मम अंतर्नाद

मम अंतर्नाद
मेरा एकल ग़ज़ल संग्रह

शनिवार, 18 अक्टूबर 2025

अम्मा ब्याह नहीं करना है


कारण एक नहीं है सौ हैं
मेरे इस निर्णय के पीछे
पर यह निश्चय है मेरा अब
अम्मा ब्याह नहीं करना है........
रधिया की हालत देखी थी, ब्याह बाद जब घर वो आई
तीन बरस में चार बाल बच्चों में, बचपन वो खो आई
हाथ खिलौने होने थे जब , तब वो बर्तन मांज रही थी
जब स्वप्नों की दुनिया तय थी, तब रातों को जाग रही थी
शिक्षा के प्रकाश को तज कर
जीवन स्याह नहीं करना है
अम्मा ब्याह नहीं करना है........
मुनिया जो पूरे समाज में सुंदरता की इक मिसाल थी
लाश मिली जब उस मुनिया की,जली कटी सी हाय खाल थी
उधड़ी काया के भीतर का, रोम रोम तक जला हुआ था,
अपनों के ही हाथों बेचारी का जीवन छला हुआ था
निर्विरोध हो जल जाऊं मैं
ऐसी चाह नहीं करना है
अम्मा ब्याह नहीं करना है........
सप्तपदी के साथ वचन क्यों किसी और के साथ निभाऊं
तुमने जन्म दिया है अम्मा, तुझ पर ही क्यों न मिट जाऊं
बाबा के सपने अपने कर, दूर गगन तक मैं उड़ जाऊं
जो भी दिया ईश ने , उसके लिए उन्हीं के गुण मैं गाऊँ
चंद नए रिश्तों में बंध
अनमन निर्वाह नहीं करना है
अम्मा ब्याह नहीं करना है........
जग हित की कामना संजो कर, आगे बढ़ना सहज सरल है
किंतु गलत रिश्ते पाने से, बेहतर मुझको आज गरल है
क्यों ढूंढूं इक राज कुंवर मैं, जब खुद रानी बन सकती हूं,
अपनी रक्षा हेतु स्वयं मैं, जब ऐशानी बन सकती हूं
जीवन के इस सरल मार्ग को
अब अवदाह नहीं करना है
अम्मा ब्याह नहीं करना है........

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