मम अंतर्नाद

मम अंतर्नाद
मेरा एकल ग़ज़ल संग्रह

मंगलवार, 8 जून 2021

भारत और वोल्गा

यह भारत के एक पुत्र भारत की कहानी है, जो अपने पारिवारिक दायित्वों की पूर्ति के लिए निकल पड़ा है....



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ऐसा लगता है जैसे पानी मे जाकर क्षीर मिला है
आज वोल्गा के जल में फिर से गंगा का नीर मिला है।

भारत खड़ा वोल्गा तट पर अपने मन को खोल रहा है
अधर हुए हैं मौन किंतु आंखों से अपनी बोल रहा है
बोल रहा है मन की बातें जो वो माँ से कह लेता था
बाबा थे जब साथ, बड़ी हिम्मत से सबकुछ सह लेता था
आकुल चिंतित भारत का मन फिर से आज अधीर मिला है

आज वोल्गा के जल में फिर से गंगा का नीर मिला है।

माई वहाँ विकल है तो वो भी विदेश में ना सोता है
बड़ा हो गया तन से लेकिन , एकाकीपन में रोता है
बाबा वाले ऋण की किश्तें दूर देश तक ले आई है
उसे ब्याहनी हैं दो बहनें, चिंता यह मन में छाई है
विषमताओं की धारों में भी, भारत सदा सुधीर मिला है

आज वोल्गा के जल में फिर से गंगा का नीर मिला है।

फ्लैट बड़ा है सुख सुविधाएं भी सारी उसके अंदर हैं
लेकिन आँगन नहीं कहीं भी, दिखता नहीं उसे अम्बर है
ए सी वाली हवा उसे, जानें क्यों ताने मार रही है
ठंडी है पुरवाई से वो ,फिर भी देखो हार रही है
उसको तो यादों में उसकी बहता हुआ समीर मिला है

आज वोल्गा के जल में फिर से गंगा का नीर मिला है।

रोटी की तलाश भारत को ,भारत माँ से दूर ले गयी
कोने कटी हुई वो चिट्ठी , चेहरे का सब नूर ले गयी
बाबा की चिंताओं ने फिर मन की सांकल खड़काई थी
अम्मा की अस्वस्थ निगाहें , भय का कारण बन आई थी
अनसुलझे प्रश्नों का जमघट, व्याकुल मन के तीर मिला है

आज वोल्गा के जल में फिर से गंगा का नीर मिला है।

जब भी हुआ निराश ढूँढता अपनों को मेरे तट आया
शायद मेरे जल में उसने अपनी माँ गंगा को पाया
अपने हित पूरे करने को लोग वोल्गा तक आते है 
और यहाँ के हुए अगर तो सिर्फ यहीं के हो जाते हैं
लेकिन भारत के बेटों में मुझको सदा फ़कीर मिला है

आज वोल्गा के जल में फिर से गंगा का नीर मिला है।


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स्वधा रवींद्र 'उत्कर्षिता'











सोमवार, 7 जून 2021

हमें आकर सुलाओ


नींद आंखों में नहीं है , आओ लोरी गुनगुनाओ

व्योम से तारों उतर आओ हमें आकर सुलाओ।


डाल के हर घोंसले में आज फैली है निराशा

हो गयी आशाएं बंजर, छा गया जैसे कुहासा

कष्टकारी हो गए दिन, रात्रि बेकल हो रही है

मृत्यु फैली है चतुर्दिश, सृष्टि सारी रो रही है

आओ अब हे देव आशा का नवल दीपक जलाओ


व्योम से तारों उतर आओ हमें आकर सुलाओ।


स्वप्न में भी कालिमा आ कर मुझे है अब डराती

स्वांस की लय तोड़ देती ताल धड़कन की मिटाती

ओज के स्वर , कांति अपनी त्याग कर बनते रुदाली

दूर हों विपदायें बस इस हेतु बजती आज थाली

पूर्व की तरह धमक पर तश्तरी सोहर सुनाओ


व्योम से तारों उतर आओ हमें आकर सुलाओ।


इस विफलता की घड़ी में किस तरह हों बंद पलकें

देख कर जलती चिताएं अश्रु भी अविराम छलकें

काल से अब नित्य ही हम चार आँखें कर रहे हैं

अब निलय ,आलिंद मन के रोज़ ही तो मर रहे हैं

आओ फिर विकराल अपना रूप धर गीता सुनाओ


व्योम से तारों उतर आओ हमें आकर सुलाओ।

पर्यावरण दिवस पर


 लड़ रहीं उल्काएं 

पुच्छल टूटता चहुँ ओर

रो रही आकाश गंगा

सृष्टि करती शोर ।


पूछती नदियाँ बताओ 

क्या हुई है भूल

क्यों चुभोते हो हमें तुम

कीच वाले शूल

क्यों सभी अपशिष्ट अपने

तुम मिलाते हो

क्यों भला शैवलिनी में

शव बहाते हो

कह रही व्याकुल निमग्ना

है यही हर ओर

पाप करके पाप धुलने

आ रहे फिर चोर


लड़ रहीं उल्काएं 

....................

सृष्टि करती शोर।


बादलों में भी धुएं के

अंश भारी है

लग रहा है रात की 

दिन में तैयारी है

धुन्ध है आकाश पर

उद्विग्न मलयानिल

ले अवांक्षित बह रही

विमनस्क , खिन्न, अनिल

पूछती आकाश से

यह क्या हुआ हर ओर

सूर्य है आकाश पर

फिर क्यों न आई भोर?


लड़ रहीं उल्काएं 

....................

सृष्टि करती शोर।


भीड़ है कोलाहलों की

अब किधर जाएं

कौन से कोने में जा कर 

शांति सुख पाएं

कान कर लें बंद या

या फिर बोलना रोकें

जो गलत करने लगे

कैसे उन्हें टोकें

पूछती स्वर ग्रंथिंयाँ

कैसे मिटायें शोर

हम प्रकृति के पुत्र 

बैठे दुःख लिए घनघोर


लड़ रहीं उल्काएं 

....................

सृष्टि करती शोर।


यदि नहीं हमने बचाया

उर्वरा फिर खुद करेगी

किंतु तब हर पाप का 

परिणाम मानवता भरेगी

फिर प्रलय के अंश होंगे

आँख के सम्मुख हमारे

मृत्यु फिर तांडव करेगी

जाएंगे कितने ही मारे

फिर नहीं चल पाएगा

अपना प्रकृति पर ज़ोर

काल के तम में घिरेंगे

खत्म जीवन डोर


लड़ रहीं उल्काएं 

....................

सृष्टि करती शोर।