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तुम तुम हो मैं मैं रहूं, ये थी कल की बात
प्रेम चांदनी में लिपट, एक हुए मन गात।
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सोच समझ सब ख़त्म हो, जब हो मिलन विधान
प्रकृति पुरुष के साथ से , ही होता कल्यान।
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सर पर मटकी प्रेम की, भर निकली ब्रज नार
गोकुल से फिर श्याम ने, खींच लिए सब भार।।
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जड़ता की चादर लिए, सोया रहा फ़कीर
जो मलंग था प्रेम में, वो बन गया कबीर।
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