मम अंतर्नाद

मम अंतर्नाद
मेरा एकल ग़ज़ल संग्रह

शनिवार, 18 अक्टूबर 2025

बिलरिया मूषक खावे आई

 बिलरिया मूषक खावे आई

मंद मंद मुसकाई
बिलरिया मूषक खावे आई।
भोला मूषक समझ न पावे
बन विलाब की चाल
दौड़ावे मूषक का लेकिन
पकड़े न वो खाल
आगे आगे भागे इंदुर
सोच रहा कित जाई
बिलरिया मूषक खावे आई।
इत उत घूमे समझ न पावे
कैसे और कहां बच जावे
पूरब पच्छिम उत्तर दक्खिन
कितहूँ घूमे ठौर न पावे
देख कोठरी काल कराली
छुप के पैठ लगाई
बिलरिया मूषक खावे आई।
अंधियारे ने भय उपजाया
राम नाम मूषक ने गाया
तन मन भीति त्याग तब भागा
हृदय तार बलम संग लागा
भय भंजन की शरण पहुंच कर
मुसटा बिलरी खाई
बिलरिया मूषक खावे आई।
मगर न अंत मे वो बच पाई
बिलरिया मूषक पेट समाई
बिलरिया फिर न पलट कर आई
बिलरिया अंत बहुत पछताई।

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