मम अंतर्नाद

मम अंतर्नाद
मेरा एकल ग़ज़ल संग्रह

शनिवार, 18 अक्टूबर 2025

देखा है गया

नित नई ढपली नया इक ताल देखा है गया

शाश्वत चीज़ों के सर पर काल देखा है गया।

जिसको पूरी जिंदगी सबने कहा ईमानदार
उसके घर में दूसरों का माल देखा है गया।।
हँस रही थी खिलखिला कर जो कली उस बाग में
उस कली का हाल फिर बेहाल देखा है गया।।
बाँटता जो घूमता सर्टिफिकेट चारित्र्य के
एक रक्कासा के संग फिलहाल देखा है गया।।
ले गए थे वे अनाथालय से कह जिसको परी
उसको उसके घर में ही बदहाल देखा है गया।।
गा रहे हैं राम को कविताई में जो आज कल
संस्कारों से उन्हें कंगाल देखा है गया।।
मंच पर बैठी हैं जो कविताएँ पढ़ने के लिए
अपनी भाषा में उन्हें तंग हाल देखा है गया।।
जो स्वधा कल तक बताती थी बचें सब प्यार से
उसको शिव के प्रेम में खुशहाल देखा है गया।।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आपकी अनमोल प्रतिक्रियाएं