अंशकालिक हुई भूल हमसे प्रिये ,
पूर्णकालिक गरल किंतु पीना पड़ा,
कर्म फल यूँ मिला इस धरा पर हमें,
मर के भी ज़िन्दगी को था जीना पड़ा।
वो प्रथम पल की जब थे मिले दो नयन,
भाव सागर की तरह उमड़ने लगे,
हम कहीं बह न जाएं नई राह पर,
सोच कर ये स्वयं से ही लड़ने लगे,
सांस चलने लगी तीव्र गति से मेरी,
शीत में ग्रीष्म का फिर महीना लगा,
अंशकालिक हुई भूल हमसे प्रिये ,
पूर्णकालिक गरल किंतु पीना पड़ा।
थी विरह को लिए घूमती रात दिन,
जैसे मरुथल की हिरनी वो प्यासी जिये,
देख कर जल की बूंदों का प्रतिबिंब वो,
उसकी राहों में बढ़ती अधर को सिये,
भाग कर पास पहुंचे , पिया सिंधु तक,
किंतु पी ना मिले , घाव सीना पड़ा।
अंशकालिक हुई भूल हमसे प्रिये ,
पूर्णकालिक गरल किंतु पीना पड़ा।
स्वधा रवींद्र "उत्कर्षिता "

बहुत सुंदर रचना
जवाब देंहटाएंआभार मित्र।
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