मम अंतर्नाद
मेरा एकल ग़ज़ल संग्रह
मंगलवार, 8 जून 2021
भारत और वोल्गा
वो ताजमहल हूँ जो पत्थर का नहीं है
जिसमें है बहता रक्त लाल श्वेत नहीं है
चाहो तो कहीं से भी हमे तोड़ के देखो
दिल ही मिलेगा साथ में पाषाण नहीं है |
सोमवार, 7 जून 2021
हमें आकर सुलाओ
व्योम से तारों उतर आओ हमें आकर सुलाओ।
डाल के हर घोंसले में आज फैली है निराशा
हो गयी आशाएं बंजर, छा गया जैसे कुहासा
कष्टकारी हो गए दिन, रात्रि बेकल हो रही है
मृत्यु फैली है चतुर्दिश, सृष्टि सारी रो रही है
आओ अब हे देव आशा का नवल दीपक जलाओ
व्योम से तारों उतर आओ हमें आकर सुलाओ।
स्वप्न में भी कालिमा आ कर मुझे है अब डराती
स्वांस की लय तोड़ देती ताल धड़कन की मिटाती
ओज के स्वर , कांति अपनी त्याग कर बनते रुदाली
दूर हों विपदायें बस इस हेतु बजती आज थाली
पूर्व की तरह धमक पर तश्तरी सोहर सुनाओ
व्योम से तारों उतर आओ हमें आकर सुलाओ।
इस विफलता की घड़ी में किस तरह हों बंद पलकें
देख कर जलती चिताएं अश्रु भी अविराम छलकें
काल से अब नित्य ही हम चार आँखें कर रहे हैं
अब निलय ,आलिंद मन के रोज़ ही तो मर रहे हैं
आओ फिर विकराल अपना रूप धर गीता सुनाओ
व्योम से तारों उतर आओ हमें आकर सुलाओ।
वो ताजमहल हूँ जो पत्थर का नहीं है
जिसमें है बहता रक्त लाल श्वेत नहीं है
चाहो तो कहीं से भी हमे तोड़ के देखो
दिल ही मिलेगा साथ में पाषाण नहीं है |
पर्यावरण दिवस पर
लड़ रहीं उल्काएं
पुच्छल टूटता चहुँ ओर
रो रही आकाश गंगा
सृष्टि करती शोर ।
पूछती नदियाँ बताओ
क्या हुई है भूल
क्यों चुभोते हो हमें तुम
कीच वाले शूल
क्यों सभी अपशिष्ट अपने
तुम मिलाते हो
क्यों भला शैवलिनी में
शव बहाते हो
कह रही व्याकुल निमग्ना
है यही हर ओर
पाप करके पाप धुलने
आ रहे फिर चोर
लड़ रहीं उल्काएं
....................
सृष्टि करती शोर।
बादलों में भी धुएं के
अंश भारी है
लग रहा है रात की
दिन में तैयारी है
धुन्ध है आकाश पर
उद्विग्न मलयानिल
ले अवांक्षित बह रही
विमनस्क , खिन्न, अनिल
पूछती आकाश से
यह क्या हुआ हर ओर
सूर्य है आकाश पर
फिर क्यों न आई भोर?
लड़ रहीं उल्काएं
....................
सृष्टि करती शोर।
भीड़ है कोलाहलों की
अब किधर जाएं
कौन से कोने में जा कर
शांति सुख पाएं
कान कर लें बंद या
या फिर बोलना रोकें
जो गलत करने लगे
कैसे उन्हें टोकें
पूछती स्वर ग्रंथिंयाँ
कैसे मिटायें शोर
हम प्रकृति के पुत्र
बैठे दुःख लिए घनघोर
लड़ रहीं उल्काएं
....................
सृष्टि करती शोर।
यदि नहीं हमने बचाया
उर्वरा फिर खुद करेगी
किंतु तब हर पाप का
परिणाम मानवता भरेगी
फिर प्रलय के अंश होंगे
आँख के सम्मुख हमारे
मृत्यु फिर तांडव करेगी
जाएंगे कितने ही मारे
फिर नहीं चल पाएगा
अपना प्रकृति पर ज़ोर
काल के तम में घिरेंगे
खत्म जीवन डोर
लड़ रहीं उल्काएं
....................
सृष्टि करती शोर।
वो ताजमहल हूँ जो पत्थर का नहीं है
जिसमें है बहता रक्त लाल श्वेत नहीं है
चाहो तो कहीं से भी हमे तोड़ के देखो
दिल ही मिलेगा साथ में पाषाण नहीं है |

