मम अंतर्नाद

मम अंतर्नाद
मेरा एकल ग़ज़ल संग्रह

शुक्रवार, 3 जनवरी 2020

गीत:-नयन चिर नींद मांगे है।



गीत:-नयन चिर नींद मांगे है।


रहे सोए ,न जागें है
नयन चिर नींद मांगे है।

हृदय में अब विषमता है
नयन में भी तरलता है
नही सुनते पटल कुछ भी
भरी रसना गरलता है
सुखद कुछ भी नहीं लगता
दुःखों के भाग जागे हैं

नयन चिर नींद मांगे है।

कलश सब सोम के फूटे
सभी सपने लगे झूठे
अकेलापन हुआ अपना
मेरे अपने थे जब रूठे
यही एक सत्य जीवन का
की तुम बिन हम अभागे है

नयन चिर नींद मांगे है।

बुलाता भाग्य है मुझको
कि गिरि को लाँघना है अब
चले आओ चले आओ
कि नभ को बाँधना है अब
मगर क्यों ये करूं अब मैं
यही एक प्रश्न आगे है

नयन चिर नींद मांगे है।





गीतिका:- रेल की पटरी पे ज़िंदगी



दो समांतर पटरियों पर 
चल रही है जिंदगी
नित नई राहों पे देखो 
ढल रही है जिंदगी।

भूख से तड़पी कहीं तो 
प्यास से बोझिल हुयी
रोज़ पारे की तरह से 
गल रही है जिंदगी।

दोस्तों ने साथ छोड़ा , 
छोड़ कर दुश्मन हुए
बस इसी कारण मुझे अब 
खल रही है जिंदगी।

अनुभवों से सीख कर भी ,
कुछ न हासिल कर सके
देख कर अपनों की फितरत 
जल रही है जिंदगी

रेल की पटरी सी उलझी , 
भिन्न राहों की ललक में
आज खुद को खुद ही देखो 
छल रही है जिंदगी।

दो समांतर पटरियों पर 
चल रही है जिंदगी
नित नई राहों पे देखो 
ढल रही है जिंदगी।

सोमवार, 16 दिसंबर 2019

गीत:- श्याम नहीं घर आये हैं

मेरे कान्हा के लिए



अखियाँ मेरी कैसे सोएं
श्याम नहीं घर आये हैं
माखन के छीकें ना टूटे
गैया भी रंभाये है।

उसे नहीं है भान ज़रा सा
उसके बिन सब सूना है
रात्रि अभावों वाली है और
मन विस्मित हो घूमा है
अंतर मन है दुखी बहुत
अँखियों में बादल छाए हैं

अखियाँ मेरी कैसे सोएं
श्याम नहीं घर आये हैं।

आंगन मौन पड़ा है मेरा 
ढूंढे है तुझको कण कण
हाथ हाथ है खोजे तेरा
मन को है बस एक लगन
कान्हा तेरे लिए यशोदा 
का मन तरसा जाए है

अखियाँ मेरी कैसे सोएं
श्याम नहीं घर आये हैं।

जाने कैसी प्रीत कि तुम बिन
भूख प्यास सब हर जाती
तुझको किसी गोद मे देखूँ
जीते जी मैं मर जाती
तुम हो तो सब कुछ सुंदर है
तुम बिन मन अकुलाए है

अखियाँ मेरी कैसे सोएं
श्याम नहीं घर आये हैं।

सूख गए अब नयन माई के
ढूँढत ढूँढत पैर थके
जाने कौन गली में जाके
जसुदा के नंदलाल बसे
प्राण छोड़ कर देह, ढूंढने 
अपने हरि को जाए है,

अखियाँ मेरी कैसे सोएं
श्याम नहीं घर आये हैं।





रविवार, 15 दिसंबर 2019

गीत :- जोगी

गीत


हरे रंग का चोला डाले नाच रहा था जोगी
था वो भोला भाला मन का और था वो मनमौजी

ना जग की चिंता थी उसको , न कोई भी डर था
कर्म किये जाता था हँसके , वो ख़ुशियों से तर था
जो अंदर था वही बांटता था वो अद्भुद जोगी

हरे रंग का चोला डाले नाच रहा था जोगी।

जान रहा था पंचतत्व का मटका कुछ दिन का है
जो जीवन अनवरत चल रहा केवल पलछिन का है
एक एक पल झोली में संजोए जाग रहा था जोगी,

हरे रंग का चोला डाले नाच रहा था जोगी।

जिस दिन मैना उड़ जाएगी पिंजरा खाली होगा
उस दिन इस पिंजरे का कोई मोल नहीं फिर होगा
मैना को हरि से मिलवाले , लेने आया जोगी

हरे रंग का चोला डाले नाच रहा था जोगी।

पांवों में पड़ गयी बिवाई, मन हर पल ही टूटा
जब जीवन मे चलते चलते हर एक रिश्ता छूटा
फिर गीता का ज्ञान करा कर मुस्काया था जोगी

हरे रंग का चोला डाले नाच रहा था जोगी




स्वधा रवींद्र "उत्कर्षिता"


बुधवार, 11 दिसंबर 2019

गीत :- मौन बन चलने दो





गीत

अभिव्यक्त सदा मैं रहूँ ज़रूरी नहीं, 
मौन बन चलने दो
दुनिया को दिखूं,दिखूं न दिखूं, 
तुम हृदयस्थल में पलने दो।

मैं परछाईं बन कर हर पल, 
तुझ संग सानिध्य निभाऊँगा
मैं हाथ तेरा हाथों में ले , 
नित आगे बढ़ता जाऊंगा
पाषाण तेरी राहों के मैं 
आगे बढ़ सदा हटाऊंगा
चाहे कैसे हालात रहें 
बस तेरा ही कहलाऊंगा

बस इतनी अभिलाषा मेरी ,
मुझे  नव ढांचे में ढलने दो
अभिव्यक्त सदा मैं रहूँ ज़रूरी नहीं, 
मौन बन चलने दो।

नीलाभ गगन में उड़ते हैं 
मेरी आशाओं के बादल
सागर के अंतस में बसते 
भावों के अनुपम पुष्पित दल
मैं तेरे प्रश्नों के उत्तर में
उत्तर बन आ जाऊँगा
रख मौन सदा सम्पुट पट पर
नयनों से सब कह जाऊँगा

बस एक यही एक आस मेरी
मेरे अंसुओं को गलने दो
अभिव्यक्त सदा मैं रहूँ ज़रूरी नहीं, 
मौन बन चलने दो।

जाने कितने स्वप्नों में से 
तेरी अँखियों का स्वप्न बना
बस तेरा साथ निभाने को 
मैं शक्ति साध अवलंब बना
मैं तुझको थामे थल जल सब 
एक बार पार कर जाऊँगा
तेरे आँखों से नीर चुरा
मैं पलकों बीच बसाऊंगा

तुझसे बस एक उम्मीद यही
मुझे प्रेम अग्नि में जलने दो
अभिव्यक्त सदा मैं रहूँ ज़रूरी नहीं, 
मौन बन चलने दो।




स्वधा रवींद्र "उत्कर्षिता"