मम अंतर्नाद

मम अंतर्नाद
मेरा एकल ग़ज़ल संग्रह

बुधवार, 30 दिसंबर 2020

गज़ल

 1।

बेवफा वो क्या समझ पायेगा मेरे हाल को 

जिसने डाला था, पकड़ने मछलियाँ फिर, जाल को |

2।

खत्म हो जाता है सारा वक़्त ही बेकार जब

तब पलट कर  देखता है जग बिताए साल को।

3।

जब तलक ज़िंदा था उसकी एक ना जग ने सुनी

मर गया तो अब निकालें , बाल की वो खाल को।

4।

उसने मेरे गर्मी ए एहसास को कह बेवफा

काट डाला जिसपे बैठा था स्वयं उस डाल को।

5।

लूटने वाले ने मुझको आज फिर आवाज़ दी

पर मैं अब  पहचानता था भेड़िए की चाल को।

6।

जब दिखे उसको गलत परिणाम अपने प्यार के 

हो गयी फिर चुप स्वधा ले मौन की उस ढाल को।

रविवार, 27 दिसंबर 2020

आज उत्तर प्रदेश महोत्सव की प्रस्तुति


 

काव्य पाठ

एक मंचीय प्रस्तुति आप सभी मित्रों के लिए



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शनिवार, 26 दिसंबर 2020

भारत का किसान


 

सर पर घनी धूप पाँवों में मिटटी का जेवर धारे

जेठ दोपहरी , लू के थपेड़े जिसको रोज़ रोज़ मारे

स्वेद बिन्दुओं से भीगा तन मन वेदना संजोये है

भारत का किसान , खुद भूखा, बिन आँसू के रोये हैं |

 

बंजर में हरियाली लाते लाते, प्रस्तर बन जाता

बाँट रहा रोटी जो जग को , थाली भूख सजा लाता  

मांग रहा है भीख आज, जीवन सबको देने वाला

आंतों की मरोड़ को, अमृत अन्न दान देने वाला।

धरतीपुत्र, लिपट धरती से बीज धरा में बोये है

 

भारत का किसान , खुद भूखा, बिन आँसू के रोये हैं |

 

हुए बड़े दयनीय गांव जब शहरों ने पहने जेवर

रोते रहे किसान दिखाए व्यापारी ने जब तेवर

लटका पुनः पेड़ पर देखा, जग ने फिर एक मतवाला

अन्न नहीं था खुद खाने को , बाँट रहा था  हलवाला

उसके अपने बच्चे देखो बिन खाए ही सोये हैं

 

भारत का किसान , खुद भूखा, बिन आँसू के रोये हैं |

 

तन की काया झुलस गई है, मन रोया अकुलाया है

शासन के गलियारों को वो , आंसू से धो आया है

मांग रहा है हक वो अपना, कोई नहीं सुनने वाला

सत्ता के कानों में झूल रहा है एक बड़का ताला

चिल्ला कर थक गया  सपन सब उसके देखो खोये हैं

 

भारत का किसान , खुद भूखा, बिन आँसू के रोये हैं |

 

कितने ही पर्याय हैं उसके , क्या क्या है वो कहलाता

कभी बना भगवान् , कभी है विद्रोही वो कहलाता

जब तक हरे क्षुधा लोगों की , तब तक है सम्मान बड़ा

हक़ मांगे लेकिन अपना तो देश द्रोही है बन जाता  

अपने हाथों से बरसों से अपनी लाशें ढोयें हैं  

 

भारत का किसान , खुद भूखा, बिन आँसू के रोये हैं |

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

गुरुवार, 24 दिसंबर 2020

प्रथम भारतीय क्रिकेट कप्तान शांता रंगा जी के लिए




तितली थी, पर बन के शेरनी, मैदानों पर छाई है

हाथ लिए बल्ला और कंदुक सबके मन को भाई है


उन्नीस सौ चौवन में जन्मी चेहरे पर उत्साह लिए

बचपन से ही मन मे अपने सपनों का आकाश लिए

वो था करना, जो कोई भी ,कभी नहीं था कर पाया

भय का एक अंश भी इनके हिस्से कभी नहीं आया

चेहरे पर ही लिखा था इतिहास बनाने आयी हैं


तितली थी पर बन के शेरनी मैदानों पर छाई है।


हरे भरे मैदान में जब वो बल्ला लेकर आती हैं

पिच पे अपने पैर जमा वो अंगद सी डट जाती हैं

बड़ा कठिन था उनका  फिर बिन लक्ष्य भेद वापस आना

कर दिखलाती थी वो सब कुछ जो भी था उनने ठाना

भारत माँ की इस बेटी की सबने कथा सुनाई है


तितली थी पर बन के शेरनी मैदानों पर छाई है।


सोलह टेस्ट मैचों में औसत सात सौ रन की पारी है

एकदिवस वाले मैचों में भी ये सबपर भारी है

हरफन मौला लोग सदा से ही इनको बतलाते हैं

कैप्टनशिप में कोई न इन सा ये भी राग सुनाते हैं

चेन्नई की बाघिनी शत्रु सेना पर फिर गुर्राई है


तितली थी पर बन के शेरनी मैदानों पर छाई है।


पूरा जीवन किया समर्पित शांता ने मैदानों को

नीले रंग के पंख लगा चिड़िया उड़ गई ठिकानों को

बैट बाल पिच विकेट बन गए आभूषण सज जाने को

रंगा अब तैयार खड़ी थी नई राह बढ़ जाने को

ले संन्यास क्रिकेट दुनिया से , अब वो फिर मुस्काई हैं


तितली थी पर बन के शेरनी मैदानों पर छाई है।


पूरा जीवन किया समर्पित भारत माँ के चरणों में

रंगा ने रंग दिया भाल माँ का अपने ही करणों से

मिले अवार्ड न जाने कितने, कितनों ने सम्मान किया

भारत माँ की इस बेटी ने सकल विश्व मे नाम किया

बढ़ा मां भारत माँ का ये बिटिया शीश झुकाई है


तितली थी पर बन के शेरनी मैदानों पर छाई है।

तितली थी, पर बन के शेरनी, मैदानों पर छाई है

हाथ लिए बल्ला और कंदुक सबके मन को भाई है