मम अंतर्नाद

मम अंतर्नाद
मेरा एकल ग़ज़ल संग्रह

गुरुवार, 13 अप्रैल 2023

मैं सबके हित प्रीत लिखूंगी........


   


नहीं लिखूंगी प्रलय कभी भी, 

सृष्टि रचे वह रीत लिखूंगी

कवियों वाले कुनबे की हूं

मैं सबके हित प्रीत लिखूंगी.........


मेरे गीतों में मंदिर की आरतियों वाले स्वर होंगे

मेरे मुक्तक रस छंदों के अलंकरण वाले घर होंगे

मेरे दोहे फिर कबीर की स्मृतियों में ले जाएंगे

सदा प्रसन्न रहेंगे जो भी गीत मेरे निस दिन गायेंगे

जिससे सबका भला सदा हो मैं वो मंगल गीत लिखूंगी।।


कवियों वाले कुनबे की हूं

मैं सबके हित प्रीत लिखूंगी.........


वर्तमान की दुहिता हूं मैं इसके प्रति दायित्व मेरा है

जो भविष्य में होने वाला,जाने कैसा वो चेहरा है

प्रगति लिखूंगी, प्यार लिखूंगी, राग और अनुराग लिखूंगी

सुख के दुख के, योग वियोग भरे कितने ही फाग लिखूंगी

आज सुधार अपेक्षित है जब,मैं क्यों भला अतीत लिखूंगी


कवियों वाले कुनबे की हूं

मैं सबके हित प्रीत लिखूंगी.........


सिर्फ विसंगतियां लिख कर मैं जग को कोई चोट न दूंगी

समाधान भी लिखूंगी मैं, समस्याओं की ओट न दूंगी

बैरागन की पीर लिखी यदि, मन का संगम भी लिखूंगी,

केवल ताल नहीं लिखूंगी, संग में सरगम भी लिखूंगी

द्रुत लिखा यदि तो मध्यम लय

वाला भी संगीत लिखूंगी।।


कवियों वाले कुनबे की हूं

मैं सबके हित प्रीत लिखूंगी.........


जैसे ही इक गीत लिखूंगी, मंच नया तैयार रहेगा

मेरा गीत सृष्टि का कण कण सुनने को तैयार रहेगा

इक कोशिकी जीव से लेकर बहुकोशिकी सभी सुन लेंगे

गीतों में जो सार लिखूंगी गीता सम सब ही गुन लेंगे

सत्य सार्थक और यथार्थ मैं

सदा शाश्वत जीत लिखूंगी


कवियों वाले कुनबे की हूं

मैं सबके हित प्रीत लिखूंगी.........


बुधवार, 12 अप्रैल 2023

एक गजब की लड़की है




मुझको अपना कहती है पर

सबको गले लगा लेती है

बड़ी गज़ब की लड़की है वो

सबसे प्रेम निभा लेती है............


सुबह प्रभाती गाते गाते , घर आंगन पर छा जाती है

अम्मा बाबा भाई, बहन , बच्चों के मन को भा जाती है

सबके सुख में मुस्काती है सबके दुःख में रो देती है

घर की खुशहाली की खातिर अक्सर खुद को खो देती है

किंतु पूछ लो, तुम कैसी हो, तो हर कष्ट छिपा लेती है


बड़ी गज़ब की लड़की है वो

सबसे प्रेम निभा लेती है............


मेरे मित्र नहीं अब मेरे , उसके देवर बन इतराते

भाभी आज बनाया है क्या पूछ पूछ कर खाने आते

घर की बाई से लेकर ऑफिस के चपरासी की मां है

जो मेरे बच्चों की खातिर दोस्त और भोली अम्मा है

खुद कितनी भी थकी भले हो, बच्चों को दुलरा लेती है


बड़ी गज़ब की लड़की है वो

सबसे प्रेम निभा लेती है............


अपने सब रहस्य लेकर सब उसके पास चले आते हैं

और जगत भर में जाने क्यों सब उसके ही गुण गाते हैं

मेरा भाई भाई है उसका, मेरी बहन बहन है उसकी

वो बिल्कुल वैसी है जैसे भारीपन में चाय की चुस्की

मेरे सुख दुःख दर्द और कमियां सारी अपना लेती है


बड़ी गज़ब की लड़की है वो

सबसे प्रेम निभा लेती है............


कभी नहीं मांगती स्वयं के हेतु मंदिरों में वह जाकर

खुश हो जाती मां की साड़ी, बाबा के जूते संभाल कर

मेरा सब कुछ अब उसका है, किंतु समर्पित वह रहती है 

सबकी खातिर लड़ जाती है अपनी खातिर चुप रहती है

जाने किस मिट्टी की है वो पीड़ा में मुस्का लेती है


बड़ी गज़ब की लड़की है वो

सबसे प्रेम निभा लेती है............


सातों वचन निभाए उसने, बिना अपेक्षा मन में पाले

सुख में साथ चली मेरे और कष्टों में थी मुझे संभाले

आंगन गलियारा रसोई सब अपने रंग में रंग डाले हैं

भले काम में रत हो किंतु मिलन के स्वप्न नयन पाले है

सोता देख मुझे थक कर वो, सारे दीप बुझा लेती है


बड़ी गज़ब की लड़की है वो

सबसे प्रेम निभा लेती है............



मंगलवार, 11 अप्रैल 2023

सब अनूदित लग रहा है......




कह रहे हैं लोग कुछ मौलिक सुनाओ

और मुझको सब अनूदित लग रहा है......


भावनाओं के सभी अंकुर खिलेंगे एक जैसे

प्रेम को जो भी लिखेंगे वे लिखेंगे प्रेम जैसे

क्या कोई नव बीज कोई बाग में फिर बो सकेगा

यदि लिखूंगी कुछ नया तो क्या नया वह हो सकेगा,

लोग कहते हैं मैं अपनी मूल ध्वनि उनको सुनाऊं 

पर मुझे सब प्रतिध्वनित सा लग रहा है


कह रहे हैं लोग कुछ मौलिक सुनाओ

और मुझको सब अनूदित लग रहा है......


राम लिखूं काव्य में तो याद तुलसी आ रहे हैं

कृष्ण लिखूं तो हृदय में सूर, कान्हा गा रहे हैं

दर्शनों में यदि कभी भी गीत मेरे डूबते हैं

श्लोक गीता में लिखे जो वो हृदय में गूंजते हैं

लोग कहते वेद में जो मंत्र हैं वो हैं अजन्मे

पर मुझे यह अनपेक्षित लग रहा है


कह रहे हैं लोग कुछ मौलिक सुनाओ

और मुझको सब अनूदित लग रहा है......


बंद करके जब नयन , अंतस की आभा गह सकेंगे

सब स्वयं से है, स्वयं में हैं सदा यह कह सकेंगे

कुछ नहीं मौलिक सभी कुछ पूर्व में भी हो चुका है

ये समय है जो निरंतर चल रहा है , कब रुका है

लोग जिसको आज कहते हैं किसी प्राचीन क्षण का

एक अनुभव अग्रसारित लग रहा है


कह रहे हैं लोग कुछ मौलिक सुनाओ

और मुझको सब अनूदित लग रहा है......





रविवार, 19 मार्च 2023

गुड़िया ले लो बोले.......


केसरिया परिधान पहन कर

हरी ओढ़नी ओढ़े

मन सफेद कर बुढ़िया माई

गुड़िया ले लो बोले.......


रंग बिरंगी हर इक गुड़िया,है बिल्कुल अनमोल

कम ही दाम लगाए मैने,आओ ले लो मोल

चूल्हा जला छोड़ कर आई हूं, सुन लो तुम क्रेता

मजबूरी में बेचूं गुड़िया, बन कर मैं विक्रेता

जाने आज बिकेगी कोई या फिर कहना होगा

बिटिया मैं फिर नहीं ला सकी

तेरी खातिर होले


मन सफेद कर बुढ़िया माई

गुड़िया ले लो बोले.......


जब भी गुड़िया नई बनाई, बिटिया ने शृंगार किया,

भिन्न भिन्न रूपों में ढाला सुंदर सुंदर नाम दिया,

एक को बड़ी बहन कहती है, एक को छुटकी कहती है

मेरी बिटिया की मुस्काने इन गुड़ियों में रहती है

जल्दी जल्दी बेच इन्हें घर मुझको जाना होगा

घर पर मेरी गुड़िया 

बैठी है दरवाज़ा खोले


मन सफेद कर बुढ़िया माई

गुड़िया ले लो बोले.......


जान रही हूं इन्हें बेच,तन ही जिंदा रख पाऊंगी

मन से टूटेगी गुड़िया, जब गुड़िया बिन घर जाऊंगी

रो रो कर पूछेगी मुझसे कहां गई है मीना दीदी

और कहां तुम छोड़ आई हो, मेरी प्यारी सोना सीधी

उत्तर नहीं पास है मेरे क्या उसको बतलाऊंगी 

लेकर बैठी है बिटिया

प्रश्नों से भर कर झोले


मन सफेद कर बुढ़िया माई

गुड़िया ले लो बोले.......



सोमवार, 20 फ़रवरी 2023

बिल्ली की तो यही प्रकृति है

 



उस बिल्ली को जिस बंदर से 

जितना अधिक रहा है मतलब

उस बंदर के सम्मुख बिल्ली 

उतना रम कर नाचा करती

बिल्ली  की तो यही प्रकृति है

अपना हित ही बांचा करती।।


बंदर सब भोले भाले हैं

रोटी की खातिर लड़ जाते

शातिर बिल्ली देख रही है

नादां ये भी समझ न पाते

बांट बराबर कर पड़ले का

न्याय दिला देगी दोनों को

ऐसा कह कर मौसी बिल्ली

बंदर के संग झांसा करती


बिल्ली  की तो यही प्रकृति है

अपना हित ही बांचा करती।।


जो जितना झांसे में आया

उतना रक्त दान कर आया

कोई धन से लुटा खूब

अरु कोई तन मन तक दे आया

गले लगाती है जग भर को

लेकिन अंतस अभिशापित है

इसीलिए अपनत्व दिखा कर

बिल्ली "सबको" काटा करती


बिल्ली  की तो यही प्रकृति है

अपना हित ही बांचा करती।।


बड़ी बड़ी बातों के पीछे

छिछले छिछले कर्म किए हैं

धर्म धर्म की माला जप कर

उसने सभी अधर्म किए हैं

मीठा बोल घोलती है विष 

उसकी प्रकृति सदा से ऐसी

रिश्ते नाते और मित्रता

सबमें स्वार्थ तलाशा करती,


बिल्ली  की तो यही प्रकृति है

अपना हित ही बांचा करती।।


जब तक रोटी नहीं मिली वो

तब तक बंदर की मौसी थी

मिला नहीं यदि लक्ष्य उसे तो

पगली होती मुंह झौँसी थी

अपना अपना राग अलापे

उसे नहीं थी फिक्र किसी की

बस अपना हित पूरा होते 

वो जग भर को टाटा करती


बिल्ली  की तो यही प्रकृति है

अपना हित ही बांचा करती।।


सभी बंदरों को सलाह है

अपने मन की आंखे खोलो

बिल्ली जो कुछ भी कहती है

करने से पहले तुम तौलो

उसके जैसी प्रकृति सुनो तुम

कभी नहीं अपनाना क्योंकि 

बिल्ली तो अपना थूका ही

अक्सर वापस चाटा करती


बिल्ली  की तो यही प्रकृति है

अपना हित ही बांचा करती।।