तुम्हें पता है
जब तक
तुम मेरे प्रश्नों के उत्तर में
मौन नहीं त्यागते
तब तक
मेरी आँखें अपलक
देखा करती हैं रास्ता
तेरे शब्दो का।
जानता है मेरा हृदय
कि ये जान कर
नहीं करते हो तुम
बस हो ही जाता है,
क्योंकि व्यस्तता के घेरे में ,
तुम्हारे पास सबके लिए
थोड़ा ही सही
पर होता है समय,
देखा है मैने तुम्हें
लोगों के प्रश्नों के उत्तर देते,
उन्हें फ़ोन करते ,
उनके लिए संवेदनशील होते
और अक्सर
उनसे मिलने जाते।
पर न जाने
मेरे ही प्रश्नों का उत्तर
मौन क्यों चुना है तुमने।
जब भी कुछ लिख भेजा है तुम्हें
युगों जितनी प्रतीक्षा करनी पड़ी है मुझे
तुम्हारे एक शब्द को सुनने के लिए
हाँ या यदा कदा नहीं।
पर तुम जानते हो
नहीं होती तुमसे कभी भी
कोई भी शिकायत
क्योंकि मैं जानती हूँ
एक तरफा प्यार
और
अकेले बनाये
रिश्तों की परिणति
ये मौन ही है।
स्वधा रवींद्र "उत्कर्षिता"

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