मन के घाव संजोये सारे
तब मेरी लेखनी लिख सकी, गीतों में बहते अंगारे
यूँ तो हैं ये अंगारे पर फिर भी ताप अगर हर पाएं
तब ही गीत हमारे गाएं
जब सारा संसार रक्त की नदिया में डूबा जाता हो
तब हम मरहम बना रहे हों, जब जग पीड़ाएं गाता हो
यदि मेरे गीतों के दीपक अंधियारों में कर उजियारा
मृत आशाओं में फिर से कुछ शाश्वत प्राण बीज बो पाएं
तब ही गीत हमारे गाएं
तब ही गीत हमारे गाएं।
जग के हिस्से शूल न आएं, सो अनुभव सब लिख डाले
सबको सोमकलश देकर के, मैंने गरल पिए हैं काले
यदि मेरे गीतों के स्वर, ममता की लोरी बन करके
हौले हौले माथे पर जब इक स्नेहिल चुम्बन दे पाएं
तब ही गीत हमारे गाएं
तब ही गीत हमारे गाएं।
कितनी भी पीड़ा हो मन में अधरों पर मुस्कान सजाए
बन गीतों की राजकुमारी हमने गीत निरंतर गाए
पर तुम मेरे गीतों को अपने अधरों पर तब ही लाना
जब मेरे गीतों के स्वर से उत्सव उल्लासित हो पाएं
तब ही गीत हमारे गाएं
तब ही गीत हमारे गाएं।
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