आलू परवल भिंडी लेलो, लेलो कद्दू लम्बा वाला,
एक अजब से सुर में गाता नित आता है सब्जी वाला.....
बारह सुर से भिन्न स्वरों में अपनी सब्जी बेच रहा है
भरे हुए अपने ठेले को मुस्का करके खेंच रहा है
भाभी काकी, नानी दादी को भाता है ये मतवाला
एक अजब से सुर में गाता नित आता है सब्जी वाला.....
बाँट रहा है हर घर में वो पोषक तत्वों वाला सागर
उसकी थाली में मिलता है केवल मोटा वाला चावल
रूखी सूखी रोटी खा कर, बाँट रहा है स्वस्थ निवाला
एक अजब से सुर में गाता नित आता है सब्जी वाला.....
जाड़ा गर्मी बारिश सह कर सब के घर पहुंचाता सब्जी
उससे ही लेनी तरकारी लगा रहा है हर घर अर्जी
फ्री में मिर्चा धनिया देता देखो कितना है दिलवाला
एक अजब से सुर में गाता नित आता है सब्जी वाला.....
पानी के छीटे दे दे कर, हरा साग ताज़ा रखता है
पूरे दिन ठेला ले घूमे फिर भी कहता "ना थकता है"
घर भर को खुशियाँ देता है, वो मेहनत का ओढ़ दुशाला
एक अजब से सुर में गाता नित आता है सब्जी वाला.....
ज़रा प्यार से बस पूछा था भैया पानी पीना है क्या?
आँखें छलक आयीं थी उसकी, बोला ये भी जीना है क्या
तनिक प्रेम से बह आयी थी, आँखों से अंतर की ज्वाला
एक अजब से सुर में गाता नित आता है सब्जी वाला.....
स्वधा रविंद्र उत्कर्षिता

