मम अंतर्नाद

मम अंतर्नाद
मेरा एकल ग़ज़ल संग्रह

बुधवार, 2 अक्टूबर 2019

गीत: माँ केवल तुम्हे पुकारा है




जब जब मन ने पीढ़ा झेली
अंतस ने यह उच्चारा है
माँ केवल तुम्हें पुकारा है
माँ केवल तुम्हें पुकारा है।

सावन की बूंदों की रिमझिम
झूलों का छूना आसमान
घर का घर सा ना रह जाना
बस लगना जैसे एक मकान
तू ही तो प्राण सरीखी माँ
तुझको ही सदा निहारा है

जब जब मन ने पीढ़ा झेली
अंतस ने यह उच्चारा है
माँ केवल तुम्हें पुकारा है।

जब भावनाओं की गठरी को
खोला तो खाली पाया है
तुम बिन अम्मा सब कुछ है बस
ममता की कहीं न छाया है
सुन विह्वल मन के क्रंदन का
तू ही बस एक सहारा है

जब जब मन ने पीढ़ा झेली
अंतस ने यह उच्चारा है
माँ केवल तुम्हें पुकारा है।

अन्तस् की ज्योति है तू माँ
जिससे मैं प्रकाशित होती हूँ
तू है वो मलयानिल अम्मा
जिससे मैं सुवासित होती हूँ
जब भी मंझधार फंसी हूँ मैं
तू बन कर आई किनारा है।

जब जब मन ने पीढ़ा झेली
अंतस ने यह उच्चारा है
माँ केवल तुम्हें पुकारा है।


मंगलवार, 24 सितंबर 2019

गज़ल: आज़मा कर देख लो

एक कोशिश




तुम हमें फिर लिटमसों के बीच लाकर देख लो
अम्ल हैं या छार हैं हम आज़माकर देख लो

मेरा सादापन तुम्हें जब रास आता ही नहीं
फिर जो चाहो तुम मुझे वैसा बनाकर देख लो

बुतपरस्ती में लगे हो बुत में दिल होता नहीं
आज इन्सानों से तुम दिल को लगाकर देख लो

एक इक अक्षर में उभरेगा मेरा चेहरा जनाब
जानने को सच मेरे सब ख़त जलाकर देख लो

मैं कोई चेहरा नहीं हूं, दिल हूँ , दुख भी जाऊंगा
गर यकीं तुमको नहीं तो फिर दुखा कर देख लो।

हम भले सुनते नहीं है दीन दुनिया की दलील,
पर तुम्हें सुनते हैं बिन बोले, बुला कर देख लो।


शेष तीनों उंगलियां फिर प्रश्न सी उठ जाएंगी
एक उँगली आप बस हम पर उठाकर देख लो।

लूटने जब आ गया अपना कोई बन गजनबी
बचना मुश्किल है भले पहरे लगा कर देख लो।

उड़ ही जायेंगे विहग, चाहे विषम हालात हों
हौसलों से हैं उड़ाने पर कतर कर देख लो।





सोमवार, 23 सितंबर 2019

गीत: तुम क्या जानो।


कल से तेरी राहों में हम दिए जलाये बैठे थे,
तुम क्या जानो, 
कितने सपने आँख सजाए बैठे थे,
सोचा था अदरक की चाय में प्यार मिला कर दे देंगे,
और किसी नमकीन में अपनी हार मिला कर दे देंगे,
तुम क्या जानो ,
हम कितने आभार सजाये बैठे थे,
कल से तेरी राहों में हम दिए जलाये बैठे थे।

आँखें पूरी रात ना सोई हाँथों ने ये ठाना था,
रोक ही लेंगे राह तुम्हारी तुम जो कहोगे जाना था,
सीने से लग जाएगा दिल, और दरिया बह जाएगा,
जब मस्तक तेरे अधरों की मोहर स्वयं पर पायेगा,
तुम क्या जानो ,
हम कितने अरमान सजाये बैठे थे,
कल से तेरी राहों में हम दिए जलाये बैठे थे।

सोचा था एक पल को पर शायद जीवन मिल जाएगा,
तुझमे खो कर जीने का शायद मकसद मिल जाएगा,
पर दो पल में देखो मेरी सारी दुनिया पलट गयी,
जीवन को जो ढूंढ रही थी महाकाल संग भटक गयी।
तुम क्या जानो,
हम तुमको वरदान बनाये बैठे थे ,
कल से तेरी राहों में हम दिए जलाये बैठे थे।

मूक हो गयी भावनाएं सब, मौन हुयी सारी खुशियाँ,
होंठों ने मुस्काना छोड़ा , रो रो लाल हुयी  अँखियाँ,
पर इसमे कोई भूल ना तेरी , सब मेरी ही गलती है,
एक तरफ़ा हो प्रेम जहाँ वहां कष्ट लताएं फलती हैं,
तुम क्या जानो ,
तुमको हम भगवान्  बनाये बैठे थे,
कल से तेरी राहों में हम दिए जलाये बैठे थे।








शुक्रवार, 20 सितंबर 2019

गीतिका:- कलियाँ भी मुस्काने लगीं।



गीतिका


फड़फड़ा कर पंख सुंदर तितलियां गाने लगीं
और उनको देख कर कलियाँ भी मुस्काने लगीं।

सागरों की ओर बढ़ती एक नदी क्यों रुक गयी
देख कर सागर को शायद वो भी शरमाने लगी।

दौर ऐसा है कि अब खूँ में ज़हर है दौड़ता
इसलिए अब बाग की कोयल भी मुरझाने लगीं।

रौंदता फिर आ गया कोई सभी खुशियां यहाँ
बस इसी आफत से क़िबला रूह डर जाने लगी।

मौसमों की बारिशों में खूब बरसा अम्ल जब
बेटियां भी बारिशों से दोस्त सकुचाने लगीं।

एक कलंदर आके सबके गम करेगा फाख्ता
जब सुना दीवार ने , तो छत भी इतराने लगी।

फड़फड़ा कर पंख सुंदर तितलियां गाने लगीं
और उनको देख कर कलियाँ भी मुस्काने लगीं।

बुधवार, 18 सितंबर 2019

छन्दमुक्त:- तुम्हारी साज़िश




मैंने तो प्रेम किया था
पर उसने 
हाँ उसने 
साजिश ही कि थी 
उस दिन 
जब पहली बार उसने मुझे 
सोनपरी कह के बुलाया था।

हाँ उसने 
साजिश ही की थी
जब उसने कहा था
"बड़ा स्वाद है 
तुम्हारे हाँथ के खाने में
जी करता है तुम्हारे 
हाँथ चूम लूँ।"

हाँ उसने 
साजिश ही कि थी 
जब उसने कहा था 
की बड़ी सुंदर लगती हो तुम
जब साड़ी पहन कर
सिंदूर बिंदी लगा 
पायल बजाती
मेरे कमरे में दाखिल होती हो तुम।

हाँ उसने
साजिश ही की थी उसने 
जब मुझे दया की मूर्ति
त्याग की प्रतिमा
कहते हुए कहा था
देख लेना तुम मेरे लिए
दुनिया की 
सबसे सुंदर नारी हो।

आज समझ पायी हूँ
वर्षों बाद
जब वो बात बात पर 
कहता है
कुछ भी ठीक नहीं बनता तुमसे
कभी नमक ज़्यादा डालती हो
कभी चीनी ज़्यादा कर देती हो
इससे अच्छा तो 
मैं खुद ही बना लूँ 
स्वयं के लिए 
दो जून के खाना
पर वही खाना खा 
पूरी दुनिया
चटकारे लेती है।

कल उसे 
जिस साड़ी में मैं
परी सी नज़र आती थी
आज उसी में आउटडेटेड 
दिखती हूँ
जिस पायल की आवाज़ 
सबसे मधुर लगती थी
आज वही चुभती है तुम्हे
मेरा सृंगार
उसे चेहरे पे की गई
लीपा पोती लगता है
आज मैं उसे सादी ही
अच्छी लगती हूँ
जिसमे मैं 
किसी को नहीं भाती।

कल मैं दुनिया की
सबसे ममतामयी माँ
बनने के गुणों से भरी हुई थी
और आज कहते हो
कि वो मुझ पर गया है
तुम्हारा कोई गुण नही है उसमें
जैसा है
मेरे कारण है
संस्कारों की मूर्ति
तुम्हारे लिए कैसे
संस्कारों को ना मानने वाली 
बन गयी।

मेरा प्रेम आज भी 
वैसा ही है
स्वीकार रहीं हूँ
तुम्हारी सारी अवहेलनायें
उसी भाव के साथ
और आज भी वैसी ही हैं
तुम्हारी साजिशें।
जो खत्म ही नहीं होती।