त हो रचनाएं,
लेखनी लगे तलवार धार,

हे हंसवाहिनी सुन लो तुम,
मेरे मन की बस एक पुकार।

वेदों से धरती सिंचित हो,
हर ओर ऋचाएं गाती हों,
उपनिषदों की वाणी भी फिर,
जन मानस को सरसाती हो,
रामायण घर घर में गूंजे,
हर घर एक तीरथ धाम बने,
गीता की ज्ञान भरी वाणी,
से कर्मप्रधान समाज बने,
करबद्ध निमंत्रण है तुमको,
बल बुद्धि शक्ति प्रदान करो,
मन को मंदिर सा कर माता,
तुम मन मंदिर में वास करो,
सद्बुद्धि , सदा नवयुवकों में,
विकसति हो कर , कर दे प्रकाश,

हे हंसवाहिनी सुन लो तुम,
मेरे मन की बस एक पुकार।



स्वधा रवींद्र "उत्कर्षिता"



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