मम अंतर्नाद

मम अंतर्नाद
मेरा एकल ग़ज़ल संग्रह

शनिवार, 18 अक्टूबर 2025

ख़ुश हो रहे हैं

 कौन कहता है, गिरह को, खोल कर ख़ुश हो रहे हैं

हम तो, "तुम मेरे हो केवल" बोल कर ख़ुश हो रहे हैं।

 पीड़ाओं को गाते गाते, नीर नयन तक आ पहुंचे हैं

अब मुस्कानों की भित्ति से इन्हें छिपाना मुश्किल होगा....
मुस्काते मुस्काते अब ये गीत सुनाना मुश्किल होगा......
तन को रेशम कर ढकती थी, मैं मन के पैबंद पुराने
सजा धजा कर के रखी थी अरमानों की लाश ठिकाने
कितने लेप लगा लूँ पर दुर्गन्ध छिपाना मुश्किल होगा
अब मुस्कानों की भित्ति से इन्हें छिपाना मुश्किल होगा....
मुस्काते मुस्काते अब ये गीत सुनाना मुश्किल होगा......
चौखट पर ठहरीं हैं मेरे कही अनकही चंद कथाएँ,
ह्रदय निरंतर सोच रहा है किसको मन के घाव दिखाएं
अब उर के इस सन्नाटे का दिल बहलाना मुश्किल होगा...
अब मुस्कानों की भित्ति से इन्हें छिपाना मुश्किल होगा....
मुस्काते मुस्काते अब ये गीत सुनाना मुश्किल होगा......
रातों की ठंडी चादर में लेकर बैठी रही दुआएं
सोच रही थी भीतर भीतर छूटे हुए लोग मिल जाएं
राख़ छिपे अंगारों पर अब नीर लुटाना मुश्किल होगा
अब मुस्कानों की भित्ति से इन्हें छिपाना मुश्किल होगा....
मुस्काते मुस्काते अब ये गीत सुनाना मुश्किल होगा......
जीवन के इस प्रश्नपत्र में उत्तर ग़लत लिखे सब मैंने
सोच रही हूँ क्यों नहिं सीखे दुनियादारी के ढब मैंने
चीख पुकार मचाते प्रश्नों को समझाना मुश्किल होगा
अब मुस्कानों की भित्ति से इन्हें छिपाना मुश्किल होगा....
मुस्काते मुस्काते अब ये गीत सुनाना मुश्किल होगा......

अम्मा ब्याह नहीं करना है


कारण एक नहीं है सौ हैं
मेरे इस निर्णय के पीछे
पर यह निश्चय है मेरा अब
अम्मा ब्याह नहीं करना है........
रधिया की हालत देखी थी, ब्याह बाद जब घर वो आई
तीन बरस में चार बाल बच्चों में, बचपन वो खो आई
हाथ खिलौने होने थे जब , तब वो बर्तन मांज रही थी
जब स्वप्नों की दुनिया तय थी, तब रातों को जाग रही थी
शिक्षा के प्रकाश को तज कर
जीवन स्याह नहीं करना है
अम्मा ब्याह नहीं करना है........
मुनिया जो पूरे समाज में सुंदरता की इक मिसाल थी
लाश मिली जब उस मुनिया की,जली कटी सी हाय खाल थी
उधड़ी काया के भीतर का, रोम रोम तक जला हुआ था,
अपनों के ही हाथों बेचारी का जीवन छला हुआ था
निर्विरोध हो जल जाऊं मैं
ऐसी चाह नहीं करना है
अम्मा ब्याह नहीं करना है........
सप्तपदी के साथ वचन क्यों किसी और के साथ निभाऊं
तुमने जन्म दिया है अम्मा, तुझ पर ही क्यों न मिट जाऊं
बाबा के सपने अपने कर, दूर गगन तक मैं उड़ जाऊं
जो भी दिया ईश ने , उसके लिए उन्हीं के गुण मैं गाऊँ
चंद नए रिश्तों में बंध
अनमन निर्वाह नहीं करना है
अम्मा ब्याह नहीं करना है........
जग हित की कामना संजो कर, आगे बढ़ना सहज सरल है
किंतु गलत रिश्ते पाने से, बेहतर मुझको आज गरल है
क्यों ढूंढूं इक राज कुंवर मैं, जब खुद रानी बन सकती हूं,
अपनी रक्षा हेतु स्वयं मैं, जब ऐशानी बन सकती हूं
जीवन के इस सरल मार्ग को
अब अवदाह नहीं करना है
अम्मा ब्याह नहीं करना है........

तब ही गीत हमारे गाएं


मन के घाव संजोये सारे
तब मेरी लेखनी लिख सकी, गीतों में बहते अंगारे
यूँ तो हैं ये अंगारे पर फिर भी ताप अगर हर पाएं
तब ही गीत हमारे गाएं
तब ही गीत हमारे गाएं।
जब सारा संसार रक्त की नदिया में डूबा जाता हो
तब हम मरहम बना रहे हों, जब जग पीड़ाएं गाता हो
यदि मेरे गीतों के दीपक अंधियारों में कर उजियारा
मृत आशाओं में फिर से कुछ शाश्वत प्राण बीज बो पाएं
तब ही गीत हमारे गाएं
तब ही गीत हमारे गाएं।
जग के हिस्से शूल न आएं, सो अनुभव सब लिख डाले
सबको सोमकलश देकर के, मैंने गरल पिए हैं काले
यदि मेरे गीतों के स्वर, ममता की लोरी बन करके
हौले हौले माथे पर जब इक स्नेहिल चुम्बन दे पाएं
तब ही गीत हमारे गाएं
तब ही गीत हमारे गाएं।
कितनी भी पीड़ा हो मन में अधरों पर मुस्कान सजाए
बन गीतों की राजकुमारी हमने गीत निरंतर गाए
पर तुम मेरे गीतों को अपने अधरों पर तब ही लाना
जब मेरे गीतों के स्वर से उत्सव उल्लासित हो पाएं
तब ही गीत हमारे गाएं
तब ही गीत हमारे गाएं।

गुरुवार, 19 जून 2025

नश्तरों की क्या ज़रूरत



 नश्तरों की क्या ज़रूरत जिनकी तगड़ी धार धार

आँख ही कर देती है कपड़े बदन के तार तार।।


ग़ैर के आगोश में जा कर मिलेगा क्या हमें
अब तो अपने ही लगाते ब्लेम हम पर बार बार।।

दौड़ में तो जीत जाते हम, भरोसा था हमें
भीड़ से अपनों ने चिल्लाया ओ धावक हार हार।।

जिनसे सच की थी उम्मीदें, झूठ वो कहते रहे
शर्म इतनी आई ख़ुद पर फ़िर हुए हम ज़ार ज़ार।।

अपनी थाली के निवाले में नमक कुछ कम लगा
दोस्त की थाली जो देखी मुँह में आई लार लार।।

खुशबुओं में मत उलझ तू, हैं कृत्रिम सब खुशबुएं
माँ ने बतलाया वही है शुद्ध जिसमें झार झार।।

क्या करेंगे अब बताओ हम भला इस देश का
उल्लुओं का आज डेरा हैं जहाँ पर डार डार।।

जब स्वधा ने कह दिया बस इश्क़ है मजहब मेरा
भीड़ ले तलवार बोली अब स्वधा को मार मार।।




स्वधा रविंद्र उत्कर्षिता