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मम अंतर्नाद
मेरा एकल ग़ज़ल संग्रह
रविवार, 7 फ़रवरी 2021
अवध महोत्सव 2021 में काव्य प्रस्तुति
वो ताजमहल हूँ जो पत्थर का नहीं है
जिसमें है बहता रक्त लाल श्वेत नहीं है
चाहो तो कहीं से भी हमे तोड़ के देखो
दिल ही मिलेगा साथ में पाषाण नहीं है |
गुरुवार, 28 जनवरी 2021
दुनिया गुनगुनाये
चाहते हैं हम अधर सज जाएं,
दुनिया गुनगुनाये|
शब्द हम लिखते नहीं है ,
भाव का पर्याय हैं हम
वेदना जिसमें भरी वो,
प्रश्न एक निरुपाय हैं हम
डाल कर अपनी व्यथाएं
और के हिस्से भला फिर
क्या करेंगे हम किसी की
ज़िंदगी का दंश बन कर
बस यही एक चाह बन कर पुष्प,
राहों को सजाएं
चाहते हैं हम अधर सज जाएं,
दुनिया गुनगुनाये|
हम नहीं शब्दों का
माया जाल बनना चाहते हैं
हम सदा एक गीत बन कर
प्रिय ढलना चाहते हैं
चाहते हैं हों सरल इतने
कि कोई भी समझ ले
और आएं हम जहाँ भी,
आएं ना हम भ्रंश बन कर
जब बजे हम हर व्यथित मन
खिलखिलाए मुस्कुराए
चाहते हैं हम अधर सज जाएं,
दुनिया गुनगुनाये|
बह रहा लावा हृदय में
तप रहा है जिस्म सारा
पर नदी बन कर बहे हैं
थाम हम अपना किनारा
तुम कहो तट तोड़ कर
हम क्यों बने जल प्रलय जैसे
क्या करेंगे हम भला एक
भीषिका के वंश बन कर
चाहते हैं बन भागीरथ
हम सभी को तार जाएं
चाहते हैं हम अधर सज जाएं,
दुनिया गुनगुनाये|
वो ताजमहल हूँ जो पत्थर का नहीं है
जिसमें है बहता रक्त लाल श्वेत नहीं है
चाहो तो कहीं से भी हमे तोड़ के देखो
दिल ही मिलेगा साथ में पाषाण नहीं है |
बुधवार, 30 दिसंबर 2020
गज़ल
1।
बेवफा वो क्या समझ पायेगा मेरे हाल को
जिसने डाला था, पकड़ने मछलियाँ फिर, जाल को |
2।
खत्म हो जाता है सारा वक़्त ही बेकार जब
तब पलट कर देखता है जग बिताए साल को।
3।
जब तलक ज़िंदा था उसकी एक ना जग ने सुनी
मर गया तो अब निकालें , बाल की वो खाल को।
4।
उसने मेरे गर्मी ए एहसास को कह बेवफा
काट डाला जिसपे बैठा था स्वयं उस डाल को।
5।
लूटने वाले ने मुझको आज फिर आवाज़ दी
पर मैं अब पहचानता था भेड़िए की चाल को।
6।
जब दिखे उसको गलत परिणाम अपने प्यार के
हो गयी फिर चुप स्वधा ले मौन की उस ढाल को।
वो ताजमहल हूँ जो पत्थर का नहीं है
जिसमें है बहता रक्त लाल श्वेत नहीं है
चाहो तो कहीं से भी हमे तोड़ के देखो
दिल ही मिलेगा साथ में पाषाण नहीं है |
रविवार, 27 दिसंबर 2020
आज उत्तर प्रदेश महोत्सव की प्रस्तुति
वो ताजमहल हूँ जो पत्थर का नहीं है
जिसमें है बहता रक्त लाल श्वेत नहीं है
चाहो तो कहीं से भी हमे तोड़ के देखो
दिल ही मिलेगा साथ में पाषाण नहीं है |
काव्य पाठ
एक मंचीय प्रस्तुति आप सभी मित्रों के लिए
https://www.facebook.com/104963714483006/posts/234377388208304/
वो ताजमहल हूँ जो पत्थर का नहीं है
जिसमें है बहता रक्त लाल श्वेत नहीं है
चाहो तो कहीं से भी हमे तोड़ के देखो
दिल ही मिलेगा साथ में पाषाण नहीं है |

















