बदली दिशा मगर रहा, लक्ष्य सदा शिव धाम
नीलकंठ बन कर लिया, उपेक्षाओं को थाम,
उपेक्षाओं को थाम, सदा ही हम मुस्काए,
लिखा भाग्य में जिसके जो वह वो ही पाए
मिला सदा सूखापन, कभी भी मिली न बदली
मगर राह पर चली, उसी के दिशा न बदली।।
बदली दिशा मगर रहा, लक्ष्य सदा शिव धाम
नीलकंठ बन कर लिया, उपेक्षाओं को थाम,
उपेक्षाओं को थाम, सदा ही हम मुस्काए,
लिखा भाग्य में जिसके जो वह वो ही पाए
मिला सदा सूखापन, कभी भी मिली न बदली
मगर राह पर चली, उसी के दिशा न बदली।।
वो ताजमहल हूँ जो पत्थर का नहीं है
जिसमें है बहता रक्त लाल श्वेत नहीं है
चाहो तो कहीं से भी हमे तोड़ के देखो
दिल ही मिलेगा साथ में पाषाण नहीं है |
मैं निर्बांध चलना चाहती हूं.....
किस तरह बंधन भला स्वीकार लूं
तुम ही बताओ
रोक कर द्रुत लय मेरी तुम मत मुझे
प्रियतम सताओ
तुम रहो स्थूल दृढ़
मैं किंतु गलना चाहती हूं
तुम चलो धारा में
मैं निर्बांध चलना चाहती हूं.....
क्या मिलेगा ठोस होकर
नित्य ही मैं सोचती हूं
अपने हिस्से के सितारे
खुद उचक कर नोचती हूं
मैं प्रकृति की भांति नित नव
रूप ढलना चाहती हूं
तुम चलो धारा में
मैं निर्बांध चलना चाहती हूं.....
ऊसरों में बीज बोकर मैं उन्हें नित
तक रही हूं
जलरहित आकाश है, फिर भी नहीं
मैं थक रही हूं
प्रेम का परिजात हूं मैं
सिर्फ फलना चाहती हूं
तुम चलो धारा में
मैं निर्बांध चलना चाहती हूं.....
वो ताजमहल हूँ जो पत्थर का नहीं है
जिसमें है बहता रक्त लाल श्वेत नहीं है
चाहो तो कहीं से भी हमे तोड़ के देखो
दिल ही मिलेगा साथ में पाषाण नहीं है |
लगावट है बनावट है दिखावट पर दिखावट है
ये रिश्ते आज कल केवल रुकावट हैं मिलावट है
वो उनके साथ फ़ोटो में बड़े इंसान लगते हैं
बस इतनी बात के कारण ही रिश्तों में कसावट है।
वो ताजमहल हूँ जो पत्थर का नहीं है
जिसमें है बहता रक्त लाल श्वेत नहीं है
चाहो तो कहीं से भी हमे तोड़ के देखो
दिल ही मिलेगा साथ में पाषाण नहीं है |
जतन सभी कर आई थी पर
सोच रहीं हूं क्यों अब तक तुम मेरे पास नहीं आए हो।।
याद तुम्हें होगा पत्रों में
कितने भाव किए थे प्रेषित
आंखों में आंसू थे लेकिन
मुस्कानों से थे आश्लेषित
बहुत कठिन था सत्य समझना,
क्यों हमको इतना भाए हो
सोच रहीं हूं क्यों अब तक तुम मेरे पास नहीं आए हो।।
प्रेम बढ़ेगा जूठा खाकर
दादी से सुन कर जाना था
तेरी थाली से एक कौरा
इसीलिए मुझको खाना था
एक कौर का असर अभी तक
तुम मेरे मन पर छाए हो
सोच रहीं हूं क्यों अब तक तुम मेरे पास नहीं आए हो।।
एक तुम्हें पाने की खातिर
मंदिर मस्ज़िद माथा टेका
गुरुद्वारे में सबद सुन लिए
मन मयूर भी कितना केका
किंतु मेरे उपवासों का फल
तुम अब तक क्यों नहीं लाए हो
सोच रहीं हूं क्यों अब तक तुम मेरे पास नहीं आए हो।।
भूल गई थी केवल मैने
पत्रों में मनुहार किया था
जूठा भी मैने खाया था
मैने ही बस प्यार किया था
तुम तो इन राहों पर बढ़ने में
हर दम ही अलसाए हो
सोच रहीं हूं क्यों अब तक तुम मेरे पास नहीं आए हो।
वो ताजमहल हूँ जो पत्थर का नहीं है
जिसमें है बहता रक्त लाल श्वेत नहीं है
चाहो तो कहीं से भी हमे तोड़ के देखो
दिल ही मिलेगा साथ में पाषाण नहीं है |