मम अंतर्नाद

मम अंतर्नाद
मेरा एकल ग़ज़ल संग्रह

मंगलवार, 19 नवंबर 2019

गीतिका:- क्यों घबराया करता है



पतझड़ से तू क्यों घबराया करता है
बालों में क्यों रंग लगाया करता है।

इक दिन तो वैसे भी मर ही जाना है
फिर क्यों जीते जी मर जाया करता है।

अनुभव जीवन की अनुपम सच्चाई है
फिर क्यों इन से नयन चुराया करता है।

सुख दुख तो बस आने जाने वाले हैं
फिर क्यों इनसे यूँ घबराया करता है।

इस जीवन के बाद कहाँ पर जाना है
खुद को क्यों ये सोच सताया करता है।

पांच तत्व का मटका एक दिन फूटेगा
फिर क्यों इससे मोह जताया करता है।

पतझड़ से तू क्यों घबराया करता है
बालों में क्यों रंग लगाया करता है।

सोमवार, 11 नवंबर 2019

गीत :-क्या पाया











दो पल सुलगा कर , धुआँ उड़ा कर , 
बोलो तुमने क्या पाया
ये जीवन स्वर्ग सरीखा था 
बर्बाद किया कुछ न पाया

तुमने सोचा भोकाल बना , 
तुम जग भर को भरमाओगे
ये ही पुरुषत्व जतायेगा, 
इससे सम्मान कमाओगे
पर व्यथित हृदय माँ का रोया, 
जब तुमने क्षय, क्षय कर पाया

ये जीवन स्वर्ग सरीखा था 
बर्बाद किया कुछ न पाया
दो पल सुलगा कर , धुआँ उड़ा कर , 
बोलो तुमने क्या पाया।

पहला कश था मित्रता हेतु, 
दूसरा तेरी लालसा बना
तीसरा तेरी आदत बन कर
तेरे जीवन का त्रास बना
तुमने ये अद्भुद जीवन
विष की भेंट चढ़ा कर क्या पाया 

ये जीवन स्वर्ग सरीखा था 
बर्बाद किया कुछ न पाया
दो पल सुलगा कर , धुआँ उड़ा कर , 
बोलो तुमने क्या पाया।

प्रेयसी तुम्हें समझे युग का 
बस इसी आस में पिये रहे
जग को बहलाने की खातिर
तुम स्वयं नशे में जिये रहे
पर जीवन है अनमोल नशा
इसको उलझा कर क्या पाया

ये जीवन स्वर्ग सरीखा था 
बर्बाद किया कुछ न पाया
दो पल सुलगा कर , धुआँ उड़ा कर , 
बोलो तुमने क्या पाया।




स्वधा रवींद्र "उत्कर्षिता"