मम अंतर्नाद

मम अंतर्नाद
मेरा एकल ग़ज़ल संग्रह

गुरुवार, 30 जून 2022

मर जाने दे

 



जुनून ए इश्क़ मुझमें पूरा उतर जाने दे

मैं तेरे प्यार में मर जाऊँ तो मर जाने दे


ज़ख़्म मरहम के नहीं मुंतज़िर रहे मेरे

इनको तू अपनी छुअन भर से ही भर जाने दे।। 


तुम्हें फ़राग मुबारक मुझे ये बेसब्री

अब मेरी तिश्नगी को हद से गुज़र जाने दे।। 


तमाम उम्र जिन्हें हमने छिपा कर रखा, 

सामने आके तू वो दर्द उभर जाने दे।। 


तुझको गर देखना है कैसी हूँ तन्हाई में

फ़िर मुझे यार मेरे खुल के बिखर जाने दे।। 


मैं ख़ुद को ढूँढने में रस्ते से बे रस्ता हुआ

अब मेरे साथ है तू, अब तो सुधर जाने दे।। 


सासरे में हूँ, ये लगता है,देख कर दुनिया

अब तो मुझको तू वालिदैन के घर जाने दे।। 


ओ मेरे कृष्ण सर पे हाथ रख के आज ज़रा

इस स्वधा को भी तू राधा सा सँवर जाने दे।। 



बुधवार, 29 जून 2022

 एक मुक्तक


यही सत्य है इस धरती पर, अब बस यहाँ दिखावा होगा

मन पर लगे रहेंगे जाले, पर सुंदर पहनावा होगा

करने से ज्यादा बतियाना संस्कार में आ जायेगा

फ्रेंडशिप बैंड हाथ में होंगे, फेंका हुआ कलावा होगा।।

मंगलवार, 28 जून 2022

हमरे पीछे पड़ गए भैया


 



उनका कौनो मिला नाहिं तो 

हमरे पीछे पड़ गए भैया

दैया दैया दैया मोरी मैया मैया मैया


एक जरा सी बात कहिन हम 

उई उका का से का कर दिहिन

मक्खी जइसे बन कर चिपके

पूरा दिन हुई भिन भिन भिन भिन

हाथ जोर हम बिनती कीन्हे

पर उई चिपके जैस ततैया


दैया दैया दैया मोरी मैया मैया मैया।। 


सीधन के सब समझै भकुआ

ई दुनिया कै रीत पुरानी

जब तक सर पै छाँव रही 

हम तब तक ई सच जान न पानी

मिलत गए हंकवैया पल पल

बातन में फंस गयी चिरैया


दैया दैया दैया मोरी मैया मैया मैया।। 


जो जइसन है उनका वइसन 

ही व्यहवार दिखाया जाए

अंग्रेजी झाड़े वाले से

का हिंदी बतियाया जाए

जैसन देस भेस वैसन ही

समझ गयी उई नान्ह बिलइया


दैया दैया दैया मोरी मैया मैया मैया।। 


बदल लिहिस वह कपड़ा लत्ता

अंदर मीठी बाहर छत्ता

समझ गई पिछलग्गू मिलिहैं

रोज नई तरह से छलिहैं

ई कलयुग में आ ना पईहैं

रक्षा करने मोर कन्हैया


दैया दैया दैया मोरी मैया मैया मैया।। 


सोमवार, 27 जून 2022

किस तरह बोलो तथागत



हिमशिला पर आज लेटी सोचती हूँ प्राण प्यारे... 

तुम नहीं मिलते मुझे तो मैं स्वयं को हार जाती

किस तरह बोलो तथागत मैं धरा के पार जाती!!!! 


पूर्व जन्मों से लिखा कर लाई थी व्यहवार सारे

किसका बनना है सहारा और हूँ किसके सहारे

तुम मिले तो कह सकी सब अन्यथा बस मौन रहती

शांत सी सरिता बनी मैं सिर्फ बहती सिर्फ बहती

तुम नहीं मिलते अगर तो किस तरह उद्धार पाती


तुम नहीं मिलते मुझे तो मैं स्वयं को हार जाती

किस तरह बोलो तथागत मैं धरा के पार जाती!!!! 


साथ मेरे तुम चले तब, जब नियति भी साथ ना थी

भाग्य वाली कोई रेखा जब हमारे हाथ ना थी

देखते थे जब सकल नक्षत्र टेढ़ी दृष्टि करके

राहु केतु और शनिश्चर भी चले थे वृष्टि करके

तुम ना आते तो कृपा गुरु की ना मेरे द्वार आती


तुम नहीं मिलते मुझे तो मैं स्वयं को हार जाती

किस तरह बोलो तथागत मैं धरा के पार जाती!!!! 


काठ की सीढ़ी जिसे मैं देख कर डरती रही थी

श्वेत चादर ओढ़ने से मैं सदा बचती रही थी

आज वे दोनों मुझे शृंगार जैसे लग रहे हैं

पी मिलन के स्वप्न, देखो आज उर में सज रहे हैं

तुम ना आते तो मेरी ख़ातिर न ये अगियार आती


तुम नहीं मिलते मुझे तो मैं स्वयं को हार जाती

किस तरह बोलो तथागत मैं धरा के पार जाती!!!! 

रविवार, 26 जून 2022

आपन टाइम खोट करे




चला बतावा तुमही तोहसे झगरा कौन करे

काहे बैठल बैठल आपन टाइम खोट करे


बिना कुछौ जाने तुम बक बक की मसीन बन जात

अगड़म बगड़म कुछौ बकत हो, जाने का हो खात

तुम लिख दयो तो महाकाव्य है हम लिखें बकवास

तुम्हारा चावल चावल जैसा हमारा गीला भात


तुमका कछु समझा कर काहे बुद्धि मोट करे

काहे बैठल बैठल आपन टाइम खोट करे।। 


हम कुच्छौ लिख देयी, भले तुम उइका बूझ न पावो

पर बिन जाने बिन कछु समझे आपन टांग अड़ावो

दोस मढ़े मा तुमसे कौनो पार नहीं पा पावा

राम लला को रावन बोल्यो, कृष्ण को एक छलावा


तुमसे बहस करे में काहे लोटम लोट करे

काहे बैठल बैठल आपन टाइम खोट करे।। 


बड़बोले बस कहा करत हैं, सुनत नहीं कछु बात

उनके आगे कौनो की अब कोई ना औकात

छोटन का तो छोड़ो उई बड़कन का हड़कावत हैं

बात बात पर आपन कथा कहानी उई गावत है


बड़बोलन से काहे बोलो झोंटम  झोंट करे

काहे बैठल बैठल आपन टाइम खोट करे।।

शनिवार, 25 जून 2022

कभी मुझको रुलाता है!!


 



मुझे घर का मेरे सामान, तुम तक लेके आता है

कभी मुस्कान देता है, कभी मुझको रुलाता है!! 


घड़ी जब देखती हूँ मैं टंगी दीवार पर है जो

कभी बारह पे अटका मन, कभी बस छह बजाता है!! 


मुकर्रर वक़्त दो ही थे मिलन के और जुदाई के

ख्यालों में अभी भी तू, समय पर आ ही जाता है!! 


निवाला अब भी तब जाता है मेरे हलक से नीचे

तू साढ़े तीन पर जब अपना खाना खा के आता है!! 


मैं रो पड़ती हूँ अब भी उस जगह पर अपने कमरे में

जहाँ पर बैठ कर मन तेरे लिखे गीत गाता है!! 


तुझे मालूम  है किस हाल में है जिंदगी मेरी

तेरा यूँ छोड़ कर जाना मुझे कितना सताता है!! 


मेरे स्क्रीन पर अब भी तेरी तस्वीर रहती है, 

मेरा मोबाइल तेरी कॉल पर सब भूल जाता है!! 


नहीं होकर भी मेरे साथ में वो इस तरह से है, 

मैं देखूँ आईना तो अक्स बन कर झिलमिलाता है!! 


कभी थामा था तेरा हाथ हमने अपने हाथों में

बिछड़ कर तुमसे मेरा हाथ अब तक कंपकंपाता है!! 


अगर तुम नाम में अपने किशन लिखते हो तो सुन लो

किशन वो है जो राधा को कभी ना छोड़ जाता है!! 


स्वधा का अर्थ है खुद में स्वयं को धार कर रखना

मगर अब ख़ुद में भी देखूँ, नज़र बस तू ही आता है।। 



शुक्रवार, 24 जून 2022

कृष्ण प्रेम



पनघट पर जा राधा रानी, श्याम की बाँट निहार रही हैं,
सर पर मटकी, मटकी पे मटकी, मटकी पे मटकी संभाल रही हैं,
जाने कहाँ हैं छिपे गिरधारी, वो वन उपवन मे पुकार रही हैं
मन की किवड़िया न खोलें लली बस, बाहर कृष्ण गुहार रही हैं।।

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छोड़ के मोहन जब से गए, सुध बुध खो बईठी है होके दीवानी,
साज सिंगार न भावे लली को, बहे बस दुइनन आँख ते पानी,
टेर रही बस एक ही राग, मुरारी मुरारी मुरारी मुरारी
या तो हमें अब मुक्त करो हरि, या फिर हिस्से में दो गिरिधारी।।

गुरुवार, 23 जून 2022

दाँव पर फ़िर दाँव



दाँव पर फ़िर दाँव पर फ़िर दाँव पर फ़िर दाँव 

कंटकों पर पाँव पर फ़िर पाँव पर फ़िर पाँव!! 


धूप में जलता रहा माली सदा ही, और जग के 

सर रही बस छाँव पर फ़िर छाँव पर फ़िर छाँव!! 


बढ़ रहा है क्षेत्रफल परिमाप अब शहरीकरण का

घट रहे हैं गाँव पर फ़िर गाँव पर फ़िर गाँव!! 


भीड़ है हर ओर, चलते और ठहरे लोग लेकिन

अब नहीं है ठाँव पर फ़िर ठाँव पर फ़िर ठाँव!! 


लोग अब जब बोलते हैं प्रेम के स्थान पर गिरती है

केवल आँव पर फिर आँव पर फ़िर आँव!! 


देखने में लग रहे थे कोकिला कोयल सरीखे जो गले वो

कर रहे हैं काँव पर फ़िर काँव पर फ़िर काँव!! 


बुधवार, 22 जून 2022

तज़रबा नया गढ़ना होगा!!



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लोग कहते हैं कि लिखना है तो पढ़ना होगा

हमको लगता है तज़रबा नया गढ़ना होगा!!  

यूँ तो स्वेटर वो पुराना भी गरम कर देगा

नई डिज़ाइन जो चहिये तो उधड़ना होगा !! 

मंज़िलें यूँ ही नहीं मिलती हैं माँगे से कभी

कर्म की राह पे चल भाग्य से लड़ना होगा!! 

दूर रहने से भला आग कहाँ जलती है

आग के वास्ते पत्थर को रगड़ना होगा!! 

यूँ तो फैले हो फैल सकते हो इससे ज़्यादा

पर अगर छेद हो छोटा तो सिकुड़ना होगा!! 

मिलने को तुझको तो मिल जायेगा सबकुछ लेकिन

हीर बनने के लिए तुझको बिछड़ना होगा!! 

कृष्ण भी लौट आयेंगे तेरे बुलाने से

शर्त बस ये है तुझे प्रेम में कढ़ना होगा!! 

उसकी तकलीफ़ समझने के लिए तुझको भी

चंद लम्हों के लिए उस सा उजड़ना होगा!! 


तुमको सुकरात से है इश्क़ और मीरा सा जुनून

विष का प्याला तुझे फिर ख़ुद से ही गढ़ना होगा!! 


देख ले सोच ले आसान नहीं है ये स्वधा

उसको पाने के लिए ख़ुद से झगड़ना होगा!! 

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शनिवार, 18 जून 2022

हार मिलेगी प्यार में


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सखी सुनो तुम बचकर रहना 

हार मिलेगी प्यार में

सारे लक्षण एक जैसे हैं 

तेरे मेरे यार में...... 


उसके हित की ख़ातिर

हर मंदिर में माथा टेकोगी

उदर और जिह्वा की खातिर

गर्म रोटियाँ सेकोगी

तुम उसके खाने के पहले 

कुछ भी ना खा पाओगी

जिस पथ पर वो जायेगा

तुम उस पथ कदम बढ़ाओगी

तुम ही बोलो क्या रखा है

अब ऐसे अनुचार में


सारे लक्षण एक जैसे हैं 

तेरे मेरे यार में...... 

सखी सुनो तुम बचकर रहना 

हार मिलेगी प्यार में


उसके दिये कष्ट भी सारे

मन से तुम अपनाओगी

उसके रस्ते के सब काँटे

पलकों से बिन लाओगी

अगर ज़रूरत पड़ी प्राण तक 

उसके हित में देदोगी

फ़िर भी ना समझा वो

तो बस मुस्का कर तुम रो दोगी

फ़िर भी ना समझे निर्मोही

क्या ऐसे अधिकार में


सारे लक्षण एक जैसे हैं 

तेरे मेरे यार में...... 

सखी सुनो तुम बचकर रहना 

हार मिलेगी प्यार में


तुम अपना सर्वस्व लुटा कर 

मौन खड़ी रह जाओगी

लेकिन प्रिय है हठी बहुत

यह तय है कुछ ना पाओगी

तुम प्रश्नों पर प्रश्न करोगी

वो बस चुप रह जायेगा

हिस्से में तेरे भी आली

केवल दुख ही आयेगा

लाभ नहीं है हानि लिखी है

केवल इस व्यापार में


सारे लक्षण एक जैसे हैं 

तेरे मेरे यार में...... 

सखी सुनो तुम बचकर रहना 

हार मिलेगी प्यार में


जान रहीं हूँ अली तुम्हें

मैं कुछ समझा ना पाऊँगी

चाहे अपना मर्म गीत 

मैं पुनः पुनः दोहराऊँगी

तुम जैसी हो वही रहोगी

सदा समर्पित प्रेम पगी

उसकी हित में दिन दिन मरती

रातों को बिन बात जगी

आयेगा ना कोई अंतर 

कभी तेरे इस प्यार में


सारे लक्षण एक जैसे हैं 

तेरे मेरे यार में...... 

सखी सुनो तुम बचकर रहना 

हार मिलेगी प्यार में


प्रेम वही है जिसमें समझ बूझ

का कोई काम नहीं

झुक कर भी यदि प्रिय मिल जाए

तो कोई अभिमान नहीं

तुम भी यही सोच रखती हो

जान रहीं हूँ मैं आली

इसीलिए बस छेड़ रही थी

तेरे प्रिय को दे गाली

सर्वाधिक आनंद मिला है

प्रिये मुझे इस हार में


सारे लक्षण एक जैसे हैं 

तेरे मेरे यार में......

सखी सुनो तुम बचकर रहना 

हार मिलेगी प्यार में


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शुक्रवार, 17 जून 2022

विज्ञान और प्रेम

 

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व्यक्तिगत अनुभव से अपने कह रही हूँ, 

वो स्वयं को आप ही छलने लगा है.. 

है सदा से भिन्न कुछ विज्ञान उनका

प्रेम की राहों पे जो चलने लगा है!! 


हर क्रिया के बाद उतनी ही मिलेगी, 

प्रतिक्रिया विज्ञान ने यह कह दिया था, 

जिस दिशा में बल लगाओगे चलेंगी

वस्तुएं यह ज्ञान न्यूटन ने दिया था... 

फिर भला क्यों प्रेम के बदले कभी भी, 

प्रेम ही परिणाम में ना हाथ आया

जिस दिशा में मन चला नित ही हमारा 

उस दिशा में प्रिय क्यों कर चल ना पाया

प्रेम का आभास जिसको हो गया है

वो हिमाँको पर पहुँच गलने लगा है


व्यक्तिगत अनुभव से अपने कह रही हूँ, 

वो स्वयं को आप ही छलने लगा है!! 


कर्म तो रेखीय गति में कर रहा था

भाग्य की गति किंतु कुछ वक्रीय सी थी

थे लगाए सूत्र सब गति के नियम के

चाल भावों की मगर चक्रीय सी थी

तुम पलायन वेग से आगे बढ़े थे 

किंतु जाना ना घटित होना लिखा था

प्रेम का बल तेज था इतना हमारे

वो गुरुत्वाकर्ष से कईयों गुना था

जानते हो वो परे सिद्धांत से हर

जो प्रिये का अनुकरण करने लगा है


व्यक्तिगत अनुभव से अपने कह रही हूँ, 

वो स्वयं को आप ही छलने लगा है!! 


कह रहा विज्ञान जितना डूबता है

ठीक उतना द्रव्य विस्थापित हुआ है

किंतु जो बैठा विरह का दाब लेकर

प्रेम में वो नित्य उत्थापित हुआ है

है बताता दीप्ति की गति तेज सबसे

किंतु मन उससे भी आगे भागता है

'घात वह' ना रोक पाता तड़ित चालक

जो विरह की वेदना से जागता है

सत्य यह है प्रेम के संपर्क में आ

हर नियम विज्ञान का टलने लगा है


व्यक्तिगत अनुभव से अपने कह रही हूँ, 

वो स्वयं को आप ही छलने लगा है!!


कह रहे हैं आज कल के सब पुरोधा

सिर्फ धन और ऋण ही आकर्षित हुए हैं

किंतु जिनके मन समर्पण से जुड़े हों

ये नियम उनको भला क्या छू सके हैं

दूरियाँ बढ़ जाएँ या आवेश कम हो

नेह के बल तो सदा खींचा करेंगे

प्रेम शीतल है मगर आधिक्य हो तो

प्रेम में प्रिय आँख हम भींचा करेंगे

नेह के बंधन में जो भी बंध गया है

वो बिना घर्षण के ही जलने लगा है


व्यक्तिगत अनुभव से अपने कह रही हूँ, 

वो स्वयं को आप ही छलने लगा है!! 


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बुधवार, 15 जून 2022

मेहंदी चटक हुयी है मेरी

 


मेहंदी चटक हुयी है मेरी

नाक पे सेंदुर आया है

कहता है वो प्यार नहीं है

अब ये कैसी माया है। 


अधरों से उसने मेरे माथे जब मोहर लगायी थी

तब कुमकुम की लाली हमने अपने भाल सजायी थी

भंगिमाओं के बीच नृत्य तब करने सूरज आया है

जब बिंदिया ने माथे पर सज मेरे भोर उगाया है


कहता है वो प्यार नहीं है

अब ये कैसी माया है। 


धीमे से आकर जूड़े को जब था उसने खोल दिया

अब ना केश बँधेगे मेरे, मैंने भी ये बोल दिया

कंगन ने जब चूड़ी के संग अपना बैर निभाया है

तब पायल की छम छम ने मन का आँगन भरमाया है


कहता है वो प्यार नहीं है

अब ये कैसी माया है। 


लहंगे ने भी लाली छोड़ी, चोली भी गुस्साई थी

चूनर ने जब उन दोनों से उल्टी रीत निभाई थी

जब छलिया ने छोड़ सकल छल मेरा मान बचाया है

तब जाकर मन पल्लव मेरा अंतस तक हर्षाया है


कहता है वो प्यार नहीं है

अब ये कैसी माया है। 

सोमवार, 13 जून 2022

प्रेम का परिमाप


 

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स्नेह का परिमाप कितना है बताओ

और मन का क्षेत्रफल कितना घिरेगा

कुछ बचेगा क्या स्वयं के वास्ते भी

या सकल अस्तित्व प्रिय पर मर मिटेगा.... 


क्या बराबर चिन्ह के दोनों तरफ़ की

वेदना संवेदना एक सी रहेगी

क्या हमारे प्रेम की परिणाम मात्रा

चक्र वृद्धि ब्याज़ के जैसे बढ़ेगी

तुम बताओ लाभ हानि का गणित कर

है मुनाफा या हमें घाटा मिलेगा


कुछ बचेगा क्या स्वयं के वास्ते भी

या सकल अस्तित्व प्रिय पर मर मिटेगा.... 


क्या कभी वो बिंदु तज अपनी परिधि को

केंद्र पर मिलने की ख़ातिर आ सकेगा

क्या कभी गणितीय सूत्रों को लगा कर

दूरियों को वो सभी सिमटा सकेगा

तुम बताओ है कोई ऐसा समुच्चय

जो हमें एक संघ सम मिलवा सकेगा


कुछ बचेगा क्या स्वयं के वास्ते भी

या सकल अस्तित्व प्रिय पर मर मिटेगा.... 


क्या कभी उनका हृदय भी ढूंढ लेगा

प्रेम के पन्ने पे लिखे सूत्र सारे

क्या कभी भी सिद्ध होंगी वो प्रमेयें

जिनको करने में सभी विद्वान हारे

तुम बताओ प्रेम के कम्पास पर रख

भाव की पेंसिल से कुछ भी बन सकेगा


कुछ बचेगा क्या स्वयं के वास्ते भी

या सकल अस्तित्व प्रिय पर मर मिटेगा.... 


छोड़ दें गर सब गणित, दो पक्ष भी विपरीत कर दें

हम सकल स्थान खाली कुछ ग़लत मानों से भर दें

जोड़ दें अपने सकल सुख, कष्ट सब उनके घटा दें

और इन राहों पे चलने में, स्वयं को ही मिटा दें

तुम बताओ इस तरह का अवकलन क्या हो सकेगा


कुछ बचेगा क्या स्वयं के वास्ते भी

या सकल अस्तित्व प्रिय पर मर मिटेगा.... 


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स्वधा रवींद्र उत्कर्षिता

रविवार, 12 जून 2022

तुम गगन में पंख खोलो

 



मैं धरातल पर रहूँगी

तुम गगन में पंख खोलो.... 


कोई तो हो जो तुम्हें अपलक निहारे

देख कर उड़ता हुआ तुमको 

हिलाये हाथ, नीचे से पुकारे

कोई हो जो दे तुम्हें उत्साह 

उड़ने का गगन में

और नीचे बैठ कर देखे तुम्हें पूरी लगन से

और कहे पर और खोलो


मैं धरातल पर रहूँगी

तुम गगन में पंख खोलो.... 


है बहुत आसान उड़ना छोड़ धरती

जानती हूँ मैं सदा से

किंतु फ़िर भी बाँध रखती हूँ 

स्वयं को इस धरा से

मैं अकेले बादलों के पार जा सकती हूँ लेकिन

चाहती हूँ 'आओ मेरे साथ उड़ने'

वाक्य यह मेरे लिए अब तुम ही बोलो


मैं धरातल पर रहूँगी

तुम गगन में पंख खोलो.... 


जानती हूँ मैं महत्वाकांक्षाएं

जो तुम्हें फ़िर लौट कर आने न देंगी

हैं जहाँ बसते तुम्हारे प्राण प्रिय यह

वो धरा तुमको कभी पाने न देंगी

सिर्फ़ मैं ही एक कड़ी हूँ

जिसकी खातिर लौट आओगे 

प्रिये यह सत्य खोलो


मैं धरातल पर रहूँगी

तुम गगन में पंख खोलो.... 

शनिवार, 11 जून 2022

और तू मुझे विशेष प्रिये

 


जीवन के इस अर्धशतक में

जो अब हिस्से शेष प्रिये

सोचा था एक एक पल होगा

प्रेम सिक्त अधिशेष प्रिये!! 


जब तुम प्रथम सामने आये 

जैसे सुध बुध भूली थी

पाकर तुमको मन ही मन में 

देव ख़ुशी से फूली थी

छिप कर तुम्हें निहारा था तब

मित्रों बीच सराहा था

उसी दिवस की भाँति श्याम फिर

उस किवाड के पीछे से

मैं तुमको प्रिय फिर देखूंगी

छिप कर के निर्निमेष प्रिये!! 


जीवन के इस अर्धशतक में

........... प्रेम सिक्त अधिशेष प्रिये!! 


पायल कंगन करधन अपनी

सब उतार रख आई थी

शोर मचा ना दें ये सब मिल

सोच सोच घबराई थी

अब आंगन भी अपना ही है

छत भी नहीं पराई है

लोक लाज की कोई फ़िकर ना

कब की ये, कुडमायी है

फिर भी मन में  एक लालसा

धरूं पुनः वह भेष प्रिये


जीवन के इस अर्धशतक में

........... प्रेम सिक्त अधिशेष प्रिये!! 


वो भी एक पल था प्रिय जब मैं

हर गोपी से डरती थी

सूने पनघट पर जा जा कर

अपनी गागर भरती थी

खोने का भय ऊंचायी पर

'ना पाने का' डर भारी

जब तक था प्रिय तब तक मैंने

हर जीती बाजी हारी

अब तुझमें मैं दिख जाती हूँ

और तू मुझे विशेष प्रिये


जीवन के इस अर्धशतक में

........... प्रेम सिक्त अधिशेष प्रिये!!