मम अंतर्नाद

मम अंतर्नाद
मेरा एकल ग़ज़ल संग्रह

शनिवार, 14 सितंबर 2019

हिंदी मेरी मातृभाषा





जो सुंदर है सरल है और शाश्वत है वो हिंदी है
जो सजती भाल पर माँ भारती के सुर्ख बिंदी है
है जिसमे गद्य की गरिमा है जिसमे पद्य की लाली
बहुत व्यापक ,प्रचुर ,सामर्थ्य से सम्पूर्ण हिंदी है।

ऋचाओं से प्रकट होकर नये नित रंग पाए हैं
मेरी हिंदी ने रंगों से नए धनु फिर बनाये हैं।
वो ले आयी है अल्हड़ सा कबीरा आज दोहों में
है रंगत आज तुलसी की हृदय में घर के कोनों में।
कहीं रसखान बजते हैं कहीं मीरा बुलाती है
कहीं पर सूर के पद संग गोपी मुस्कुराती है।
नरोत्तम ने लिखे जो पद्य अपने ही नरोत्तम पे 
उन्हीं में नाचती राधा किशन के पास आती है।
भरी है भक्ति के रस से ,वो सब धर्मों की हिंदी है
तरी है जो अमर सच से , सनातन सिर्फ हिंदी है


जो सुंदर है सरल है और शाश्वत है वो हिंदी है
बहुत व्यापक ,प्रचुर ,सामर्थ्य से सम्पूर्ण हिंदी है।


अलंकृत है जो रस छंदों से भावों से कलाओं से
निपुण है जो सभी अभिव्यक्तियों में भावनाओं से
है जिसमे प्रेम भी वात्सल्य भी सृंगार भी, भय भी
है जिसमे राग भी,सुर भी ,नवल एक ताल भी ,लय भी 
की जिसको जानने में फिर से सदियां बीत जाती है
गुज़र कर आदि से भक्ति से ये कुछ भिन्न गाती है
इसे सब रीत कहते हैं कि जिसने रीत बदली है
नयी छाया में इसके बाद नई एक बेल निकली है।
की जिसके पुष्प जयशंकर, निराला ,पंत जैसे हैं
महादेवी से जिसके जन्म से कुछ गहरे रिश्ते हैं।
है जिसमें भावनाओं की प्रबलता सिर्फ हिंदी है
है जिसमें वेदनाओं की प्रवणता सिर्फ हिंदी है


जो सुंदर है सरल है और शाश्वत है वो हिंदी है
बहुत व्यापक ,प्रचुर ,सामर्थ्य से सम्पूर्ण हिंदी है।

तिरिस्कृत आज है हिंदी अपने घर के आंगन में
घिरी है आज फिर हिंदी किसी संकीर्ण साधन से
अटल ने जब अटल होकर किया जयघोष हिंदी का
कहीं तब शांत थोड़ा सा हुआ था रोष हिंदी का
चलो हम सब शपथ लें आज माँ का मान जोड़ेंगे
हैं हम सब पुत्र हिंदी के ना माँ का साथ छोड़ेंगे
हैं जिसमे आज भी दिनकर, हृदय को जोड़ने वाला
उसे अब कौन तोड़ेगा जो रस्ते मोड़ने वाला।
है जिसमें सादगी सम्पन्नता वो सिर्फ हिंदी है
है जिसमें आज और रस छंदता वो सिर्फ हिंदी है

जो सुंदर है सरल है और शाश्वत है वो हिंदी है
बहुत व्यापक ,प्रचुर ,सामर्थ्य से सम्पूर्ण हिंदी है।






स्वधा रवींद्र "उत्कर्षिता"



















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