मम अंतर्नाद

मम अंतर्नाद
मेरा एकल ग़ज़ल संग्रह

गुरुवार, 22 दिसंबर 2022

मकड़जाल है

 



फंसे हुए की क्या मजाल है

अरे बुरा हाल है

ये जीवन इक मकड़जाल है........


फंदों के बाज़ारवाद में 

जो भी फंसा निकल ना पाया, 

उलझा लेता है खुद में यह

इसकी अय्यारों सी माया

दिखने में तो सहज सरल है

पर भीतर से इंद्र जाल है

अरे बुरा हाल है

ये जीवन इक मकड़जाल है........


दिखने में नौलखे हार सा

किंतु घोंटता दम रहता है

सुख की नदिया से ज्यादा 

इसमें दुख का लावा बहता है

फिर भी सबको यही चाहिए

कैसा ये देखो कमाल है

अरे बुरा हाल है

ये जीवन इक मकड़जाल है........


लीलाधर ने लीला करके

अद्भुद ये संसार बनाया

बड़े और छोटे से छोटे

कण में अपना बिंब बसाया,

जिसको बाहर ढूंढ रहा तू

मन में वो तेरे, कृपाल है

अरे बुरा हाल है

ये जीवन इक मकड़जाल है.......

फंसे हुए की क्या मजाल है

अरे बुरा हाल है

ये जीवन इक मकड़जाल है........


शनिवार, 26 नवंबर 2022

औरतें

 

एक गीतिका


रंग काला है मगर मन से कपोती औरतें

फिर भी घर वालों कि ख़ातिर हैं पनौती औरतें।। 


डोलची भर भार सर पर, जंगलों में है बसर

पात, माटी , डंडियाँ और झाड़ ढोती औरतें।


पीठ पर है बोझ घर का , शीश पर छलके घड़ा

हाथ मे लालन उठाये, खुद को खोती औरतें।


उम्र कटनी थी जो पढ़ लिख कर किसी दरबार में

अब किसी बिस्तर पड़ी बेकार होती औरतें।


बाप का दुख, और घरवाले की सारी मुश्किलें

देख कर बेचैन होती और  रोती औरतें।


जब किसी की कोख में कलियों ने करवट ली तो फिर

औरतें बनने से पहले खाक होती औरतें।


जब स्वधा बन कर जगत में आ गयी तो ये हुआ

जुगनुओं से बन गईं अंगार बोती औरतें।



सोमवार, 3 अक्टूबर 2022

एक गज़ल

 




उर्दू अदब के कायदे कानून जानकर

हम क्या करेंगे गीतों को ग़ज़लों में ढाल कर।। 


अब तक नहीं है याद हमें अपनी इबारत, 

फिर क्या मिलेगा लाम मीम को संभाल कर।। 


जो मेरा था नहीं, कभी भी, उसके हक में हम

अब क्या करेंगे आँख में कुछ सपने पाल कर।। 


जिसको नहीं है इल्म ज़रा सा भी त्याग का

हम क्यों बढ़ेगें उसकी तरफ दूजा गाल कर।। 


मिट्टी हैं एक रोज़ फ़िर से होना है मिट्टी

कूज़े पे जो चढ़े तो वो रख दे गा ढाल कर। 


जिसको भी बताओगे अपने दर्द ओ गम कभी

ये तय है कि जायेगा लौट गोलमाल कर।। 


हमने स्वधा को अपने ही भीतर छिपा लिया

अब कोई भी तोड़ेगा फ़िर इस्तमाल कर ।। 


सोमवार, 12 सितंबर 2022

वो तो केवल एक साहूकार निकला




जिसको पंडित प्यार का माना कभी था

वो तो केवल एक साहूकार निकला

झूठ थी बातें सभी उस सत्यव्रत की

झूठ उसका प्यार और व्यहवार निकला । 


था कभी देखा जहाँ पर एक जोगी

उस हृदय में एक रोगी बस रहा था

नित्य संशय के नवल कुछ बीज लाकर 

वो स्वयं अंतस में बरबस बो रहा था

जो बताता प्रेम को आधार अपना

आज झूठा उसका हर आधार निकला


जिसको पंडित प्यार का माना कभी था

वो तो केवल एक साहूकार निकला।। 


ढूँढता था कथ्य के पर्याय सारे 

किंतु जो भाये उसे वह मानता था

दीप जिसको मान कर हमने चुना था

वो तिमिर में ख़ुद उजाला छानता था

जिसको तट हम मानकर चलने लगे थे

वो स्वयं ही कर्म से मंझधार निकला


जिसको पंडित प्यार का माना कभी था

वो तो केवल एक साहूकार निकला।। 


आस्तीनों में बसे सर्पों की ख़ातिर

उसने घर की एक मैना को रुलाया

जो उसी के हित में पढ़ते थे दुआएँ

वो वही कर, आज फिर से काट आया

जिसको अमृत मान कर हम पी रहे थे

वो गरल की तप्त अविरल धार निकला 


जिसको पंडित प्यार का माना कभी था

वो तो केवल एक साहूकार निकला।। 




सोमवार, 29 अगस्त 2022

सोई और आराम किया




उसने मुझको छोड़ दिया तो मैंने भी ये काम किया

उसको ताक पे रखा मैंने, सोई और आराम किया।। 


लोगों ने मंदिर में जाकर धूप दीप वंदना करी

मैंने अपने मन को मंदिर तन को अक्षरधाम किया।। 


दुनियादारी वाली गठरी लदी पीठ पर बरसों से

मैंने उसको लादे लादे खुद से नित संग्राम किया।। 


अय्यारों के बीच रही पर कोई फरेब न छू पाया, 

मैंने सच की जोत थाम कर, अपना हर इमाम किया।। 


महफ़िल में रह कर भी ख़ुद को ख़ुद में बाँधे रखा सदा, 

इस तरह से मैंने ख़ुद को देखो आत्माराम किया।। 


जिसने भी गाली दी उसको उसी समय माफ़ी देकर

अपने हिस्से शांति बटोरी राम राम बस राम किया।। 


मुझसे अपनों को यूँ करके रही शिकायत मन भर की

बिना किये, गलती मानी और मैंने युद्ध विराम किया।। 


लोग लड़ रहे थे संज्ञा बनने की ख़ातिर इस जग में

मैंने ख़ुद को हम कहकर संज्ञा की जगह सर्वनाम किया।। 


स्वधा चैन से सो पाती है इसका बस एक कारण है

अपनों की खुशियों को उसने कभी नहीं नीलाम किया।।