मम अंतर्नाद

मम अंतर्नाद
मेरा एकल ग़ज़ल संग्रह

शुक्रवार, 30 जून 2023

बदली दिशा मगर रहा, लक्ष्य सदा शिव धाम

नीलकंठ बन कर लिया, उपेक्षाओं को थाम,

उपेक्षाओं को थाम, सदा ही हम मुस्काए,

लिखा भाग्य में जिसके जो वह वो ही पाए

मिला सदा सूखापन, कभी भी मिली न बदली

मगर राह पर चली, उसी के दिशा न बदली।।


गुरुवार, 29 जून 2023

निर्बांध चलना चाहती हूं.


तुम चलो धारा में 

मैं निर्बांध चलना चाहती हूं.....


किस तरह बंधन भला स्वीकार लूं

तुम ही बताओ

रोक कर द्रुत लय मेरी तुम मत मुझे 

प्रियतम सताओ

तुम रहो स्थूल दृढ़ 

मैं किंतु गलना चाहती हूं


तुम चलो धारा में 

मैं निर्बांध चलना चाहती हूं.....


क्या मिलेगा ठोस होकर

नित्य ही मैं सोचती हूं

अपने हिस्से के सितारे 

खुद उचक कर नोचती हूं

मैं प्रकृति की भांति नित नव 

रूप ढलना चाहती हूं


तुम चलो धारा में 

मैं निर्बांध चलना चाहती हूं.....


ऊसरों में बीज बोकर मैं उन्हें नित 

तक रही हूं

जलरहित आकाश है, फिर भी नहीं

मैं थक रही हूं

प्रेम का परिजात हूं मैं

सिर्फ फलना चाहती हूं


तुम चलो धारा में 

मैं निर्बांध चलना चाहती हूं.....

बुधवार, 28 जून 2023

लगावट है बनावट है दिखावट पर दिखावट है

ये रिश्ते आज कल केवल रुकावट हैं मिलावट है

वो उनके साथ फ़ोटो में बड़े इंसान लगते हैं

बस इतनी बात के कारण ही रिश्तों में कसावट है।

शुक्रवार, 23 जून 2023

मेरे पास नहीं आए हो



प्रेम बढ़ाने की खातिर मैं

जतन सभी कर आई थी पर

सोच रहीं हूं क्यों अब तक तुम मेरे पास नहीं आए हो।।


याद तुम्हें होगा पत्रों में 

कितने भाव किए थे प्रेषित

आंखों में आंसू थे लेकिन 

मुस्कानों से थे आश्लेषित

बहुत कठिन था सत्य समझना, 

क्यों हमको इतना भाए हो


सोच रहीं हूं क्यों अब तक तुम मेरे पास नहीं आए हो।।


प्रेम बढ़ेगा जूठा खाकर

दादी से सुन कर जाना था

तेरी थाली से एक कौरा 

इसीलिए मुझको खाना था

एक कौर का असर अभी तक 

तुम मेरे मन पर छाए हो


सोच रहीं हूं क्यों अब तक तुम मेरे पास नहीं आए हो।।


एक तुम्हें पाने की खातिर

मंदिर मस्ज़िद माथा टेका

गुरुद्वारे में सबद सुन लिए

मन मयूर भी कितना केका

किंतु मेरे उपवासों का फल 

तुम अब तक क्यों नहीं लाए हो


सोच रहीं हूं क्यों अब तक तुम मेरे पास नहीं आए हो।।


भूल गई थी केवल मैने

पत्रों में मनुहार किया था

जूठा भी मैने खाया था

मैने ही बस प्यार किया था

तुम तो इन राहों पर बढ़ने में 

हर दम ही अलसाए हो


सोच रहीं हूं क्यों अब तक तुम मेरे पास नहीं आए हो।