मम अंतर्नाद

मम अंतर्नाद
मेरा एकल ग़ज़ल संग्रह

सोमवार, 1 दिसंबर 2025

सब्जी वाला



आलू परवल भिंडी लेलो, लेलो कद्दू लम्बा वाला,

एक अजब से सुर में गाता नित आता है सब्जी वाला.....


बारह सुर से भिन्न स्वरों में अपनी सब्जी बेच रहा है

भरे हुए अपने ठेले को मुस्का करके खेंच रहा है

भाभी काकी, नानी दादी को भाता है ये मतवाला

एक अजब से सुर में गाता नित आता है सब्जी वाला.....


बाँट रहा है हर घर में वो पोषक तत्वों वाला सागर

उसकी थाली में मिलता है केवल मोटा वाला चावल

रूखी सूखी रोटी खा कर, बाँट रहा है स्वस्थ निवाला

एक अजब से सुर में गाता नित आता है सब्जी वाला.....


जाड़ा गर्मी बारिश सह कर सब के घर पहुंचाता सब्जी

उससे ही लेनी तरकारी लगा रहा है हर घर अर्जी

फ्री में मिर्चा धनिया देता देखो कितना है दिलवाला

एक अजब से सुर में गाता नित आता है सब्जी वाला.....


पानी के छीटे दे दे कर, हरा साग ताज़ा रखता है

पूरे दिन ठेला ले घूमे फिर भी कहता "ना थकता है"

घर भर को खुशियाँ देता है, वो मेहनत का ओढ़ दुशाला

एक अजब से सुर में गाता नित आता है सब्जी वाला.....


ज़रा प्यार से बस पूछा था भैया पानी पीना है क्या?

आँखें छलक आयीं थी उसकी, बोला ये भी जीना है क्या

तनिक प्रेम से बह आयी थी, आँखों से अंतर की ज्वाला

एक अजब से सुर में गाता नित आता है सब्जी वाला.....



स्वधा रविंद्र उत्कर्षिता

रविवार, 19 अक्टूबर 2025

दोहे


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तुम तुम हो मैं मैं रहूं, ये थी कल की बात

प्रेम चांदनी में लिपट, एक हुए मन गात।


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सोच समझ सब ख़त्म हो, जब हो मिलन विधान

प्रकृति पुरुष के साथ से , ही होता कल्यान।


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सर पर मटकी प्रेम की, भर निकली ब्रज नार

गोकुल से फिर श्याम ने, खींच लिए सब भार।।


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जड़ता की चादर लिए, सोया रहा फ़कीर

जो मलंग था प्रेम में, वो बन गया कबीर।


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शनिवार, 18 अक्टूबर 2025

आँगन का सूनापन



मन की चिमनी से उठता है क्यों कर आज धुँआ
शायद सुलग रहा है मन के भीतर छुपा सुआ......

आँगन का सूनापन मन को नित ही छलता है
पनघट पर कान्हा के बिन तन मेरा जलता है
बिना कंत के ह्रदय रुग्ण करुणामय लगता है
सृष्टि बसा हर जीव मुझे आ आ कर ठगता है
लावे सा जलता है मन कोई दो हमें दुआ

मन की चिमनी से उठता है क्यों कर आज धुँआ
शायद सुलग रहा है मन के भीतर छुपा सुआ......

निर्जन वन की हिरणी जैसी भटकी मैं दिन रात
नीरवता में दिन बीते और ठगिनी सी थी रात
अपनेपन का स्वप्न दिखाने जो अक्सर आता
हाथ पकड़ लेती उसका तो पल में उड़ जाता
दुर्भाग्यों के शूलों ने इस तरह मुझे छुआ

मन की चिमनी से उठता है क्यों कर आज धुँआ
शायद सुलग रहा है मन के भीतर छुपा सुआ......

जग को छोड़ निकलना होगा अब तो प्रभु की ओर
तभी मिलेगा शायद उर को सुख का अनुपम छोर
जब रिक्तता सुखद होगी, लोगों की भीड़ नहीं
तब देखोगे हिय के कोने, राघव बसें कहीं
जीवन के मरुथल में खोदो जाओ ज्ञान कुआँ

मन की चिमनी से उठता है क्यों कर आज धुँआ
शायद सुलग रहा है मन के भीतर छुपा सुआ......

चाहे राह कोई पकड़ो पर आँगन से छत तक
केवल रहे तुम्हारा मन प्रभु के चरणों में रत
स्वाँसे उसकी लय थामें, धड़कन उस चाल चले
जिन राहों पर सबके हित वाले हों पुष्प पले
हरि का नाम उच्चारण कर जीतोगे हर इक जुँआ

मन की चिमनी से उठता है क्यों कर आज धुँआ
शायद सुलग रहा है मन के भीतर छुपा सुआ......

बिलरिया मूषक खावे आई

 बिलरिया मूषक खावे आई

मंद मंद मुसकाई
बिलरिया मूषक खावे आई।
भोला मूषक समझ न पावे
बन विलाब की चाल
दौड़ावे मूषक का लेकिन
पकड़े न वो खाल
आगे आगे भागे इंदुर
सोच रहा कित जाई
बिलरिया मूषक खावे आई।
इत उत घूमे समझ न पावे
कैसे और कहां बच जावे
पूरब पच्छिम उत्तर दक्खिन
कितहूँ घूमे ठौर न पावे
देख कोठरी काल कराली
छुप के पैठ लगाई
बिलरिया मूषक खावे आई।
अंधियारे ने भय उपजाया
राम नाम मूषक ने गाया
तन मन भीति त्याग तब भागा
हृदय तार बलम संग लागा
भय भंजन की शरण पहुंच कर
मुसटा बिलरी खाई
बिलरिया मूषक खावे आई।
मगर न अंत मे वो बच पाई
बिलरिया मूषक पेट समाई
बिलरिया फिर न पलट कर आई
बिलरिया अंत बहुत पछताई।

 वो लिखेंगे समझ जो आ जाये

वो लिखेंगे जो जग को भा जाए
हम बनेंगे जो जन्म देता है,
वो नहीं जो किसी को खा जाए।

देखा है गया

नित नई ढपली नया इक ताल देखा है गया

शाश्वत चीज़ों के सर पर काल देखा है गया।

जिसको पूरी जिंदगी सबने कहा ईमानदार
उसके घर में दूसरों का माल देखा है गया।।
हँस रही थी खिलखिला कर जो कली उस बाग में
उस कली का हाल फिर बेहाल देखा है गया।।
बाँटता जो घूमता सर्टिफिकेट चारित्र्य के
एक रक्कासा के संग फिलहाल देखा है गया।।
ले गए थे वे अनाथालय से कह जिसको परी
उसको उसके घर में ही बदहाल देखा है गया।।
गा रहे हैं राम को कविताई में जो आज कल
संस्कारों से उन्हें कंगाल देखा है गया।।
मंच पर बैठी हैं जो कविताएँ पढ़ने के लिए
अपनी भाषा में उन्हें तंग हाल देखा है गया।।
जो स्वधा कल तक बताती थी बचें सब प्यार से
उसको शिव के प्रेम में खुशहाल देखा है गया।।

ख़ुश हो रहे हैं

 कौन कहता है, गिरह को, खोल कर ख़ुश हो रहे हैं

हम तो, "तुम मेरे हो केवल" बोल कर ख़ुश हो रहे हैं।

 पीड़ाओं को गाते गाते, नीर नयन तक आ पहुंचे हैं

अब मुस्कानों की भित्ति से इन्हें छिपाना मुश्किल होगा....
मुस्काते मुस्काते अब ये गीत सुनाना मुश्किल होगा......
तन को रेशम कर ढकती थी, मैं मन के पैबंद पुराने
सजा धजा कर के रखी थी अरमानों की लाश ठिकाने
कितने लेप लगा लूँ पर दुर्गन्ध छिपाना मुश्किल होगा
अब मुस्कानों की भित्ति से इन्हें छिपाना मुश्किल होगा....
मुस्काते मुस्काते अब ये गीत सुनाना मुश्किल होगा......
चौखट पर ठहरीं हैं मेरे कही अनकही चंद कथाएँ,
ह्रदय निरंतर सोच रहा है किसको मन के घाव दिखाएं
अब उर के इस सन्नाटे का दिल बहलाना मुश्किल होगा...
अब मुस्कानों की भित्ति से इन्हें छिपाना मुश्किल होगा....
मुस्काते मुस्काते अब ये गीत सुनाना मुश्किल होगा......
रातों की ठंडी चादर में लेकर बैठी रही दुआएं
सोच रही थी भीतर भीतर छूटे हुए लोग मिल जाएं
राख़ छिपे अंगारों पर अब नीर लुटाना मुश्किल होगा
अब मुस्कानों की भित्ति से इन्हें छिपाना मुश्किल होगा....
मुस्काते मुस्काते अब ये गीत सुनाना मुश्किल होगा......
जीवन के इस प्रश्नपत्र में उत्तर ग़लत लिखे सब मैंने
सोच रही हूँ क्यों नहिं सीखे दुनियादारी के ढब मैंने
चीख पुकार मचाते प्रश्नों को समझाना मुश्किल होगा
अब मुस्कानों की भित्ति से इन्हें छिपाना मुश्किल होगा....
मुस्काते मुस्काते अब ये गीत सुनाना मुश्किल होगा......

अम्मा ब्याह नहीं करना है


कारण एक नहीं है सौ हैं
मेरे इस निर्णय के पीछे
पर यह निश्चय है मेरा अब
अम्मा ब्याह नहीं करना है........
रधिया की हालत देखी थी, ब्याह बाद जब घर वो आई
तीन बरस में चार बाल बच्चों में, बचपन वो खो आई
हाथ खिलौने होने थे जब , तब वो बर्तन मांज रही थी
जब स्वप्नों की दुनिया तय थी, तब रातों को जाग रही थी
शिक्षा के प्रकाश को तज कर
जीवन स्याह नहीं करना है
अम्मा ब्याह नहीं करना है........
मुनिया जो पूरे समाज में सुंदरता की इक मिसाल थी
लाश मिली जब उस मुनिया की,जली कटी सी हाय खाल थी
उधड़ी काया के भीतर का, रोम रोम तक जला हुआ था,
अपनों के ही हाथों बेचारी का जीवन छला हुआ था
निर्विरोध हो जल जाऊं मैं
ऐसी चाह नहीं करना है
अम्मा ब्याह नहीं करना है........
सप्तपदी के साथ वचन क्यों किसी और के साथ निभाऊं
तुमने जन्म दिया है अम्मा, तुझ पर ही क्यों न मिट जाऊं
बाबा के सपने अपने कर, दूर गगन तक मैं उड़ जाऊं
जो भी दिया ईश ने , उसके लिए उन्हीं के गुण मैं गाऊँ
चंद नए रिश्तों में बंध
अनमन निर्वाह नहीं करना है
अम्मा ब्याह नहीं करना है........
जग हित की कामना संजो कर, आगे बढ़ना सहज सरल है
किंतु गलत रिश्ते पाने से, बेहतर मुझको आज गरल है
क्यों ढूंढूं इक राज कुंवर मैं, जब खुद रानी बन सकती हूं,
अपनी रक्षा हेतु स्वयं मैं, जब ऐशानी बन सकती हूं
जीवन के इस सरल मार्ग को
अब अवदाह नहीं करना है
अम्मा ब्याह नहीं करना है........

तब ही गीत हमारे गाएं


मन के घाव संजोये सारे
तब मेरी लेखनी लिख सकी, गीतों में बहते अंगारे
यूँ तो हैं ये अंगारे पर फिर भी ताप अगर हर पाएं
तब ही गीत हमारे गाएं
तब ही गीत हमारे गाएं।
जब सारा संसार रक्त की नदिया में डूबा जाता हो
तब हम मरहम बना रहे हों, जब जग पीड़ाएं गाता हो
यदि मेरे गीतों के दीपक अंधियारों में कर उजियारा
मृत आशाओं में फिर से कुछ शाश्वत प्राण बीज बो पाएं
तब ही गीत हमारे गाएं
तब ही गीत हमारे गाएं।
जग के हिस्से शूल न आएं, सो अनुभव सब लिख डाले
सबको सोमकलश देकर के, मैंने गरल पिए हैं काले
यदि मेरे गीतों के स्वर, ममता की लोरी बन करके
हौले हौले माथे पर जब इक स्नेहिल चुम्बन दे पाएं
तब ही गीत हमारे गाएं
तब ही गीत हमारे गाएं।
कितनी भी पीड़ा हो मन में अधरों पर मुस्कान सजाए
बन गीतों की राजकुमारी हमने गीत निरंतर गाए
पर तुम मेरे गीतों को अपने अधरों पर तब ही लाना
जब मेरे गीतों के स्वर से उत्सव उल्लासित हो पाएं
तब ही गीत हमारे गाएं
तब ही गीत हमारे गाएं।

गुरुवार, 19 जून 2025

नश्तरों की क्या ज़रूरत



 नश्तरों की क्या ज़रूरत जिनकी तगड़ी धार धार

आँख ही कर देती है कपड़े बदन के तार तार।।


ग़ैर के आगोश में जा कर मिलेगा क्या हमें
अब तो अपने ही लगाते ब्लेम हम पर बार बार।।

दौड़ में तो जीत जाते हम, भरोसा था हमें
भीड़ से अपनों ने चिल्लाया ओ धावक हार हार।।

जिनसे सच की थी उम्मीदें, झूठ वो कहते रहे
शर्म इतनी आई ख़ुद पर फ़िर हुए हम ज़ार ज़ार।।

अपनी थाली के निवाले में नमक कुछ कम लगा
दोस्त की थाली जो देखी मुँह में आई लार लार।।

खुशबुओं में मत उलझ तू, हैं कृत्रिम सब खुशबुएं
माँ ने बतलाया वही है शुद्ध जिसमें झार झार।।

क्या करेंगे अब बताओ हम भला इस देश का
उल्लुओं का आज डेरा हैं जहाँ पर डार डार।।

जब स्वधा ने कह दिया बस इश्क़ है मजहब मेरा
भीड़ ले तलवार बोली अब स्वधा को मार मार।।




स्वधा रविंद्र उत्कर्षिता