मम अंतर्नाद

मम अंतर्नाद
मेरा एकल ग़ज़ल संग्रह

मंगलवार, 24 सितंबर 2019

गज़ल: आज़मा कर देख लो

एक कोशिश




तुम हमें फिर लिटमसों के बीच लाकर देख लो
अम्ल हैं या छार हैं हम आज़माकर देख लो

मेरा सादापन तुम्हें जब रास आता ही नहीं
फिर जो चाहो तुम मुझे वैसा बनाकर देख लो

बुतपरस्ती में लगे हो बुत में दिल होता नहीं
आज इन्सानों से तुम दिल को लगाकर देख लो

एक इक अक्षर में उभरेगा मेरा चेहरा जनाब
जानने को सच मेरे सब ख़त जलाकर देख लो

मैं कोई चेहरा नहीं हूं, दिल हूँ , दुख भी जाऊंगा
गर यकीं तुमको नहीं तो फिर दुखा कर देख लो।

हम भले सुनते नहीं है दीन दुनिया की दलील,
पर तुम्हें सुनते हैं बिन बोले, बुला कर देख लो।


शेष तीनों उंगलियां फिर प्रश्न सी उठ जाएंगी
एक उँगली आप बस हम पर उठाकर देख लो।

लूटने जब आ गया अपना कोई बन गजनबी
बचना मुश्किल है भले पहरे लगा कर देख लो।

उड़ ही जायेंगे विहग, चाहे विषम हालात हों
हौसलों से हैं उड़ाने पर कतर कर देख लो।





सोमवार, 23 सितंबर 2019

गीत: तुम क्या जानो।


कल से तेरी राहों में हम दिए जलाये बैठे थे,
तुम क्या जानो, 
कितने सपने आँख सजाए बैठे थे,
सोचा था अदरक की चाय में प्यार मिला कर दे देंगे,
और किसी नमकीन में अपनी हार मिला कर दे देंगे,
तुम क्या जानो ,
हम कितने आभार सजाये बैठे थे,
कल से तेरी राहों में हम दिए जलाये बैठे थे।

आँखें पूरी रात ना सोई हाँथों ने ये ठाना था,
रोक ही लेंगे राह तुम्हारी तुम जो कहोगे जाना था,
सीने से लग जाएगा दिल, और दरिया बह जाएगा,
जब मस्तक तेरे अधरों की मोहर स्वयं पर पायेगा,
तुम क्या जानो ,
हम कितने अरमान सजाये बैठे थे,
कल से तेरी राहों में हम दिए जलाये बैठे थे।

सोचा था एक पल को पर शायद जीवन मिल जाएगा,
तुझमे खो कर जीने का शायद मकसद मिल जाएगा,
पर दो पल में देखो मेरी सारी दुनिया पलट गयी,
जीवन को जो ढूंढ रही थी महाकाल संग भटक गयी।
तुम क्या जानो,
हम तुमको वरदान बनाये बैठे थे ,
कल से तेरी राहों में हम दिए जलाये बैठे थे।

मूक हो गयी भावनाएं सब, मौन हुयी सारी खुशियाँ,
होंठों ने मुस्काना छोड़ा , रो रो लाल हुयी  अँखियाँ,
पर इसमे कोई भूल ना तेरी , सब मेरी ही गलती है,
एक तरफ़ा हो प्रेम जहाँ वहां कष्ट लताएं फलती हैं,
तुम क्या जानो ,
तुमको हम भगवान्  बनाये बैठे थे,
कल से तेरी राहों में हम दिए जलाये बैठे थे।








शुक्रवार, 20 सितंबर 2019

गीतिका:- कलियाँ भी मुस्काने लगीं।



गीतिका


फड़फड़ा कर पंख सुंदर तितलियां गाने लगीं
और उनको देख कर कलियाँ भी मुस्काने लगीं।

सागरों की ओर बढ़ती एक नदी क्यों रुक गयी
देख कर सागर को शायद वो भी शरमाने लगी।

दौर ऐसा है कि अब खूँ में ज़हर है दौड़ता
इसलिए अब बाग की कोयल भी मुरझाने लगीं।

रौंदता फिर आ गया कोई सभी खुशियां यहाँ
बस इसी आफत से क़िबला रूह डर जाने लगी।

मौसमों की बारिशों में खूब बरसा अम्ल जब
बेटियां भी बारिशों से दोस्त सकुचाने लगीं।

एक कलंदर आके सबके गम करेगा फाख्ता
जब सुना दीवार ने , तो छत भी इतराने लगी।

फड़फड़ा कर पंख सुंदर तितलियां गाने लगीं
और उनको देख कर कलियाँ भी मुस्काने लगीं।

बुधवार, 18 सितंबर 2019

छन्दमुक्त:- तुम्हारी साज़िश




मैंने तो प्रेम किया था
पर उसने 
हाँ उसने 
साजिश ही कि थी 
उस दिन 
जब पहली बार उसने मुझे 
सोनपरी कह के बुलाया था।

हाँ उसने 
साजिश ही की थी
जब उसने कहा था
"बड़ा स्वाद है 
तुम्हारे हाँथ के खाने में
जी करता है तुम्हारे 
हाँथ चूम लूँ।"

हाँ उसने 
साजिश ही कि थी 
जब उसने कहा था 
की बड़ी सुंदर लगती हो तुम
जब साड़ी पहन कर
सिंदूर बिंदी लगा 
पायल बजाती
मेरे कमरे में दाखिल होती हो तुम।

हाँ उसने
साजिश ही की थी उसने 
जब मुझे दया की मूर्ति
त्याग की प्रतिमा
कहते हुए कहा था
देख लेना तुम मेरे लिए
दुनिया की 
सबसे सुंदर नारी हो।

आज समझ पायी हूँ
वर्षों बाद
जब वो बात बात पर 
कहता है
कुछ भी ठीक नहीं बनता तुमसे
कभी नमक ज़्यादा डालती हो
कभी चीनी ज़्यादा कर देती हो
इससे अच्छा तो 
मैं खुद ही बना लूँ 
स्वयं के लिए 
दो जून के खाना
पर वही खाना खा 
पूरी दुनिया
चटकारे लेती है।

कल उसे 
जिस साड़ी में मैं
परी सी नज़र आती थी
आज उसी में आउटडेटेड 
दिखती हूँ
जिस पायल की आवाज़ 
सबसे मधुर लगती थी
आज वही चुभती है तुम्हे
मेरा सृंगार
उसे चेहरे पे की गई
लीपा पोती लगता है
आज मैं उसे सादी ही
अच्छी लगती हूँ
जिसमे मैं 
किसी को नहीं भाती।

कल मैं दुनिया की
सबसे ममतामयी माँ
बनने के गुणों से भरी हुई थी
और आज कहते हो
कि वो मुझ पर गया है
तुम्हारा कोई गुण नही है उसमें
जैसा है
मेरे कारण है
संस्कारों की मूर्ति
तुम्हारे लिए कैसे
संस्कारों को ना मानने वाली 
बन गयी।

मेरा प्रेम आज भी 
वैसा ही है
स्वीकार रहीं हूँ
तुम्हारी सारी अवहेलनायें
उसी भाव के साथ
और आज भी वैसी ही हैं
तुम्हारी साजिशें।
जो खत्म ही नहीं होती।







मंगलवार, 17 सितंबर 2019

गीत :- जीते जी मर जाना सब कहते होंगे।




शायद इसको ही जीते जी 
मर जाना सब कहते होंगे
जब धमनी में रक्त नहीं 
जल बिंदु तरल हो बहते होंगे।

बनते हैं सुकरात रूढ़ियों से 
लड़ कर विष पीने वाले
ना जाने ये कैसे सब आरोप ,
सरल हो सहते होंगे।

शायद इसको ही जीते जी 
मर जाना सब कहते होंगे।

पीड़ा ने आतंकित होकर 
सुख की सांकल जब खटकाई
कैसे दुख को अपवर्तित कर , 
सदा विरल हो रहते होंगे।

शायद इसको ही जीते जी 
मर जाना सब कहते होंगे।

मीरा, सूर, कबीर  सरीखे , 
कितने क्रांति बवंडर आये
जिनके कंठों में अपनों के ,
दंश गरल हो बहते होंगे।

शायद इसको ही जीते जी 
मर जाना सब कहते होंगे।



स्वधा रवींद्र "उत्कर्षिता"


सोमवार, 16 सितंबर 2019

गीत :- मैं ध्रुव बन कर तड़पाऊँगा




मैं पंछी बन उड़ जाऊँगा
चिर निद्रा में सो जाऊँगा 
तुम मुझको अपना लो वरना
मैं दूर चला जाऊँगा

मैं पंछी बन उड़ जाऊँगा।

क्रंदन होगा सृंगार नहीं होगा मन में 
यदि मुझको कलरव का न तेरे गान मिला
मुझको दे दे ये दान नहीं तो जीवन का 
हर गान अधर पर ला कर मैं बतलाऊंगा

मैं पंछी बन उड़ जाऊँगा।

अनुभव की चक्की से जीवन को मत पीसो
बस वही करो जो ह्रदय तुम्हारा कहता है
एक ऐसा पल अन्यथा आएगा जीवन में 
जब अम्बर पर मैं ध्रुव बन कर तड़पाऊंगा

मैं पंछी बन उड़ जाऊँगा।





गीत:- सखि मन कि पीढ़ा को मन में ही रह जाने दो



मन की पीढ़ा को मन में ही रह जाने दो
सखी मत पूछो कुछ तुम मुझको मुस्काने दो ।

रह रह कर विकल हुआ करता है मन मेरा
रह रह कर भाव अधर पर भी आ जाते हैं
रह रह कर माँ की गोद बुलाती है हमको
रह रह बाबा के अंतिम वचन सताते हैं
भैया का लाड़ और बहनो का स्नेह सकल
कर याद मुझे फिर हर दुःख तुम बिसराने दो

सखी मत पूछो कुछ तुम मुझको मुस्काने दो
मन की पीढ़ा को मन में ही रह जाने दो

मैं ऊंची पैंग बढा करके छु लेती थी आकाश नया
मैं बंद पलक कर बुनती थी सपनो का माया जाल नया
मैं उत्सृनखल नदिया सी थी जो पत्थर तोड़ निकलती थी
रास्ते बना लेती थी खुद और लक्ष्य भेद ही रूकती थी
सत्यम शिवम् सुन्दरम का जब जाप ह्रदय कर उठता था
वो जीवन के अद्भुद अमोल पल तुम मुझको याद आने दो

सखी मत पूछो कुछ तुम मुझको मुस्काने दो
मन की पीढ़ा को मन में ही रह जाने दो

है मुझको ये मालूम तुम्हारे सम्मुख आ
मैं नयनों की गंगा प्लावित कर जाऊंगी
मैं भीष्म सरीखी एक शैय्या पर लेटी हूँ
उससे जन्मे सब ज़ख्म तुम्हे दिखलाऊँगी
बस इसीलिए हूँ मौन ,नहीं कुछ कहती हूँ
मुझको अपने प्रश्नों से तुम बच जाने दो।

सखी मत पूछो कुछ तुम मुझको मुस्काने दो
मन की पीढ़ा को मन में ही रह जाने दो ।





शनिवार, 14 सितंबर 2019

हिंदी मेरी मातृभाषा





जो सुंदर है सरल है और शाश्वत है वो हिंदी है
जो सजती भाल पर माँ भारती के सुर्ख बिंदी है
है जिसमे गद्य की गरिमा है जिसमे पद्य की लाली
बहुत व्यापक ,प्रचुर ,सामर्थ्य से सम्पूर्ण हिंदी है।

ऋचाओं से प्रकट होकर नये नित रंग पाए हैं
मेरी हिंदी ने रंगों से नए धनु फिर बनाये हैं।
वो ले आयी है अल्हड़ सा कबीरा आज दोहों में
है रंगत आज तुलसी की हृदय में घर के कोनों में।
कहीं रसखान बजते हैं कहीं मीरा बुलाती है
कहीं पर सूर के पद संग गोपी मुस्कुराती है।
नरोत्तम ने लिखे जो पद्य अपने ही नरोत्तम पे 
उन्हीं में नाचती राधा किशन के पास आती है।
भरी है भक्ति के रस से ,वो सब धर्मों की हिंदी है
तरी है जो अमर सच से , सनातन सिर्फ हिंदी है


जो सुंदर है सरल है और शाश्वत है वो हिंदी है
बहुत व्यापक ,प्रचुर ,सामर्थ्य से सम्पूर्ण हिंदी है।


अलंकृत है जो रस छंदों से भावों से कलाओं से
निपुण है जो सभी अभिव्यक्तियों में भावनाओं से
है जिसमे प्रेम भी वात्सल्य भी सृंगार भी, भय भी
है जिसमे राग भी,सुर भी ,नवल एक ताल भी ,लय भी 
की जिसको जानने में फिर से सदियां बीत जाती है
गुज़र कर आदि से भक्ति से ये कुछ भिन्न गाती है
इसे सब रीत कहते हैं कि जिसने रीत बदली है
नयी छाया में इसके बाद नई एक बेल निकली है।
की जिसके पुष्प जयशंकर, निराला ,पंत जैसे हैं
महादेवी से जिसके जन्म से कुछ गहरे रिश्ते हैं।
है जिसमें भावनाओं की प्रबलता सिर्फ हिंदी है
है जिसमें वेदनाओं की प्रवणता सिर्फ हिंदी है


जो सुंदर है सरल है और शाश्वत है वो हिंदी है
बहुत व्यापक ,प्रचुर ,सामर्थ्य से सम्पूर्ण हिंदी है।

तिरिस्कृत आज है हिंदी अपने घर के आंगन में
घिरी है आज फिर हिंदी किसी संकीर्ण साधन से
अटल ने जब अटल होकर किया जयघोष हिंदी का
कहीं तब शांत थोड़ा सा हुआ था रोष हिंदी का
चलो हम सब शपथ लें आज माँ का मान जोड़ेंगे
हैं हम सब पुत्र हिंदी के ना माँ का साथ छोड़ेंगे
हैं जिसमे आज भी दिनकर, हृदय को जोड़ने वाला
उसे अब कौन तोड़ेगा जो रस्ते मोड़ने वाला।
है जिसमें सादगी सम्पन्नता वो सिर्फ हिंदी है
है जिसमें आज और रस छंदता वो सिर्फ हिंदी है

जो सुंदर है सरल है और शाश्वत है वो हिंदी है
बहुत व्यापक ,प्रचुर ,सामर्थ्य से सम्पूर्ण हिंदी है।






स्वधा रवींद्र "उत्कर्षिता"



















शुक्रवार, 13 सितंबर 2019

मेरी आवाज

हाँ अच्छा है
की तुम तक
अब मेरी आवाज़ ना पहुंचे।

ये अब वैसी नहीं है 
जैसी तुमने थी सुनी पहले
की जिसमें खनखनाहट थी
सदा मुस्काती थी पहले
तुम्हें तो याद होगा ना
पहन पायल ये आती थी
ये आंगन में चहकती थी
छतों पर नाच आती थी
बहुत शैतान थी पहले
तुम्हें छिप कर सताती थी
कभी जब रूठते थे तुम
तुम्हे रोकर मनाती थी
मगर वो बीते लम्हे हैं
मैं तुमसे कह रही हूँ ना

हाँ अच्छा है
की तुम तक
अब मेरी आवाज़ ना पहुंचे।

की बजती तान थी जिसमे 
कभी मल्हार दीपक सी
है उसमें आज बजती वेदनाएं
राग भैरव सी
ये पहले श्याम की मुरली
की तरह गुनगुनाती थी
जो तितली देख ले कोई
तो पीछे दौड़ जाती थी
मगर अब मौन हो कर ये 
कहीं आंसू बहाती है
मैं तुमसे कह रही हूँ ना

हाँ अच्छा है
की तुम तक
अब मेरी आवाज़ ना पहुंचे।

बहुत मुश्किल घड़ी होगी
ये जब सम्मुख खड़ी होगी
तुम्हारे जिस्म में सारे
अजब सी सरसरी होगी
नहीं बर्दाश्त होगा तुमको इसका
ऐसा हो जाना
बहुत होगा कठिन प्रिय फिर
तुम्हारा मुस्कुरा पाना
ये अब है दर्द की गंगा
विहंगम हो गयी है ये
किसी नमकीन सागर से
लिपट कर सो गई है ये
कि इससे चाशनी अब दोस्त
प्यालों में नहीं गिरती
मैं तुमसे कह रही हूँ ना

हाँ अच्छा है
की तुम तक
अब मेरी आवाज़ ना पहुंचे।







स्वधा रवींद्र "उत्कर्षिता"

गुरुवार, 12 सितंबर 2019

छन्दमुक्त:-सांसारिक जामा



मुझे नहीं सुनना कुछ भी
ईश्वर के भजन
प्रेयसी के गीत
जुदाई की ग़ज़ल
दूरियों के दौरान लिखी नज़्म
सावन में गाये राग
रुबाई
और 
सूफी सन्तों की लिखाई
तुम्हारे न गाने की शर्त पर।

मुझे नहीं देखना कुछ भी
हरी भरी धरती
घना नीला तारों से भरा आकाश
फलों से लदे पेड़
गगनचुम्बी पहाड़
कलकल बहती नदी 
उत्ऋंखल झरने   
और 
मौन तालाब
तुम्हें न देखने की शर्त पर।

मुझे नहीं महसूस करनी
मनुष्य और जानवरों की गंध
फूलों और कलियों की सुगंध
और 
स्पर्शेन्द्रिय पर 
किसी और का स्पर्श
तुम्हारे न छूने की शर्त पर।

मुझे नहीं चाहिए
कुछ भी
लाल चूड़ियों से भरी कलाई 
वो जुगनू जैसी टिमटिमाती बिंदी, 
आँगन में छनछन करने वाली पायल, 
मीनाकारी की हुई बिछिया 
गोटा लगी अंगिया
और वो पीला वाला लहंगा
तुम्हारे न होने की शर्त पर।

समझते हो तुम ऊपर लिखे
हर शब्द का अर्थ
नहीं शायद नहीं
और अच्छा ही है
ना समझो तो 
जब तक न समझो
तब तक मैं तुमसे लड़ सकूंगी,
तुम्हारी परवाह कर सकूंगी 
और
बहुत सारे झूठ बोल 
प्यार को कोई और जामा पहना
तुम्हारे सामने रख सकूँगी
अपनी मांगों का पिटारा
जिसमें सांसारिक चीजों के अलावा
कुछ नहीं होगा
कुछ नहीं।






स्वधा रवींद्र "उत्कर्षिता"

बुधवार, 11 सितंबर 2019

छन्दमुक्त:-अनुत्तरित प्रश्न

सुनो
अब पुकारूँ
भी तुम्हें तो
तुम मुझे मत देना उत्तर
मेरे प्रश्नों का
शायद तुम्हारे ऐसा करने से
मैं तुमसे भिन्न
अपना अस्तित्व तलाश सकूँ
शायद ढूंढ सकूँ
अपने लिए 
कोई नया आकाश
शायद उड़ सकूँ
पंख पसार
विस्तृत वितान में।


सुनो
अब पुकारूँ 
भी तुम्हें तो
तुम मुझे मत देना उत्तर
मेरे प्रश्नों का
शायद तुम्हारे ऐसा करने से
मैं जीना सीख सकूँ 
तुम्हारे बिन
अभी तो जी रही हूँ 
हर पल हर क्षण तुम्हारे साथ
सुबह की 
पहली किरण के साथ,
इंद्रियों के जागते ही
तुम जाग जाते हो
मेरे ही अंदर
और जागते ही
गुनगुनाने लगते हो तुम
"अभी मुझमे कहीं 
बाकी थोड़ी सी है ज़िन्दगी"
और पनपते रहते हो मेरे अंदर
जीवन बन कर
सुबह से रात तक।


सुनो
अब पुकारूँ
भी तुम्हें तो
तुम मुझे मत देना उत्तर
मेरे प्रश्नों का
शायद तुम्हारे ऐसा करने से
मैं समझ सकूँ
कि मैंने अपने अंदर जो 
इस बात का 
मायाजाल बना रखा है
की तुम मेरे हो
वो टूट सके
वो विश्वास की दीवार 
जो इस सोच के साथ 
मैं रोज़ पुख्ता कर रही थी
की तुम समझते हो मुझे,
मेरे प्रेम को
और एक न एक दिन 
अवश्य सब छोड़ 
भाग कर आ लगोगे मेरे गले से
कभी वापस
ना जाने के लिए।


सुनो
अब पुकारूँ
भी तुम्हें तो
तुम मुझे मत देना उत्तर
मेरे प्रश्नों का
शायद तुम्हारे ऐसा करने से
कुछ हो सके मेरे इस 
अबाधित,
अप्रतिबंधित
बिना किसी शर्त 
किये गए प्रेम का 
जो तुम्हारी हर हाँ पर
करोड़ो गुना बढ़ जाता है 
कभी ना खत्म होने के लिए
भले तुम्हारी वह हाँ 
मेरे सवालों को सरलता से 
टाल देने का एक जरिया हों।


इसलिए कह रही हूँ बार बार
अब पुकारूँ
भी तुम्हें तो
तुम मुझे मत देना उत्तर
मेरे प्रश्नों का
कम से कम तब तक तो 
बिल्कुल नहीं
जब तक 
तुम्हें 
ये एहसास ना हो जाये
कि ये मात्र प्रश्न नहीं है
किसी का प्रयत्न है
हर पल तुम्हारे साथ रहने का
जब तक 
मुझसे पूछने के लिए 
तुम्हारे पास भी प्रश्नों का 
जमघट एकत्र ना हो जाये
जब तक
तुम्हे भी मेरे प्रश्नों की प्रतीक्षा
करना अच्छा ना लगने लगे
जब तक तुममे स्वयं
साथ होने की चाह ना जन्मे
और
जब तक तुम स्वयं न समझ सको
इस प्रेम को गहराई को
और स्वयं ना डूब जाना चाहो 
इस प्रेम वैतरणी में
अमर हो जाने के लिए।

आज कह रही हूँ तुमसे
मुझे प्रेम चाहिए 
कर्तव्य और दया नहीं,
इसीलिए
सुनो
अब पुकारूँ
भी तुम्हें तो
तुम मुझे मत देना उत्तर
मेरे प्रश्नों का।


स्वधा रवींद्र "उत्कर्षिता"





छंद मुक्त:-पिछले बीस साल

पिछले कुछ 
बीस सालों में
सुनी है तुमने 
मेरी बकबक।
याद है तुम्हें 
कहते थे तुम
सुबह से रात तक
बजती रहती थी मैं
तुमसे 
जाने क्या क्या 
कह देना चाहती थी
अपना उल्लास, उत्साह,
अपनी व्यग्रता
अपनी कुंठा
अपने सभी रहस्य
इसीक्रम में भूल जाती थी
ये सोचना
की क्या तुम 
समझ रहे हो 
मेरी भावनाएं।
तुम सुन रहे होते थे
मेरी असंख्य बातें
अपने सौ ज़रूरी काम निपटाते हुए
बीच बीच मे हूँ कह
सुने जाने का भरम पैदा करते।
आज कुछ बीस बरसों बाद
ये एहसास हुआ
तुमने तो कुछ सुना ही नहीं
वो जो मैंने चीख चीख कर
तुमसे कहा था।
अब ऊर्जा नहीं
कि तुम्हें समझा सकूँ 
अपनी वेदनाएं।
चिंता मत करो 
बोलना बन्द नहीं करूंगी मैं
बोलती रहूंगी तुमसे वैसे ही
बस भाषा बदल जाएगी
अब तुम्हें 
समझना होगा
मौन 
जिसमें मैं दिन के चारों पहर 
करूंगी
तुमसे बात।

प्रतिस्पर्धा



मेरी किसी से 
कोई प्रतिस्पर्धा नहीं
पर मैं तुम्हारे जीवन मे 
"प्रथम रहना चाहती हूँ"
हाँ मैं बस तुम्हारे साथ रहना चाहती हूँ|
मुझे नहीं पता कि
कैसे अभिव्यक्त करूं स्वयं को
बस इतना पता है
बहुत कुछ है 
जो मैं तुमसे कह देना चाहती हूं
हाँ मैं बस तुम्हारे साथ रहना चाहती हूँ|

तुम कहीं भी होते 
मेरी नज़रें तुम्हें तलाश ही लेती
तुम कहीं भी गुनगुनाते
मेरे कर्ण पटल पर अंकित हो ही जाते
तुम रंग बिखेरते तो मैं उन रंगों में
रंग ही जाती
तुम बोलते तो शब्द सार्थक होते
और तुम मौन होते तो ध्यान सार्थक होते
तुम प्रश्नों का उत्तर दे देते 
तो प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हो जाती मैं
और जब कभी तुम्हारे उत्तरों की प्रतीक्षा में
दिन रात गुजारने पड़ते 
तो जाने कितनी बार पराजित हो 
खुद को अपने ही प्रश्न पूछने पर 
कोसती मैं
पर कैसे तुम्हें जतलायें बतलायें
कि तुम कौन हो मेरे,
सांसारिक रिश्ते से 
परे है मेरा तुमसे रिश्ता
पर तुम जाने 
समझोगे भी या नहीं
इसीलिए कह रही हूँ
बहुत कुछ है जो मैं तुम्हे
समझा देना चाहती हूं
हाँ मैं बस 
तुम्हारे साथ रहना चाहती हूँ|
मेरी किसी से कोई प्रतिस्पर्धा नहीं
पर मैं 
बस तुम्हारे जीवन मे 
प्रथम रहना चाहती हूँ।

वो मुझसे रोज़ कहती थी 
एक अनोखे रिश्ते के बारे में
कहती थी वो मेरा सोल मेट है
समझ नही पा रही थी 
कौन से रिश्ता है ये
जाने कितने 
शब्द कोष तलाशे थे 
इस खोज में कि कहीं 
मेरा तुम्हारा रिश्ता यही तो नहीं
पर जितना तलाशती 
उतना और 
उलझ जाती थी मैं
तुझसे 
दूर होकर भी 
खुद को तेरे पास 
पाती थी मैं
नहीं मिलते थे 
गुण 
किसी भी 
परिभाषित रिश्ते के 
मेरे तुम्हारे रिश्ते से
जहां मैं 
खुद में बस 
तुझे देख पाती थी
सुखी होती तो तुम दिखते
दुःखी होती तो तुम दिखते
आंखों की सीमा 
ही उतनी हो गयी थी मेरी
कि तुम्हारे अतिरिक्त 
कुछ भी नहीं दिखता था मुझे
खुद में तुम
उसमें तुम
और तुममे भी 
तुम ही नज़र आते थे मुझे
मुझे समझ नहीं आता था
किसलिए इतना भाते थे तुम मुझे
ये जो 
पारलौकिक सा 
रिश्ता था ना 
मेरा तुम्हारे साथ
ये तुम्हे भी 
जतला देना चाहती हूँ
हाँ मैं बस 
तुम्हारे साथ रहना चाहती हूँ|
मेरी किसी से 
कोई प्रतिस्पर्धा नहीं
पर मैं 
बस तुम्हारे जीवन मे 
प्रथम रहना चाहती हूँ।

























मंगलवार, 10 सितंबर 2019

छन्दमुक्त :- श्रृंगार


लोग 
रोज़ रोज 
मुझसे पूछते हैं
की मैं क्यों नहीं लगाती 
आंखों में काजल
माथे पे बिंदी
मैं क्यों नही पहनती
हांथों में चूड़ी
कंगन और 
क्यों नहीं लगाती मेहंदी।

लोग रोज़ रोज़ मुझसे पूछते है
कि मैं क्यों नहीं गूंधती वेणी
क्यों नहीं डालती गजरा
क्यों नहीं पहनती 
मंगल सूत्र,
बिछिया और पायल।

क्या मुझे अपने शिव से प्रेम नहीं?
और उत्तर ना मिलने पर कहते हैं वे
परिणीता हूँ मैं

और मैं हँस देती हूँ
क्या बताऊँ उन्हें 
और क्या समझाऊं उन्हें
आंखों में काजल नहीं
उनके सपने सजा रखें हैं मैंने
माथे पे बिंदी नहीं 
उनका ध्यान लगा रखा है मैंने
हांथों ने कभी चूड़ी और कंगन 
की ज़रूरत ही महसूस ही नहीं की
मेरे हांथों में वो खनकता है
रोज़ लिखती तो हूँ
उनका नाम हांथों पर 
जाने कितनी ही बार अपनी उंगलियों से

एक बार उन्होंने खोली थी मेरी वेणी
और कहा था मुझे
नीलांजना 
बहुत सुंदर लगती हो तुम खुले गेसुओं में
और ये गजरा क्यों लगाती हो
तुम्हारे सौंदर्य की खुशबू 
इससे ज़्यादा भीनी है
और ये कहते वो मुस्कुरा के डाल देते थे
अपनी बाहों का हार
मेरे गले में डाल
और मेरे पैरों को
चूम कर कहते  
"इन्हें किसी सृंगार की ज़रूरत नहीं
इन्हें ज़मीन पर मत रखना 
मैले हो जाएंगे।"

तुम्हे किसी सृंगार की ज़रूरत नहीं
और मैं भी त्याग देती हूँ 
काजल बिंदी चूड़ी कंगन बिछिया
गजरा और मंगलसूत्र
जिनमें सजने के सपने लेकर 
आयी थी मैं
याद है मुझे 
माँ बाबा का वो कहना
उफ्फ
इसकी सुबह तो 
इसके इस पिटारे से
होती है
न जाने ये सज सवंर कर
किस राजकुमार के 
सपने बोती है।

वो चटकीला लाल सिंदूर
वो बड़ी लाल बिंदी 
वो लंबा वाला मंगलसूत्र
वो बिछुआ 
और
वो घुंघरुओं वाली 
छम छम करती पायल
कभी सोचा था 
पी के आंगन में 
रोज़ बजाऊँगी
चूड़ी, कंगन, पायल 
पर 
मेरा ये एक मात्र शौक 
उन्हें नहीं भाया था
इसीलिए तो
अपनी गुड़िया की शादी में भी 
दुल्हन की तरह सजने वाली मैं
सारे सृंगार छोड़ चुकी हूँ
और अपनी 
माँ बहन भाभियों के
चटकीले सृंगारों पर 
उन्हें निहार प्यार से कहते
अम्मा आज तो बड़ी जंच रही हो
का हो विम्मी 
किसके लिए 
लगाई हो ये बड़ी लाल बिंदी
कुंवर सा आ रहे है क्या
अरे भाभी लाल साड़ी 
तो तुमपर
खूब सज रही है
अम्मा देखो तो आज
भाभी क्या लग रही है

उनके कहे इन शब्दों में
ढूंढ लेती हूँ अपना सृंगार
हाँ शायद 
मैं प्रेम नहीं करती 
अपने शिव से।


स्वधा रवींद्र "उत्कर्षिता"



गीत:- पिंजर तोड़ निकल जायेगी

गीत


पिंजर तोड़ निकल जायेगी, मैना अपनी राह में
तू बैठा ही रह जायेगा , यहीं कहीं अभिमान में।

चार उठाने वाले होंगे , एक जलाने वाले सँग
कुछ सच्चे रंग वाले होंगे, कुछ के होंगे झूठे रँग
फूंक रहे होंगे सब रिश्ते बैठ वहीं शमशान में।

भले सिकंदर नाम तुम्हारा, खाली कर ही जाएगा
पंच तत्व का मटका खाली हो ,सागर ही जाएगा
और आत्मा अकुलायेगी मिलने को भगवान में।

नयन बंद कर, स्वांस थाम ले, और तरल खुद को कर ले
ज्ञान चक्र पर संयत हो जा, और सरल खुद को कर ले
मोक्ष द्वार बस तभी मिलेगा, जब बैठेगा ध्यान में।

गीता ने जो ज्ञान दिया , वो आत्मसात कर लेना है
अर्जुन सा साधक बन तुझको, लक्ष्य आप वर लेना है।
कर्मप्रधान बना जो जीवन, सुख ही सुख वरदान में।

पिंजर तोड़ निकल जायेगी, मैना अपनी राह में
तू बैठा ही रह जायेगा , यहीं कहीं अभिमान में।




स्वधा रवींद्र "उत्कर्षिता"

शुक्रवार, 6 सितंबर 2019

छंदमुक्त :- माँ होती तो

माँ होती तो



माँ होती तो
उतारती नज़र
लगाती काला टीका
लेती बलैयां
और सर के ऊपर से उतार
सदके में दे देती
दो चार आठ दस रुपैया
देख लेती अगर
दर्द की पराकाष्ठा को
नम हो 
आंखों से बहते
और मेरे झेले कष्टों को
पुनः मुझे सहते।

माँ होती तो
निहार लेती मेरा मुखड़ा
नहीं आने देती 
मेरे नज़दीक 
ग़म का 
एक भी टुकड़ा,
फिर शायद नहीं होता
मेरे भी जीवन में 
कोई भी
कहीं भी
कम या ज़्यादा
एक या आधा
कैसा भी दुखड़ा।

माँ होती तो
मैं उम्र दराज़ होकर भी
खेल रही होती
गुड़िया गुड्डे का खेल
मेरा भी आजीवन रहता 
सपनों से मेल
मैं भी चटकारे ले ससुराल के किस्से
मैके में सुनाती
और मायके जाने पर 
माँ ने क्या दिया है
सासरे में दिखाती
रोती , हंसती
भावनाओं की पेंगे कसती
और ज़रा सा भी कष्ट आने पर
बस अम्मा की गोदी में बसती।

माँ होती तो 
ये बीमारियाँ नहीं होती
न डिप्रेशन, न ब्लड प्रेशर
न जीवन को मिला होता
बुरे अनुभवों का थ्रेशर
वो पलंग के चार चक्कर काट
अपना लेती मेरे सभी कष्ट
और उसके आशीषों से कट जाते
संघर्षों के वक़्त
माँ होती तो आंखों में दुख के नहीं
सुख के आँसू होते
माँ होती तो हम खिलखिला के हंसते
शायद कभी नहीं रोते
माँ होती तो 
नहीं लिखी गयी होती
ये कविता
माँ होती तो कभी नहीं बहती
वेदनाओं से भरी ये सरिता।







स्वधा रवींद्र "उत्कर्षिता"

गुरुवार, 5 सितंबर 2019

गणपति वंदना



हे विघ्न विनाशक एकदंत
तुम आज पाप का करो अंत
तेरे मस्तक पर साज रहे
नक्षत्र सूर्य और कोटि चंद्र

लंबोदर यह भी ध्यान रखो
भरने हैं तुम्हे उदर लाखों
एक बार त्याग कैलाश 
माई की गोद इधर भी तुम झाँको
सुरभित कर दो ये सकल सृष्टि
वृष्टि से इसे बचा लेना
हे गणपति आँगन में मेरे
तुम अनगिन कुसुम खिला देना
तुम रिद्धि सिद्धि के पोषक हो

जग से हरना सारे प्रपंच

हे विघ्न विनाशक एकदंत
तुम आज पाप का करो अंत।

हे विघ्नहरण हे सदानंद
जीवन के विघ्न हरो सारे
हे महादेव सुत भक्तों के
आकर संताप हरो सारे
बच्चों को दो नव संस्कार
माँ और पिता का मान करें
गुरु की सेवा में रत हों नित
सबका हर पल सम्मान करें
सबको वह शक्ति प्रदान करो
देखे तो जग रह जाये दंग

हे विघ्न विनाशक एकदंत
तुम आज पाप का करो अंत।

कुर्सी पर बैठें लोगों को
सिद्धांत महामानव से दो
सब द्वेष कलुषता हर लो प्रभु
मानवता का विकास भी दो
हर अबला को सबला करके
तुम शक्ति सरीखा कर देना
लेखनियों में भी अग्नि सजा
तुम धर्म युध्द को बल देना 
हे चंद्रभाल धारण करने वाले 
कर दो इतना प्रबंध

हे विघ्न विनाशक एकदंत
तुम आज पाप का करो अंत।

तुम आज पधारे हो घर में
आये हो तो यह काम करो
तुम घर आँगन के साथ 
हमारे मन मंदिर  वास करो
आशीष शीश पर कर रख कर
तुम सबको नित्य प्रदान करो
अपनी समस्त शक्तियों से
तुम इस जग का उत्थान करो
इतना सार्थक कर दो जीवन
बच्चे हम पर लिख दें निबंध

हे विघ्न विनाशक एकदंत
तुम आज पाप का करो अंत।




स्वधा रवींद्र"उत्कर्षिता"


बुधवार, 4 सितंबर 2019

छंद मुक्त:- तुम्हें पता है





तुम्हें पता है
जब तक
तुम मेरे प्रश्नों के उत्तर में
मौन नहीं त्यागते
तब तक
मेरी आँखें अपलक
देखा करती हैं रास्ता 
तेरे शब्दो का।
जानता है मेरा हृदय
कि ये जान कर 
नहीं करते हो तुम
बस हो ही जाता है,
क्योंकि व्यस्तता के घेरे में ,
तुम्हारे पास सबके लिए 
थोड़ा ही सही 
पर होता है समय,
देखा है मैने तुम्हें 
लोगों के प्रश्नों के उत्तर देते,
उन्हें फ़ोन करते ,
उनके लिए संवेदनशील होते
और अक्सर 
उनसे मिलने जाते।
पर न जाने 
मेरे ही प्रश्नों का उत्तर
मौन क्यों चुना है तुमने।
जब भी कुछ लिख भेजा है तुम्हें
युगों जितनी प्रतीक्षा करनी पड़ी है मुझे
तुम्हारे एक शब्द को सुनने के लिए
हाँ या यदा कदा नहीं।
पर तुम जानते हो 
नहीं होती तुमसे कभी भी
कोई भी शिकायत
क्योंकि मैं जानती हूँ
एक तरफा प्यार
और 
अकेले बनाये 
रिश्तों की परिणति
ये मौन ही है।



स्वधा रवींद्र "उत्कर्षिता"