मम अंतर्नाद

मम अंतर्नाद
मेरा एकल ग़ज़ल संग्रह

शुक्रवार, 20 सितंबर 2019

गीतिका:- कलियाँ भी मुस्काने लगीं।



गीतिका


फड़फड़ा कर पंख सुंदर तितलियां गाने लगीं
और उनको देख कर कलियाँ भी मुस्काने लगीं।

सागरों की ओर बढ़ती एक नदी क्यों रुक गयी
देख कर सागर को शायद वो भी शरमाने लगी।

दौर ऐसा है कि अब खूँ में ज़हर है दौड़ता
इसलिए अब बाग की कोयल भी मुरझाने लगीं।

रौंदता फिर आ गया कोई सभी खुशियां यहाँ
बस इसी आफत से क़िबला रूह डर जाने लगी।

मौसमों की बारिशों में खूब बरसा अम्ल जब
बेटियां भी बारिशों से दोस्त सकुचाने लगीं।

एक कलंदर आके सबके गम करेगा फाख्ता
जब सुना दीवार ने , तो छत भी इतराने लगी।

फड़फड़ा कर पंख सुंदर तितलियां गाने लगीं
और उनको देख कर कलियाँ भी मुस्काने लगीं।

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