मम अंतर्नाद

मम अंतर्नाद
मेरा एकल ग़ज़ल संग्रह

रविवार, 19 अक्टूबर 2025

दोहे


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तुम तुम हो मैं मैं रहूं, ये थी कल की बात

प्रेम चांदनी में लिपट, एक हुए मन गात।


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सोच समझ सब ख़त्म हो, जब हो मिलन विधान

प्रकृति पुरुष के साथ से , ही होता कल्यान।


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सर पर मटकी प्रेम की, भर निकली ब्रज नार

गोकुल से फिर श्याम ने, खींच लिए सब भार।।


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जड़ता की चादर लिए, सोया रहा फ़कीर

जो मलंग था प्रेम में, वो बन गया कबीर।


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