मम अंतर्नाद

मम अंतर्नाद
मेरा एकल ग़ज़ल संग्रह

शुक्रवार, 14 अप्रैल 2023

अमर बेलें


पूरा पूरा विटप खा गईं, 

उन पर चढ़ी अमर बेलें।।


परजीवी संस्कृतियों ने ही

जीवन का संहार किया

जिस थाली में जा कर बैठीं

उसमें छेद हज़ार किया

अपना कह कर भावनाओं से

अक्सर ही अपने खेलें


पूरा पूरा विटप खा गईं, 

उन पर चढ़ी अमर बेलें।।


जिसने सदा संभाला सब कुछ

उस पर ही आरोप लगे

जिसने खुला कपाट रखा

वे सज्जन ही फिर गए ठगे

जो मानवता को अपनाते

वो ही मानव को झेलें


पूरा पूरा विटप खा गईं, 

उन पर चढ़ी अमर बेलें।।


जब भी अपने आंगन में

कोई नव बेल लगानी हो

देख लीजिए इतना उसकी

आंखों में भी पानी हो

वरना नव आगंतुक देते

कष्टों के शाश्वत मेले


पूरा पूरा विटप खा गईं, 

उन पर चढ़ी अमर बेलें।।




गुरुवार, 13 अप्रैल 2023

मैं सबके हित प्रीत लिखूंगी........


   


नहीं लिखूंगी प्रलय कभी भी, 

सृष्टि रचे वह रीत लिखूंगी

कवियों वाले कुनबे की हूं

मैं सबके हित प्रीत लिखूंगी.........


मेरे गीतों में मंदिर की आरतियों वाले स्वर होंगे

मेरे मुक्तक रस छंदों के अलंकरण वाले घर होंगे

मेरे दोहे फिर कबीर की स्मृतियों में ले जाएंगे

सदा प्रसन्न रहेंगे जो भी गीत मेरे निस दिन गायेंगे

जिससे सबका भला सदा हो मैं वो मंगल गीत लिखूंगी।।


कवियों वाले कुनबे की हूं

मैं सबके हित प्रीत लिखूंगी.........


वर्तमान की दुहिता हूं मैं इसके प्रति दायित्व मेरा है

जो भविष्य में होने वाला,जाने कैसा वो चेहरा है

प्रगति लिखूंगी, प्यार लिखूंगी, राग और अनुराग लिखूंगी

सुख के दुख के, योग वियोग भरे कितने ही फाग लिखूंगी

आज सुधार अपेक्षित है जब,मैं क्यों भला अतीत लिखूंगी


कवियों वाले कुनबे की हूं

मैं सबके हित प्रीत लिखूंगी.........


सिर्फ विसंगतियां लिख कर मैं जग को कोई चोट न दूंगी

समाधान भी लिखूंगी मैं, समस्याओं की ओट न दूंगी

बैरागन की पीर लिखी यदि, मन का संगम भी लिखूंगी,

केवल ताल नहीं लिखूंगी, संग में सरगम भी लिखूंगी

द्रुत लिखा यदि तो मध्यम लय

वाला भी संगीत लिखूंगी।।


कवियों वाले कुनबे की हूं

मैं सबके हित प्रीत लिखूंगी.........


जैसे ही इक गीत लिखूंगी, मंच नया तैयार रहेगा

मेरा गीत सृष्टि का कण कण सुनने को तैयार रहेगा

इक कोशिकी जीव से लेकर बहुकोशिकी सभी सुन लेंगे

गीतों में जो सार लिखूंगी गीता सम सब ही गुन लेंगे

सत्य सार्थक और यथार्थ मैं

सदा शाश्वत जीत लिखूंगी


कवियों वाले कुनबे की हूं

मैं सबके हित प्रीत लिखूंगी.........


बुधवार, 12 अप्रैल 2023

एक गजब की लड़की है




मुझको अपना कहती है पर

सबको गले लगा लेती है

बड़ी गज़ब की लड़की है वो

सबसे प्रेम निभा लेती है............


सुबह प्रभाती गाते गाते , घर आंगन पर छा जाती है

अम्मा बाबा भाई, बहन , बच्चों के मन को भा जाती है

सबके सुख में मुस्काती है सबके दुःख में रो देती है

घर की खुशहाली की खातिर अक्सर खुद को खो देती है

किंतु पूछ लो, तुम कैसी हो, तो हर कष्ट छिपा लेती है


बड़ी गज़ब की लड़की है वो

सबसे प्रेम निभा लेती है............


मेरे मित्र नहीं अब मेरे , उसके देवर बन इतराते

भाभी आज बनाया है क्या पूछ पूछ कर खाने आते

घर की बाई से लेकर ऑफिस के चपरासी की मां है

जो मेरे बच्चों की खातिर दोस्त और भोली अम्मा है

खुद कितनी भी थकी भले हो, बच्चों को दुलरा लेती है


बड़ी गज़ब की लड़की है वो

सबसे प्रेम निभा लेती है............


अपने सब रहस्य लेकर सब उसके पास चले आते हैं

और जगत भर में जाने क्यों सब उसके ही गुण गाते हैं

मेरा भाई भाई है उसका, मेरी बहन बहन है उसकी

वो बिल्कुल वैसी है जैसे भारीपन में चाय की चुस्की

मेरे सुख दुःख दर्द और कमियां सारी अपना लेती है


बड़ी गज़ब की लड़की है वो

सबसे प्रेम निभा लेती है............


कभी नहीं मांगती स्वयं के हेतु मंदिरों में वह जाकर

खुश हो जाती मां की साड़ी, बाबा के जूते संभाल कर

मेरा सब कुछ अब उसका है, किंतु समर्पित वह रहती है 

सबकी खातिर लड़ जाती है अपनी खातिर चुप रहती है

जाने किस मिट्टी की है वो पीड़ा में मुस्का लेती है


बड़ी गज़ब की लड़की है वो

सबसे प्रेम निभा लेती है............


सातों वचन निभाए उसने, बिना अपेक्षा मन में पाले

सुख में साथ चली मेरे और कष्टों में थी मुझे संभाले

आंगन गलियारा रसोई सब अपने रंग में रंग डाले हैं

भले काम में रत हो किंतु मिलन के स्वप्न नयन पाले है

सोता देख मुझे थक कर वो, सारे दीप बुझा लेती है


बड़ी गज़ब की लड़की है वो

सबसे प्रेम निभा लेती है............



मंगलवार, 11 अप्रैल 2023

सब अनूदित लग रहा है......




कह रहे हैं लोग कुछ मौलिक सुनाओ

और मुझको सब अनूदित लग रहा है......


भावनाओं के सभी अंकुर खिलेंगे एक जैसे

प्रेम को जो भी लिखेंगे वे लिखेंगे प्रेम जैसे

क्या कोई नव बीज कोई बाग में फिर बो सकेगा

यदि लिखूंगी कुछ नया तो क्या नया वह हो सकेगा,

लोग कहते हैं मैं अपनी मूल ध्वनि उनको सुनाऊं 

पर मुझे सब प्रतिध्वनित सा लग रहा है


कह रहे हैं लोग कुछ मौलिक सुनाओ

और मुझको सब अनूदित लग रहा है......


राम लिखूं काव्य में तो याद तुलसी आ रहे हैं

कृष्ण लिखूं तो हृदय में सूर, कान्हा गा रहे हैं

दर्शनों में यदि कभी भी गीत मेरे डूबते हैं

श्लोक गीता में लिखे जो वो हृदय में गूंजते हैं

लोग कहते वेद में जो मंत्र हैं वो हैं अजन्मे

पर मुझे यह अनपेक्षित लग रहा है


कह रहे हैं लोग कुछ मौलिक सुनाओ

और मुझको सब अनूदित लग रहा है......


बंद करके जब नयन , अंतस की आभा गह सकेंगे

सब स्वयं से है, स्वयं में हैं सदा यह कह सकेंगे

कुछ नहीं मौलिक सभी कुछ पूर्व में भी हो चुका है

ये समय है जो निरंतर चल रहा है , कब रुका है

लोग जिसको आज कहते हैं किसी प्राचीन क्षण का

एक अनुभव अग्रसारित लग रहा है


कह रहे हैं लोग कुछ मौलिक सुनाओ

और मुझको सब अनूदित लग रहा है......