मम अंतर्नाद

मम अंतर्नाद
मेरा एकल ग़ज़ल संग्रह

शनिवार, 25 अप्रैल 2020

विरह गीत : मैं हूँ प्यासी नदी।


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मैं हूँ प्यासी धरा तुम गगन की घटा
सिंधु से जो मिला वो ही बरसाओगे
मैने अपलक निहारा तुम्हारी तरफ
बोलो कैसे मुझे तुम भुला पाओगे।

भोर से सांझ तक मैं तुम्हारे लिए
बढ़ रही ऑसि का हाथ थामे हुए
गुनगुनाती रही स्वांस की डोर पर
मैं तुम्हें अपना सर्वस्व माने हुए
इन हवाओं में खुशबू तुम्हारी घुली
दूर रहकर भला कैसे तरसाओगे।

मैं हूँ प्यासी धरा तुम गगन की घटा
सिंधु से जो मिला वो ही बरसाओगे
मैने अपलक निहारा तुम्हारी तरफ
बोलो कैसे मुझे तुम भुला पाओगे।

प्रेम पिंजरे की मैना हुई बांवली
सींकचों में ही सर वो पटकने लगी
प्यास नैनों में दर्शन की पाले हुए
वर्जना की गली में भटकने लगी
धड़कनों से तुम्हारी ही आहट मिले
छोड़ कर तुम मुझे फिर कहाँ जाओगे

मैं हूँ प्यासी धरा तुम गगन की घटा
सिंधु से जो मिला वो ही बरसाओगे
मैने अपलक निहारा तुम्हारी तरफ
बोलो कैसे मुझे तुम भुला पाओगे।

रंग कितने ज़माने में बिखरे सही
रतग तुमसा कोई  एक मिलता नहीं
देख डाले सभी बाग मैने मगर
एक भी पुष्प तुमसा न खिलता कहीं
प्रश्न बस एक ही मन को छलता रहा
कब मेरे मन में आकर बिखर जाओगे

मैं हूँ प्यासी धरा तुम गगन की घटा
सिंधु से जो मिला वो ही बरसाओगे
मैने अपलक निहारा तुम्हारी तरफ
बोलो कैसे मुझे तुम भुला पाओगे।

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नज़्म: खुद से मिल गए हैं




बेनूर थे बहुत हम , 
तुमसे ही नूर आया
तन्हाइयों में तुमसे 
हमको सुकून आया
सब कुछ था खाली खाली , 
कुछ भी नहीं था भाता
जब तू नहीं था सुन ले , 
कुछ भी नहीं था आता
तुझसे ही छंद सीखे 
तुझसे ही काव्य जाना
तुझसे मिली थी जब मैं
तब ही मिले निराला
कामायनी पढ़ी जब
तब थी प्रलय सी आयी
तूने ही सिखाया तब
उषा तिमिर से आई
ये रात भी बीतेगी
दिनमान भी चमकेगा
तू भी बनेगा ध्रुव और
आकाश में चमकेगा
दिनकर के रश्मिरथ चढ़
जीवन को संभाला था
तुझको समझ के गीता
हर ढंग में ढाला था
तुलसी कबीर, मीरा
अपने से तब लगे थे
जब तूने ये कहा था
वो अपने सब सगे थे।
तुम जानते हो नहीं हो
तुम स्वांस स्वांस में हो
धड़कन की हर धड़क में
अरु प्राण प्राण में हो
तन्हाइयों में हमने 
क्या क्या नहीं किया है
तुझपे मरे है बरसों
बरसों तुझे जिया है
तुमको नहीं पता है
क्या आज हो गए हैं
दुनिया से बेकली है 
तुझमें ही खो गए हैं
तुम जानते हो पहले 
दुनिया में घूमते थे ,
खुद भी न जानते थे
हम किसको ढूँढते थे
तुम क्या मिले कि हमको, 
भगवान मिल गए हैं
ये है प्रथम की हमको
हम खुद ही मिल गए हैं।
ये है प्रथम की हमको
हम खुद ही मिल गए हैं।




शुक्रवार, 24 अप्रैल 2020

तुम्हारे लिए


।1।
सुषुम्ना के अनाहत के अनाहद नाद जैसे हो,
हृदय में बज रहे दिन रात बिना आघात जैसे हो
तुम्ही में लीन हो कर जड़ से चेतन हो रही हूँ मैं
मुझे जो शिव पे है शाश्वत उसी विश्वास जैसे हो।

।2।
जो बजता साम के स्वर सा वो अनहद नाद तुम सा है
जो है अग्रज कलाओं का वो अंतर्नाद तुम सा है
जिसे साधक समझता है कोई भी पढ़ नहीं सकता
जो दे अनुभूति प्रभु के साथ की वो साथ तुमसा है।

सोमवार, 20 अप्रैल 2020




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।1।
जो मन मे बज रही मेरे ,वो अनुपम भैरवी हो तुम,
सभी कुछ है गलत मेरे लिए, अब बस सही हो तुम,
जिधर कह दो उधर से सूर्य होगा अब उदय मेरा,
जहाँ मैं लाभ में हर दम , वो जीवन की बही हो तुम।

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।2।
मेरी आकाशगंगा के प्रखरतम सूर्य हो तुम ही
सजी है धड़कनों की ताल जिससे तूर्य हो तुम ही 
भटकती फिर रही थी मैं यहाँ अभिशप्त पाहन सी;
उजाला भर दिया मुझमें सुघड़ बैदूर्य हो तुम ही

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।3।
मेरे भावों के उलझे बाग़ के हमदर्द माली तुम
मेरी होली के पक्के रंग और मेरी दिवाली तुम
तुम्हीं से बज रही है ताल धड़कन की कहरवे सी

तुम्हीं से राग की अनुगूँज हो मेरी कवाली तुम

बुधवार, 8 अप्रैल 2020

गीत: हम निरंतर मर रहे हैं






क्यों परीक्षा पर परीक्षा ले रहे हो तुम हमारी
क्यों नहीं तुम देखते हो हम निरंतर मर रहे हैं

आज से जाना नहीं , तुमको जिया है हमने बरसों
ढूँढते थे हम तुम्हें जब भी खिली खेतों में सरसों
शीत में तुम धूप बन कर साथ चलते थे हमारे
और नवल बासन्त में जब कुछ नहीं था,तुम सहारे
बस तुम्हारे साथ से जीवन के पतझड़ हर रहे है 

क्यों नहीं तुम देखते हो, हम निरंतर मर रहे हैं।

स्नेह है, आसक्ति इसको मत समझना प्रिय मेरे
भक्ति है , व्यक्तित्व से, ना व्यक्तिगत कुछ स्वार्थ मेरे 
साथ होते हो तो जीवन हो ठगा सा देखता है
और नहीं तो फिर स्वयं यम प्राण मेरे खेंचता है
जान लो ये बस तुम्ही से घट नयन के भर रहे हैं

क्यों नहीं तुम देखते हो, हम निरंतर मर रहे हैं।

जोड़ते हो राम से यह कह, रगों में है तुम्हारी
तोड़ते फिर उस तरह , ज्यों हो विलग सीता थी हारी
क्यों नहीं तुम सत्य को स्वीकारते हो राम मेरे
क्यों नहीं आते पलट कर , हे प्रभु तुम धाम मेरे
आज मरघट बैठ शिव के साथ हम फिर तर रहे हैं

क्यों नहीं तुम देखते हो, हम निरंतर मर रहे हैं।
क्यों परीक्षा पर परीक्षा ले रहे हो तुम हमारी
क्यों नहीं तुम देखते हो, हम निरंतर मर रहे हैं।



मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

लखन गीत







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पैरों के नूपुर चीन्हने वाला माता को समझाता है
तुम कहीं नहीं जाना मैया ये कह के परिधि बनाता है

देखा न कभी मुख माता का, चरणों मे ही नित ध्यान रहा
बस एक सुरक्षा की ख़ातिर वर्षों तक शर संधान रहा
ना सोया ना खाया जिसने वो कंद मूल बिन लाता है

तुम कहीं नहीं जाना मैया ये कह के परिधि बनाता है।

उस पर्णकुटी का रखवाला, जो शेष विशेष है जन्मों से
जो राम की सेवा में नित रत, जो है महेश का कर्मों से
वो स्वयं भारती सीता की आज्ञा पर सब कर जाता है

तुम कहीं नहीं जाना मैया ये कह के परिधि बनाता है।

जब पार करी ,लक्ष्मण रेखा ,सीता से सब कुछ छूट गया
प्रभु राम ढूँढते रहे उन्हें, विह्वल होकर मन टूट गया
जो सीख  मिली मानस से उसको मान तेरा क्या जाता है

तुम कहीं नहीं जाना मैया ये कह के परिधि बनाता है

जब विषम काल आये तो बस नियमों का तुम निर्वाह करो
खुद सत्य मार्ग पर चलो और लोगों की भी परवाह करो
विपदाएं भी भय खाती हैं, जब मनुज एक हो जाता है

तुम कहीं नहीं जाना मैया ये कह के परिधि बनाता है
पैरों के नूपुर चीन्हने वाला माता को समझाता है।


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शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

मेरे राम

https://youtu.be/YgaqaRg9GKo
https://youtu.be/YgaqaRg9GKo


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मेरे अपने राम



स्वांस की पुकार राम, धड़कनों में राम हैं
हर विकार मार दे जो, वो प्रभाव राम हैं।

राम सूर्य सूर्य का हैं, चन्द्रमा का चंद्र हैं
राम काव्य की कला है, राम एक छंद हैं
राम रस है, राम ही अलंकरण अनूप है
राम छांव हैं कभी तो शीत वाली धूप हैं

भाव की प्रवणता राम , और स्वभाव राम हैं
हर विकार मार दे जो, वो प्रभाव राम हैं।

संस्कारों का प्रमाण, संस्कृति का मूल हैं
तार दे जो हर जनम को , वो चरण की धूल है
राम भक्ति राम शक्ति, राम ही पुनीत है
राम तथ्य राम कथ्य, राम ही गुनीत है

सत्य मार्ग का चुनाव, वो चुनाव राम हैं
हर विकार मार दे जो, वो प्रभाव राम हैं।

तारते अहिल्या और मारते है ताड़का
है विराट रूप उनका, जैसे रूप ताड़ का
एक पग में धरती नपती एक पग पाताल है
एक पग नपे आकाश, वो बड़े विशाल है

भाई का जो भाई से हो, वो जुड़ाव राम है
हर विकार मार दे जो, वो प्रभाव राम हैं।

लोक के वो नायक है , चेतना का तत्व हैं
तीन तरह के गुणों में राम ही सत्त्व हैं
पंच तत्व से दिलाए मुक्ति का वो प्राय है
वो स्वयं में एक मात्र मोक्ष का उपाय हैं

जो गुरुत्व से भी तेज वो खिंचाव राम हैं
हर विकार मार दे जो, वो प्रभाव राम हैं।

हैं अनन्त दिगदिगन्त, वो हरी के रूप हैं
वन में घूमते हैं किंतु राम जग के भूप हैं
हर हृदय में जो बसे वो धड़कनों की ताल है
राम भारतीयता का उच्च शीर्ष भाल है

मुक्ति मार्ग जो दिलाये राम वो चढ़ाव हैं
हर विकार मार दे जो, वो प्रभाव राम हैं।

मोह से विरक्ति दे के वो स्वयं से जोड़ ले
भाग जिसको खोलने हो राम मन से बोल ले
गा रहे हो राम तुलसी तो सुधीर राम है
और कबीर भक्त हो तो फिर फकीर राम है

बिन शरीर के जो हर शरीर का बचाव है
हर विकार मार दे जो, वो प्रभाव राम हैं।

राम है कठिन बहुत, अगर तू एक विकार है
और उतने ही सरल हैं ,गर हृदय में प्यार है
राम शक्ति शक्ति के हैं, शक्ति के स्वरूप है
राम की जो भक्ति शिव से भक्ति वो अनूप है

शेष से विशेष करे वो चढ़ाव राम है
हर विकार मार दे जो, वो प्रभाव राम हैं।





स्वधा रवींद्र "उत्कर्षिता"

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