मम अंतर्नाद

मम अंतर्नाद
मेरा एकल ग़ज़ल संग्रह

रविवार, 6 अक्टूबर 2019

छन्दमुक्त :जाल



देखी है मैने
दीवारों पर 
लगे जालों के 
जंजालों के पीछे
छिपे 
मकड़ों की परछाईयाँ
कुछ मृत
जालों को बिनते बिनते
उसमें ही उलझ कर
सो गए
कुछ जीवित 
निरंतर अपने लिए 
जाले पर जाले बिनते
इस असत्य में खो गए,
और कुछ
जाले के पीछे से
अनिमेष 
मौन
नैनों से निहारते।

शायद उनके 
अनकहे शब्दों में
जाले से 
निकलने की
प्यास थी
और इस क्षणभंगुर
संसार को छोड़
उस जगत नियंता से 
मिलने की आस थी।





रात भर 
तेरी ही आवाज़ 
कान में गूंजी
रात भर 
सपनों में बस 
तुम ही तुम
आबाद रहे
सोच लो 
किस तरह से 
रूह में शामिल थे तुम
सोच लो किस तरह से 
हममे सुबह शाम रहे
तुम कहीं भी रहो
पर जान लो तुम 
ये सच भी
तुम कहीं रह के भी 
बस सिर्फ
मेरे पास रहे।

शनिवार, 5 अक्टूबर 2019

गीत: खो गयी पहचान मेरी



तुम गए क्या खो गया सब ,खो गयी पहचान मेरी।

साथ थे तुम तो मुझे पहचान देते थे हमारी
नाम लाखों देके मुझ पे तुम हुए जाते थे वारी
में कभी गुड़िया कभी गुड्डन कभी बिट्टन बनी थी
और मेरे तात तुमने ,परियों से तुलना करी थी
तुम मुझे सर का मुकुट अपना बताते थे सभी को
और कोयल कह के भी अक्सर बुलाते थे मुझी को
बस तुम्हारे ये दिए कुछ नाम थे पहचान मेरी

तुम गए क्या खो गया सब ,खो गयी पहचान मेरी।

जब वो पहली बार माँ की ओढ़नी मैने थी ओढ़ी
सीने से मुझको लगा कर रोई थी तब आँख थोड़ी
पोछ कर आंसू कहा था तुमने तू मेरी अली है
जाने इतनी तीव्रता से किस तरह तू बढ़ रही है
तू ना होती तो हमारे घर में उजियारा ना होता
तू ना होती तो हमें कोई कभी प्यारा ना होता
बस तुम्हारा प्रेम ही था बन गया पहचान मेरी

तुम गए क्या खो गया सब ,खो गयी पहचान मेरी।

याद है मुझको अभी भी में बहुत तुमसे लड़ी थी
गाय कह  कर क्यों बुलाया, मुझमे ऐसी क्या कमी थी
तब बिठा कर गोद में तुमने कहा था तू भली है
मेरे घर में तू जब आयी दूध की नदियां बही हैं
तेरे आने से उजाला और सुख समृद्धि आयी
तू नही थी कुछ नहीं था तू हंसी उल्लास लायी
बस तुम्हारे वो विशेषण बन गए पहचान मेरी

तुम गए क्या खो गया सब, खो गयी पहचान मेरी।

मैं ही रंगों की थी होली मैं ही दीपों की दिवाली
मैं सेवइयां ईद की थी मैं ही तेरी पूजा थाली
तुम मुझे जब चाँद दिखलाते थे तो ये बोलते थे
चाँद से ज़्यादा वज़न देकर मुझे तुम तौलते थे
सूर्य की आभा हमीं थे और हम ही चाँद तारे
सुख सभी अपने हमें दे, दुख लिए थे मेरे सारे
बस तुम्हारे त्याग सारे बन गए पहचान मेरी

तुम गए क्या खो गया सब, खो गयी पहचान मेरी।

लौट आओ तात तुम बिन हाँथ खाली हैं हमारे
तुम थे जब तक साथ पूरे स्वप्न होते थे हमारे
जो भी चाहा बिन कहे ही तुमने मुझको दे दिया था
और मैं उपहार तुमको ईश का ये कह दिया था
भोग का पहला निवाला तुम मुझे ही थे खिलाते
तुम मुझे शक्ति थे कहते और स्वधा कह कर बुलाते
बस तेरा विश्वास मुझ पर बन गया पहचान मेरी

तुम गए क्या खो गया सब, खो गयी पहचान मेरी।


छन्दमुक्त: एक दिन की छुट्टी





फिर वही सुबह
फिर वही आरोप प्रत्यारोप
क्यों नहीं बताया
की आज 
विश्राम दिवस है तुम्हारा
क्या सब अपनी मर्ज़ी से ही
करने का इरादा है तुम्हारा
और तो और
बुला ली सखी सहेलियां
तान ली चादरें
बना ली अपने और उनके लिए 
पकौड़ियां
Tv पर अपनी मर्ज़ी का 
चेनल भी लगा लिया
पूरे घर को 
अपने कब्जे में जमा लिया
लगता है पहले से सोच लिया था
जो मन आएगा कर लोगी
बिना मुझे पूछे
सहेलियों से अपना घर भर लोगी।
मुझे बताना
आवश्यक नहीं था
मेरी ज़रूरतों का कोई भी 
मानक नहीं था।
कल से मैं भी परेशान था
एक दिन घर मे रुक जाने का 
मेरा भी आज का ही प्लान था।

रोज़ आफिस 
जा जा के 
थक जाता हूँ
बॉस की बड़ी जी हुज़ूरी करता हूँ 
तब कहीं एक छुट्टी पाता हूँ।
तुम्हारा क्या है
कभी भी छुट्टी ले लेना,
और अगर आज ही ज़रूरी है
तो प्रोग्राम 
अपनी किसी दोस्त के वहां रख लेना।
वो स्तब्ध 
अपलक देखे जा रही थी,
पुरुष के अनावश्यक लिए अधिकार को
और सुन रही थी
ताने और यादकदा घटी कुछ बातें।

अरे अरे अरे
कहाँ की बात कहाँ जोड़ रहे हो
एक छुट्टी को किन किन 
और बातों से जोड़ रहे हो,
365 दिनों में ये मेरी तीसरी छुट्टी है
पहली जब बड़ा बेटा बीमार पड़ा था
और जब तुम्हे आफिस के काम से 
अमेरिका जाना पड़ा था।
याद है वो दिसम्बर जब ठंड ने तुम्हे जकड़ा था
तब तुम्हे संभालने के लिए
मैंने छुट्टी का ही हाँथ पकड़ा था।
हाँ ये मेरी तीसरी छुट्टी है,
हाँ ले ली है मैने ये छुट्टी
बिना तुमसे पुछे, 
बिना तुम्हे बताए
पर क्या तुम्हें याद हैं 
मेरे शरीर के वो दर्द
जो पिछले कुछ महीनों और हफ्तों में
मैने तुम्हे बताए।
भूल गए ना?
भूल ही गए होंगे 
छोटी सी ही तो बात है
शायद इसलिए
की मेरे उस दर्द में भी 
तुम्हे तुम्हारे मन की 
सब्जी रोटी का साथ है।

हाँ भूल गयी मैं
तुम्हे बताना की कल रात भी 
सो नहीं पाई थी मैं
सोनू की पढ़ाई, मोनू की ढिठाई,
टीचर की शिकायतें
और वो जो 500 का नोट गायब था ना
उसको भी अभी तक ढूंढ नहीं पाई थी मैं।
तुम्हारी शर्ट वे लगा वो पेन का दाग
जिसे साफ करना था
अम्मा जी की सारी को भी 
अच्छे से कलफ करना था,
पापा जी कल ही बोल के गए थे
बिजली का बिल जमा कर देना
और मेरे आफिस का चपरासी कह रहा था
दीदी ज़रा मेरे बच्चे को भी पढ़ा देंना
इन्ही बातों में उलझी 
भूल गयी थी तुम्हे बताना
की बड़ी मुश्किल से 
बॉस को मेडिकल लगा के
मैने ये एक दिन अपने लिए था निकाला।

खैर मैं कभी और छुट्टी ले लूंगी
कल तुम आराम कर लो
पर अगर तुम मुझे कल बता देते 
किसी बात में भी 
आज की छुट्टी का जता देते
तो शायद 
मैं आज की भी छुट्टी नही लेती।
हाँ एक शिकायती अर्जी 
वो भगवान की पेटी है ना
जो शिव जी के मंदिर में रखी है
उसमें ज़रूर डाल देती
थक गई हूं मैं
रोज़ रोज़ के 
इन आरोपों प्रत्यारोपों से,
और मांग रही हूँ तुमसे
एक दिन की छुट्टी 

मिलेगी क्या ज़िन्दगी
मुझे एक दिन की छुट्टी तुमसे।

शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2019

गीत : एक तरफा रिश्ता




भूल जाती हूँ 
कि रिश्ता
एक तरफा है हमारा
और तुमसे मांग उठती हूँ
मैं अक्सर प्यार।

याद है मुझको अभी तक
जुगनुओं की रोशनी में 
हम खड़े थे साथ तेरे ,
थाम तेरा हाँथ
कह रहे थे हम 
वही एक बात
तुम कहीं भी हो
किसी के हो 
हमें न फर्क कोई 
हम सदा से हैं तुम्हारे 
और सदा तक ही रहेंगे
हर तरह से साथ
तुम भी थे स्तब्ध 
पर मुझसे छुड़ा कर हाँथ
तुमने ये कहा था
मैं अकेला ही चला हूँ
और अकेला ही चलूँगा
तुम किसी को थाम लेना
है दुआ मेरी 
करेगा वो भी तुमसे
तुम सरीखा प्यार,


भूल जाती हूँ 
कि रिश्ता
एक तरफा है हमारा
और तुमसे मांग उठती हूँ
मैं अक्सर प्यार।

मान कर आदेश सा
तेरा कहा
मैं चल पड़ी उस ओर
जिसका था न कोई छोर
थाम कर मैं कल्पना में
बस तुम्हारी उंगलियों की पोर
थी उस रात रोयी
फूट कर 
जब तक दिखी न भोर,
चुप हुई फिर सोच कर ये
कोई मुझको देख ना ले
और मेरी लाल आंखों से 
चुरा न पाए
मन का शोर
और कोई पढ़ सके न
रात भर मैंने लिखा जो ग्रंथ
अपने अश्रुओं से
उसमें बसता प्यार,

भूल जाती हूँ 
कि रिश्ता
एक तरफा है हमारा
और तुमसे मांग उठती हूँ
मैं अक्सर प्यार।

तुम गए हो भूल 
वो एक रोज़
जब तुमने छुआ था प्रेम से
अस्तित्व मेरा
भूल थी शायद तुम्हारी 
बचपने में हो गयी थी
और मैं अब तक सिहरती सी
बस तुम्हें ही 
ढूंढने में लग गयी थी
तुम बने थे कृष्ण 
बस एक पल की खातिर
और मैं मीरा सी 
जोगन हो गयी थी
नाम तेरा रट रही थी
स्वांस के संग
बिन अपेक्षाओं के 
भोगन हो गयी थी,
है बहुत मुश्किल 
तुम्हें समझाऊं कैसे
हो गया कैसे 
कहाँ ,कब और इतना
मुझको तुमसे प्यार,

भूल जाती हूँ 
कि रिश्ता
एक तरफा है हमारा
और तुमसे मांग उठती हूँ
मैं अक्सर प्यार।

अब बहुत मुश्किल है
इसको खत्म करना
ये समय के साथ 
जीवट हो गया है
तुम मिलो या न मिलो 
तुम साथ ही हो
इस तरह का अब ये 
जीवन हो गया है
है नहीं कोई अपेक्षा
अब हमारी 
तुम मिलो मुझको 
या कर लो हमसे थोड़ी बात
या पकड़ कर हाँथ मेरा 
ये कहो हमसे कभी तुम
प्रिय चलोगी क्या
वहाँ तक तुम हमारे साथ?
आँख के सम्मुख 
न होकर भी हमारे
तुम हो रहते बस हमारे पास
बोलते तुम कुछ नहीं मुझसे
मगर अब बिन कहे भी
कह ही जाते हो
न जाने कितनी सारी बात।
सोचती हूँ आज
तो लगता है 
मुझको चाहिए था
इस तरह का 
योग और संयोग
ऐसा सतयुगी सा प्यार

भूल जाती हूँ 
कि रिश्ता
एक तरफा है हमारा
और तुमसे मांग उठती हूँ
मैं अक्सर प्यार।