मम अंतर्नाद

मम अंतर्नाद
मेरा एकल ग़ज़ल संग्रह

सोमवार, 16 दिसंबर 2019

गीत:- श्याम नहीं घर आये हैं

मेरे कान्हा के लिए



अखियाँ मेरी कैसे सोएं
श्याम नहीं घर आये हैं
माखन के छीकें ना टूटे
गैया भी रंभाये है।

उसे नहीं है भान ज़रा सा
उसके बिन सब सूना है
रात्रि अभावों वाली है और
मन विस्मित हो घूमा है
अंतर मन है दुखी बहुत
अँखियों में बादल छाए हैं

अखियाँ मेरी कैसे सोएं
श्याम नहीं घर आये हैं।

आंगन मौन पड़ा है मेरा 
ढूंढे है तुझको कण कण
हाथ हाथ है खोजे तेरा
मन को है बस एक लगन
कान्हा तेरे लिए यशोदा 
का मन तरसा जाए है

अखियाँ मेरी कैसे सोएं
श्याम नहीं घर आये हैं।

जाने कैसी प्रीत कि तुम बिन
भूख प्यास सब हर जाती
तुझको किसी गोद मे देखूँ
जीते जी मैं मर जाती
तुम हो तो सब कुछ सुंदर है
तुम बिन मन अकुलाए है

अखियाँ मेरी कैसे सोएं
श्याम नहीं घर आये हैं।

सूख गए अब नयन माई के
ढूँढत ढूँढत पैर थके
जाने कौन गली में जाके
जसुदा के नंदलाल बसे
प्राण छोड़ कर देह, ढूंढने 
अपने हरि को जाए है,

अखियाँ मेरी कैसे सोएं
श्याम नहीं घर आये हैं।





रविवार, 15 दिसंबर 2019

गीत :- जोगी

गीत


हरे रंग का चोला डाले नाच रहा था जोगी
था वो भोला भाला मन का और था वो मनमौजी

ना जग की चिंता थी उसको , न कोई भी डर था
कर्म किये जाता था हँसके , वो ख़ुशियों से तर था
जो अंदर था वही बांटता था वो अद्भुद जोगी

हरे रंग का चोला डाले नाच रहा था जोगी।

जान रहा था पंचतत्व का मटका कुछ दिन का है
जो जीवन अनवरत चल रहा केवल पलछिन का है
एक एक पल झोली में संजोए जाग रहा था जोगी,

हरे रंग का चोला डाले नाच रहा था जोगी।

जिस दिन मैना उड़ जाएगी पिंजरा खाली होगा
उस दिन इस पिंजरे का कोई मोल नहीं फिर होगा
मैना को हरि से मिलवाले , लेने आया जोगी

हरे रंग का चोला डाले नाच रहा था जोगी।

पांवों में पड़ गयी बिवाई, मन हर पल ही टूटा
जब जीवन मे चलते चलते हर एक रिश्ता छूटा
फिर गीता का ज्ञान करा कर मुस्काया था जोगी

हरे रंग का चोला डाले नाच रहा था जोगी




स्वधा रवींद्र "उत्कर्षिता"


बुधवार, 11 दिसंबर 2019

गीत :- मौन बन चलने दो





गीत

अभिव्यक्त सदा मैं रहूँ ज़रूरी नहीं, 
मौन बन चलने दो
दुनिया को दिखूं,दिखूं न दिखूं, 
तुम हृदयस्थल में पलने दो।

मैं परछाईं बन कर हर पल, 
तुझ संग सानिध्य निभाऊँगा
मैं हाथ तेरा हाथों में ले , 
नित आगे बढ़ता जाऊंगा
पाषाण तेरी राहों के मैं 
आगे बढ़ सदा हटाऊंगा
चाहे कैसे हालात रहें 
बस तेरा ही कहलाऊंगा

बस इतनी अभिलाषा मेरी ,
मुझे  नव ढांचे में ढलने दो
अभिव्यक्त सदा मैं रहूँ ज़रूरी नहीं, 
मौन बन चलने दो।

नीलाभ गगन में उड़ते हैं 
मेरी आशाओं के बादल
सागर के अंतस में बसते 
भावों के अनुपम पुष्पित दल
मैं तेरे प्रश्नों के उत्तर में
उत्तर बन आ जाऊँगा
रख मौन सदा सम्पुट पट पर
नयनों से सब कह जाऊँगा

बस एक यही एक आस मेरी
मेरे अंसुओं को गलने दो
अभिव्यक्त सदा मैं रहूँ ज़रूरी नहीं, 
मौन बन चलने दो।

जाने कितने स्वप्नों में से 
तेरी अँखियों का स्वप्न बना
बस तेरा साथ निभाने को 
मैं शक्ति साध अवलंब बना
मैं तुझको थामे थल जल सब 
एक बार पार कर जाऊँगा
तेरे आँखों से नीर चुरा
मैं पलकों बीच बसाऊंगा

तुझसे बस एक उम्मीद यही
मुझे प्रेम अग्नि में जलने दो
अभिव्यक्त सदा मैं रहूँ ज़रूरी नहीं, 
मौन बन चलने दो।




स्वधा रवींद्र "उत्कर्षिता"

मंगलवार, 10 दिसंबर 2019

गीत:- प्रेम नगर की प्रेम गली


गीत


प्रेम नगर की प्रेम गली में
घूम घूम नित आना
तेरे संग मैं चाहूँ प्रियतम 
दुनिया मे इतराना

कहीं जाऊं और कहीं रहूँ 
पर तुझसे मोह लगाना
एक यही है रीत हमारी 
तुझ पर जीना और मर जाना
धड़कन सुर लय ताल स्वांस
सब तेरे नाम किये है
हे गोपाला हम तो केवल
तेरे लिये जिये हैं
राधा बन कर चैन ना पाया
मीरा बन तुझे लुभाना

तेरे संग मैं चाहूँ प्रियतम 
दुनिया मे इतराना।

मन मे कितने प्रश्न पड़े हैं
तेरे बिन निष्तेज खड़े है
सम्पुट पट पर मौन सजे हैं
हमने सब श्रृंगार तजे हैं
जीवन मे दिनकर ना निकला
पैर बिना पानी ही फिसला
मृग मरीचिका में अटके हैं
बिन तेरे कितना भटके हैं
अब मन ने सब त्याग किया
बस सीखा सकुचाना

तेरे संग मैं चाहूँ प्रियतम 
दुनिया मे इतराना।

जोगी तुझको मान 
बनी जोगन मैं पीछे आई
बिन तेरे वनमाली 
मन की कली मेरे मुरझाई
प्रकृति पुरुष को ढूंढ ढूंढ कर
थक अब हार गई है
नीरवता इस बार मुझे 
अंदर तक मार गयी है
अंतिम पल बस यही प्रतीक्षा
तुझमे है मिल जाना

तेरे संग मैं चाहूँ प्रियतम 
दुनिया मे इतराना।

गीत:- बढ़ना चाहता हूँ



गीत



सूर्य की नव रश्मियों को कैद करना चाहता हूँ
मैं नियति की बेड़ियों को काट बढ़ना चाहता हूँ।

तेज धारा के सदृश हूँ काट दूंगा पत्थरो को
मोड़ दूंगा राह को हर, और रंगूँगा बंजरों को
ठोकरें खाई बहुत , पर मन कभी हारा न मेरा
ईश ने भी दे दिया वरदान में मुझको सवेरा

मैं प्रभाती के नए स्वर आज गढ़ना चाहता हूँ 
मैं नियति की बेड़ियों को काट बढ़ना चाहता हूँ।

शक्ति है दवानलों सी, सब जलाना जानता हूँ
मैं विरोधी धार में नौका चलाना जनता हूँ
सीखता हूँ रोज़ बाहें खोल कर नव प्राण भरना
और दुखियों के हृदय में जो छिपे वो त्रास हरना

मैं छलांगे मार ऊँची पेंग चढ़ना चाहता हूँ
मैं नियति की बेड़ियों को काट बढ़ना चाहता हूँ।

तीव्रता परिचय है यदि, शालीनता की भी झलक है
नित्य नव पग मैं पसारूं ये मेरी अंतिम ललक है
कामना है हर व्यथित को शीश पर अपने बिठा लूँ
और आशा है यही आशाओं के दीपक जला लूँ

मैं पुनः कोहिनूर बन मस्तक पे मढ़ना चाहता हूँ
मैं नियति की बेड़ियों को काट बढ़ना चाहता हूँ।








शुक्रवार, 6 दिसंबर 2019

गीत:- आ गयी है शरदा फिर

गीत  


केश खोले ,दानवों पर छा गयी है शारदा फिर 
बनके चंडी इस जगत पर छा गयी है शारदा फिर ।

हाथ मे तलवार का संधान धारे वो खड़ी है
क्रोध में है कपकपाती आसमा पे वो चढ़ी है
रुद्र का नव रूप धारे , आज तांडव कर रही है
जब लली माँ शारदा की , आज बलि पर चढ़ रही है
धार काला वेष फिर से शेष की फुंकार लेकर
वेग धारे आंधियों का , आ गयी है शारदा फिर

केश खोले ,दानवों पर छा गयी है शारदा फिर 
बनके चंडी इस जगत पर छा गयी है शारदा फिर ।

केश में विषधर बसाए और नयन में उग्र ज्वाला
हाथ में ले तीव्रता घर घर से निकली आज बाला
धार कर ये रूप वध, हर दुष्टता का कर रही है
है व्यथित यह देख कर , किस तरह कन्या मर रही है
नोचते हैं ये दुशासन चीर अबला का कहीं जब
काट कर नरमुंड तब तब , भा गयी है शारदा फिर

केश खोले ,दानवों पर छा गयी है शारदा फिर 
बनके चंडी इस जगत पर छा गयी है शारदा फिर ।

निर्भया निर्भय हुई है आसिफा भी तन गयी है
आज सारी देवियाँ रणचंडियों सी बन गयी है
कर दिया मर्दन महिष का गर्व से इतरा रही है
भेद कर दुर्भाग्य को, सौभाग्य ध्वज फहरा रही हैं
आज फिर से उज्ज्वला सौदामिनी बन कर जगी जब
तब सुखद स्वर रागिनी ले , गा गयी है शारदा फिर

केश खोले ,दानवों पर छा गयी है शारदा फिर 
बनके चंडी इस जगत पर छा गयी है शारदा फिर ।



मंगलवार, 19 नवंबर 2019

गीतिका:- क्यों घबराया करता है



पतझड़ से तू क्यों घबराया करता है
बालों में क्यों रंग लगाया करता है।

इक दिन तो वैसे भी मर ही जाना है
फिर क्यों जीते जी मर जाया करता है।

अनुभव जीवन की अनुपम सच्चाई है
फिर क्यों इन से नयन चुराया करता है।

सुख दुख तो बस आने जाने वाले हैं
फिर क्यों इनसे यूँ घबराया करता है।

इस जीवन के बाद कहाँ पर जाना है
खुद को क्यों ये सोच सताया करता है।

पांच तत्व का मटका एक दिन फूटेगा
फिर क्यों इससे मोह जताया करता है।

पतझड़ से तू क्यों घबराया करता है
बालों में क्यों रंग लगाया करता है।

सोमवार, 11 नवंबर 2019

गीत :-क्या पाया











दो पल सुलगा कर , धुआँ उड़ा कर , 
बोलो तुमने क्या पाया
ये जीवन स्वर्ग सरीखा था 
बर्बाद किया कुछ न पाया

तुमने सोचा भोकाल बना , 
तुम जग भर को भरमाओगे
ये ही पुरुषत्व जतायेगा, 
इससे सम्मान कमाओगे
पर व्यथित हृदय माँ का रोया, 
जब तुमने क्षय, क्षय कर पाया

ये जीवन स्वर्ग सरीखा था 
बर्बाद किया कुछ न पाया
दो पल सुलगा कर , धुआँ उड़ा कर , 
बोलो तुमने क्या पाया।

पहला कश था मित्रता हेतु, 
दूसरा तेरी लालसा बना
तीसरा तेरी आदत बन कर
तेरे जीवन का त्रास बना
तुमने ये अद्भुद जीवन
विष की भेंट चढ़ा कर क्या पाया 

ये जीवन स्वर्ग सरीखा था 
बर्बाद किया कुछ न पाया
दो पल सुलगा कर , धुआँ उड़ा कर , 
बोलो तुमने क्या पाया।

प्रेयसी तुम्हें समझे युग का 
बस इसी आस में पिये रहे
जग को बहलाने की खातिर
तुम स्वयं नशे में जिये रहे
पर जीवन है अनमोल नशा
इसको उलझा कर क्या पाया

ये जीवन स्वर्ग सरीखा था 
बर्बाद किया कुछ न पाया
दो पल सुलगा कर , धुआँ उड़ा कर , 
बोलो तुमने क्या पाया।




स्वधा रवींद्र "उत्कर्षिता"




बुधवार, 16 अक्टूबर 2019

छंद मुक्त:- तुम खास हो



करवाचौथ की शुभममनाओं के साथ सभी महिला मित्रों के लिए उनके स्वामियों के हृदय की आवाज़






तुम कहती हो ना 
कि मैं 
कभी नहीं कहता 
कुछ भी
तो आज 
बता रहा हूँ 
तुम्हे
तुम किसी 
परिचय की 
मोहताज नहीं हो
तुम बहुत खास हो 
कोई आम नहीं हो।

तुम चाय की पहली चुस्की हो
तुम नाश्ते के पहला निवाला 
तुम मेरी शर्ट के टूटे बटन टांकने वाली
तुम मुझे मुझसा समझने वाली
वो जो नीली फ़ाइल में रख के अक्सर मैं
भूल जाता हूँ
तुम उसे उसकी सही दराज़ में रखने वाली हो
तुम मेरी चाभी की खनक
तुम मेरे रुमाल की खुशबू हो

तुम कहती हो ना 
कि मैं 
कभी नहीं कहता 
कुछ भी
तो आज 
बता रहा हूँ 
तुम्हे
तुम किसी 
परिचय की 
मोहताज नहीं हो
तुम बहुत खास हो 
कोई आम नहीं हो।


घर से आफिस के रास्ते में मैं कैसा हूँ
इसकी फिक्र करती तुम
मेरे सही वक्त पर ना लौटने पर
मेरे लिए डरती तुम
अक्सर मायके जाने की धमकी देती 
और कभी उसे पूरा ना करती तुम
मेरे प्रमोशन में अपनी खुशियां तलाशती
उसके लिए पूजा करती तुम
तुम मेरे सपने देखने का 
ऊपर जाने के प्रयत्नों का कारण हो

तुम कहती हो ना 
कि मैं 
कभी नहीं कहता 
कुछ भी
तो आज 
बता रहा हूँ 
तुम्हे
तुम किसी 
परिचय की 
मोहताज नहीं हो
तुम बहुत खास हो 
कोई आम नहीं हो।

तुम मेरे बच्चों की माँ हो 
जो अपनी सारी खुशियाँ 
उन पर लुटा के मुस्कुरा देती हो,
तुम मेरी माँ की दूसरी बेटी हो
जो जीजी की कमी कभी
माँ को महसूस नहीं होने देती हो,
तुम मेरे बाबा का सहारा हो
छड़ी हो , जो उनको संभालने के लिए 
हमेशा खड़ी हो
तुम हमारे घर का स्तंभ हो
जो घर के आंगन के बीच में खड़ा है
और जिसने पूरे परिवार को
एक ही सांचे में गढ़ा है

तुम कहती हो ना 
कि मैं 
कभी नहीं कहता 
कुछ भी
तो आज 
बता रहा हूँ 
तुम्हे
तुम किसी 
परिचय की 
मोहताज नहीं हो
तुम बहुत खास हो 
कोई आम नहीं हो।

तुम नहीं होती तो सुबह 
प्रार्थना विहीन होती है
तुम नहीं होती तो शाम
भी नहीं नमकीन होती है
तुम्हारे साथ होता हूं तो 
भोर की पहली किरण से रात तक
में ताजा रहता हूँ
वरना सच कह रहा हूँ
मैं पूरा नहीं आधा रहता हूँ
तुम मेरे अनकहे शब्दों को समझने वाली हो
तुम मेरी खोई खुशियों को ढूंढने वाली हो
तुम शायद मिस वर्ड नहीं हो सुंदरता में
पर हाँ तुम मेरी वो परी हो
जो मेरी सभी अकथित एहसासों को 
पूरा करती है।

तुम कहती हो ना 
कि मैं 
कभी नहीं कहता 
कुछ भी
तो आज 
बता रहा हूँ 
तुम्हे
तुम किसी 
परिचय की 
मोहताज नहीं हो
तुम बहुत खास हो 
कोई आम नहीं हो।


हाँ शायद सच कहा था तुमने कि
मैं नहीं कहता कुछ भी
तो आज बता रहा हूँ तुम्हें 
तुम किसी के कहने और 
परिभाषित करने की वस्तु नही
और तुम्हें बताना इतना भी आसान नहीं
तुम कलम और कागज़ में समा नहीं सकती
तुम वो हो जो कभी 
मेरे हृदय से दूर जा नही सकती
तुम अर्धांगिनी हो मेरी
तुमसे मेरी पहचान है
ओर सच कह रहा हूँ

तुम किसी परिचय की मोहताज नहीं हो
तुम बहुत खास हो कोई आम नहीं हो।



स्वधा रवींद्र "उत्कर्षिता"

छंद मुक्त: अकेले मैं



कहीं दूर 
अकेली सड़क पर अकेली मैं
कहीं दूर
समंदर की तनहा लेहरों में 
अकेली नाव पर अकेली मैं
कहीं दूर
पहाड़ों की अकेली चोटी पर अकेली मैं
कहीं दूर
आसमान की ऊंचाइयों में 
एक अकेले तारे की खोज में
अकेली मैं।

हाँ छोड़ दो मुझे 
मैं कुछ पल बस 
खुद के पास होना चाहती हूँ
अकेले हँसना और 
अकेले दिल खोल के 
रोना चाहती हूँ।
हाँ मैं स्वयं को 
खोजना चाहती हूँ ।

शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2019

छन्दमुक्त: कर्ज़ और फ़र्ज़

अभी अभी 
बाबा ने मुझको
माँ के पास 
सुरक्षित रखने के 
वादे संग छोड़ा था,
अभी अभी माँ ने 
स्वीकारा था मुझको
अभी अभी बस
अपने मन संग जोड़ा था
मैने माँ के गर्भ 
साँस ली थी पहली
मेरी धड़कन ने माँ को 
झझकोरा था
कहीं न जन्में मेरे घर 
जानकी पुनः
इस ख्याल ने 
माँ को फिर से 
तोड़ा था।
बरसों से 
यह ताने 
सुनती आई माँ
दो लड़कियाँ जन्म दे 
उसने पाप किया
जैसे सारी 
मेरी माँ की 
गलती हो
और उसने परिवार साथ 
कुछ घात किया।
बाबा भी दादी की बातों से सहमत
बार बार हो पुत्र मांगते थे प्रभु से
और पुत्र की किलकारी गूँजे आँगन
यही एक इच्छा थी उनकी बस रघु से,
पहुँच गए वे आज जानने
हूँ मैं कौन
और दिए पैसे जानने 
पुत्र या और
सुन, आघात !
पिता असन्तुलित हुए मेरे
हाय! नाद यह हिस्से 
फिर से आए मेरे
तुम हटाओ इसको 
ये जन्म नहीं लेगी
घर पर फिर एक बोझ 
तू जन्म नहीं देगी।
पर डॉक्टर ने बोला 
माँ मर जाएगी
यदि ये बेटी गर्भ में मारी जाएगी
यह सुन बाबा ने माँ को धिक्कारा था 
जन्म मेरा हो लेकिन ये स्वीकारा था

आज धरा की खुशबू सूंघी थी मैने
आज खुला आकाश निहारा था
आज प्रथम माँ का स्पर्श किया मैने
और बाबा की गोद को भी स्वीकारा था
लगा स्नेह जागेगा देख मेरी सूरत
जब बाबा ने नर्स को धन पकड़ाया था
और मुझे लपेट कपड़े में बाबा ने 
कूड़े के एक ढेर में जा दफनाया था

साँस मेरी अटकी थी मेरे ही अंदर
लगा क्षणिक जीवन था सब अंधियारा था
मैं चिल्ला कर रोई थी अम्मा अम्मा
तब एक किन्नर ने आ मुझे निकाला था

बरसों बीत गए हैं इन सब बातों को
पर आँखों मे अब भी एक अंधियारा है
माँ की याद सताती है मुझको अब भी
लगता है अम्मा ने मुझे पुकारा है

आज तीस बरसों की अथक उड़ान बाद
मैं एक डॉक्टर हूँ
जीवन देने वाली
और मेरे क्लीनिक में मेरी अम्मा संग
आये हैं बाबा लेकर के एक बीमारी
आज उन्हें जीवन देने की बारी है
जिसने एक रात मुझे कचरे में डाला था
वो कर्ज भले ना चुका सकें हो मेरा पर
मुझको तो कर्ज 
आज चुकाना था।

गीत: माँ दुनिया में आ जाने दो




माँ दुनिया में आ जाने दो
मुझको दुनिया में आकर माँ
कुछ तो अच्छा कर जाने दो
माँ दुनिया में आ जाने दो।

मैं तेरे अंदर पनप रही
तेरे अंतस में झलक रही
मैं जान रही हूँ तुझे ज़रूरत मेरी
मुझे निभाने दो

माँ दुनिया में आ जाने दो।

दादी के तानों को ना सुन
ना सुन समाज की बातों को
मुझको आँचल में छिपा 
ढेर कर दे विकार की घातों को
मैं भी सपने बुन सकती हूँ
बस मुझे जन्म पा जाने दो

माँ दुनिया में आ जाने दो।

मैं तेरी सोन चिरैया हूँ
घर आँगन में मुस्काऊँगी
अधखिली कली हूँ अम्मा मैं
बन पुष्प जहाँ महकाऊंगी
आई तू मेरे लिए स्वयं को
जग भर से अब लड़ जाने दो

माँ दुनिया में आ जाने दो।

यदि आज नहीं तू बोल सकी
तो कल आँगन सूना होगा
अधखिली कली टूटी होगी
आँचल में खून भरा होगा
अम्मा तू दुर्गा बन कर स्वयं
शक्ति का भाव जगाने दो

माँ दुनिया में आ जाने दो।

बुधवार, 9 अक्टूबर 2019

छंद मुक्तदेव की आवश्यकता





मैं उसके 
आने से पहले
इतने ख्वाब 
सजा लेती हूँ
कि उसके 
बिना मिले 
जाने के बाद
उन टूटे ख्वाबों को
बटोरने में
मैं स्वयं को
ही खो देती हूँ।
और फिर बटोरती हूँ
अपने ही टुकड़े
और उन्हें जोड़ 
फिर खड़ी होती हूँ
ये सोच 
कि कल अगर उसे
मेरी ज़रूरत पड़ी
तो मैं उसे टूटा हुआ
अस्तित्व कैसे 
समर्पित करूंगी।
देव को खंडित 
कुछ भी
अर्पित कहाँ होता है।
पर यह भूल जाती हूँ
कि 
देव को किसी की 
आवश्यकता भी 
कहाँ पड़ती है।

रविवार, 6 अक्टूबर 2019

छन्दमुक्त :जाल



देखी है मैने
दीवारों पर 
लगे जालों के 
जंजालों के पीछे
छिपे 
मकड़ों की परछाईयाँ
कुछ मृत
जालों को बिनते बिनते
उसमें ही उलझ कर
सो गए
कुछ जीवित 
निरंतर अपने लिए 
जाले पर जाले बिनते
इस असत्य में खो गए,
और कुछ
जाले के पीछे से
अनिमेष 
मौन
नैनों से निहारते।

शायद उनके 
अनकहे शब्दों में
जाले से 
निकलने की
प्यास थी
और इस क्षणभंगुर
संसार को छोड़
उस जगत नियंता से 
मिलने की आस थी।





रात भर 
तेरी ही आवाज़ 
कान में गूंजी
रात भर 
सपनों में बस 
तुम ही तुम
आबाद रहे
सोच लो 
किस तरह से 
रूह में शामिल थे तुम
सोच लो किस तरह से 
हममे सुबह शाम रहे
तुम कहीं भी रहो
पर जान लो तुम 
ये सच भी
तुम कहीं रह के भी 
बस सिर्फ
मेरे पास रहे।

शनिवार, 5 अक्टूबर 2019

गीत: खो गयी पहचान मेरी



तुम गए क्या खो गया सब ,खो गयी पहचान मेरी।

साथ थे तुम तो मुझे पहचान देते थे हमारी
नाम लाखों देके मुझ पे तुम हुए जाते थे वारी
में कभी गुड़िया कभी गुड्डन कभी बिट्टन बनी थी
और मेरे तात तुमने ,परियों से तुलना करी थी
तुम मुझे सर का मुकुट अपना बताते थे सभी को
और कोयल कह के भी अक्सर बुलाते थे मुझी को
बस तुम्हारे ये दिए कुछ नाम थे पहचान मेरी

तुम गए क्या खो गया सब ,खो गयी पहचान मेरी।

जब वो पहली बार माँ की ओढ़नी मैने थी ओढ़ी
सीने से मुझको लगा कर रोई थी तब आँख थोड़ी
पोछ कर आंसू कहा था तुमने तू मेरी अली है
जाने इतनी तीव्रता से किस तरह तू बढ़ रही है
तू ना होती तो हमारे घर में उजियारा ना होता
तू ना होती तो हमें कोई कभी प्यारा ना होता
बस तुम्हारा प्रेम ही था बन गया पहचान मेरी

तुम गए क्या खो गया सब ,खो गयी पहचान मेरी।

याद है मुझको अभी भी में बहुत तुमसे लड़ी थी
गाय कह  कर क्यों बुलाया, मुझमे ऐसी क्या कमी थी
तब बिठा कर गोद में तुमने कहा था तू भली है
मेरे घर में तू जब आयी दूध की नदियां बही हैं
तेरे आने से उजाला और सुख समृद्धि आयी
तू नही थी कुछ नहीं था तू हंसी उल्लास लायी
बस तुम्हारे वो विशेषण बन गए पहचान मेरी

तुम गए क्या खो गया सब, खो गयी पहचान मेरी।

मैं ही रंगों की थी होली मैं ही दीपों की दिवाली
मैं सेवइयां ईद की थी मैं ही तेरी पूजा थाली
तुम मुझे जब चाँद दिखलाते थे तो ये बोलते थे
चाँद से ज़्यादा वज़न देकर मुझे तुम तौलते थे
सूर्य की आभा हमीं थे और हम ही चाँद तारे
सुख सभी अपने हमें दे, दुख लिए थे मेरे सारे
बस तुम्हारे त्याग सारे बन गए पहचान मेरी

तुम गए क्या खो गया सब, खो गयी पहचान मेरी।

लौट आओ तात तुम बिन हाँथ खाली हैं हमारे
तुम थे जब तक साथ पूरे स्वप्न होते थे हमारे
जो भी चाहा बिन कहे ही तुमने मुझको दे दिया था
और मैं उपहार तुमको ईश का ये कह दिया था
भोग का पहला निवाला तुम मुझे ही थे खिलाते
तुम मुझे शक्ति थे कहते और स्वधा कह कर बुलाते
बस तेरा विश्वास मुझ पर बन गया पहचान मेरी

तुम गए क्या खो गया सब, खो गयी पहचान मेरी।


छन्दमुक्त: एक दिन की छुट्टी





फिर वही सुबह
फिर वही आरोप प्रत्यारोप
क्यों नहीं बताया
की आज 
विश्राम दिवस है तुम्हारा
क्या सब अपनी मर्ज़ी से ही
करने का इरादा है तुम्हारा
और तो और
बुला ली सखी सहेलियां
तान ली चादरें
बना ली अपने और उनके लिए 
पकौड़ियां
Tv पर अपनी मर्ज़ी का 
चेनल भी लगा लिया
पूरे घर को 
अपने कब्जे में जमा लिया
लगता है पहले से सोच लिया था
जो मन आएगा कर लोगी
बिना मुझे पूछे
सहेलियों से अपना घर भर लोगी।
मुझे बताना
आवश्यक नहीं था
मेरी ज़रूरतों का कोई भी 
मानक नहीं था।
कल से मैं भी परेशान था
एक दिन घर मे रुक जाने का 
मेरा भी आज का ही प्लान था।

रोज़ आफिस 
जा जा के 
थक जाता हूँ
बॉस की बड़ी जी हुज़ूरी करता हूँ 
तब कहीं एक छुट्टी पाता हूँ।
तुम्हारा क्या है
कभी भी छुट्टी ले लेना,
और अगर आज ही ज़रूरी है
तो प्रोग्राम 
अपनी किसी दोस्त के वहां रख लेना।
वो स्तब्ध 
अपलक देखे जा रही थी,
पुरुष के अनावश्यक लिए अधिकार को
और सुन रही थी
ताने और यादकदा घटी कुछ बातें।

अरे अरे अरे
कहाँ की बात कहाँ जोड़ रहे हो
एक छुट्टी को किन किन 
और बातों से जोड़ रहे हो,
365 दिनों में ये मेरी तीसरी छुट्टी है
पहली जब बड़ा बेटा बीमार पड़ा था
और जब तुम्हे आफिस के काम से 
अमेरिका जाना पड़ा था।
याद है वो दिसम्बर जब ठंड ने तुम्हे जकड़ा था
तब तुम्हे संभालने के लिए
मैंने छुट्टी का ही हाँथ पकड़ा था।
हाँ ये मेरी तीसरी छुट्टी है,
हाँ ले ली है मैने ये छुट्टी
बिना तुमसे पुछे, 
बिना तुम्हे बताए
पर क्या तुम्हें याद हैं 
मेरे शरीर के वो दर्द
जो पिछले कुछ महीनों और हफ्तों में
मैने तुम्हे बताए।
भूल गए ना?
भूल ही गए होंगे 
छोटी सी ही तो बात है
शायद इसलिए
की मेरे उस दर्द में भी 
तुम्हे तुम्हारे मन की 
सब्जी रोटी का साथ है।

हाँ भूल गयी मैं
तुम्हे बताना की कल रात भी 
सो नहीं पाई थी मैं
सोनू की पढ़ाई, मोनू की ढिठाई,
टीचर की शिकायतें
और वो जो 500 का नोट गायब था ना
उसको भी अभी तक ढूंढ नहीं पाई थी मैं।
तुम्हारी शर्ट वे लगा वो पेन का दाग
जिसे साफ करना था
अम्मा जी की सारी को भी 
अच्छे से कलफ करना था,
पापा जी कल ही बोल के गए थे
बिजली का बिल जमा कर देना
और मेरे आफिस का चपरासी कह रहा था
दीदी ज़रा मेरे बच्चे को भी पढ़ा देंना
इन्ही बातों में उलझी 
भूल गयी थी तुम्हे बताना
की बड़ी मुश्किल से 
बॉस को मेडिकल लगा के
मैने ये एक दिन अपने लिए था निकाला।

खैर मैं कभी और छुट्टी ले लूंगी
कल तुम आराम कर लो
पर अगर तुम मुझे कल बता देते 
किसी बात में भी 
आज की छुट्टी का जता देते
तो शायद 
मैं आज की भी छुट्टी नही लेती।
हाँ एक शिकायती अर्जी 
वो भगवान की पेटी है ना
जो शिव जी के मंदिर में रखी है
उसमें ज़रूर डाल देती
थक गई हूं मैं
रोज़ रोज़ के 
इन आरोपों प्रत्यारोपों से,
और मांग रही हूँ तुमसे
एक दिन की छुट्टी 

मिलेगी क्या ज़िन्दगी
मुझे एक दिन की छुट्टी तुमसे।

शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2019

गीत : एक तरफा रिश्ता




भूल जाती हूँ 
कि रिश्ता
एक तरफा है हमारा
और तुमसे मांग उठती हूँ
मैं अक्सर प्यार।

याद है मुझको अभी तक
जुगनुओं की रोशनी में 
हम खड़े थे साथ तेरे ,
थाम तेरा हाँथ
कह रहे थे हम 
वही एक बात
तुम कहीं भी हो
किसी के हो 
हमें न फर्क कोई 
हम सदा से हैं तुम्हारे 
और सदा तक ही रहेंगे
हर तरह से साथ
तुम भी थे स्तब्ध 
पर मुझसे छुड़ा कर हाँथ
तुमने ये कहा था
मैं अकेला ही चला हूँ
और अकेला ही चलूँगा
तुम किसी को थाम लेना
है दुआ मेरी 
करेगा वो भी तुमसे
तुम सरीखा प्यार,


भूल जाती हूँ 
कि रिश्ता
एक तरफा है हमारा
और तुमसे मांग उठती हूँ
मैं अक्सर प्यार।

मान कर आदेश सा
तेरा कहा
मैं चल पड़ी उस ओर
जिसका था न कोई छोर
थाम कर मैं कल्पना में
बस तुम्हारी उंगलियों की पोर
थी उस रात रोयी
फूट कर 
जब तक दिखी न भोर,
चुप हुई फिर सोच कर ये
कोई मुझको देख ना ले
और मेरी लाल आंखों से 
चुरा न पाए
मन का शोर
और कोई पढ़ सके न
रात भर मैंने लिखा जो ग्रंथ
अपने अश्रुओं से
उसमें बसता प्यार,

भूल जाती हूँ 
कि रिश्ता
एक तरफा है हमारा
और तुमसे मांग उठती हूँ
मैं अक्सर प्यार।

तुम गए हो भूल 
वो एक रोज़
जब तुमने छुआ था प्रेम से
अस्तित्व मेरा
भूल थी शायद तुम्हारी 
बचपने में हो गयी थी
और मैं अब तक सिहरती सी
बस तुम्हें ही 
ढूंढने में लग गयी थी
तुम बने थे कृष्ण 
बस एक पल की खातिर
और मैं मीरा सी 
जोगन हो गयी थी
नाम तेरा रट रही थी
स्वांस के संग
बिन अपेक्षाओं के 
भोगन हो गयी थी,
है बहुत मुश्किल 
तुम्हें समझाऊं कैसे
हो गया कैसे 
कहाँ ,कब और इतना
मुझको तुमसे प्यार,

भूल जाती हूँ 
कि रिश्ता
एक तरफा है हमारा
और तुमसे मांग उठती हूँ
मैं अक्सर प्यार।

अब बहुत मुश्किल है
इसको खत्म करना
ये समय के साथ 
जीवट हो गया है
तुम मिलो या न मिलो 
तुम साथ ही हो
इस तरह का अब ये 
जीवन हो गया है
है नहीं कोई अपेक्षा
अब हमारी 
तुम मिलो मुझको 
या कर लो हमसे थोड़ी बात
या पकड़ कर हाँथ मेरा 
ये कहो हमसे कभी तुम
प्रिय चलोगी क्या
वहाँ तक तुम हमारे साथ?
आँख के सम्मुख 
न होकर भी हमारे
तुम हो रहते बस हमारे पास
बोलते तुम कुछ नहीं मुझसे
मगर अब बिन कहे भी
कह ही जाते हो
न जाने कितनी सारी बात।
सोचती हूँ आज
तो लगता है 
मुझको चाहिए था
इस तरह का 
योग और संयोग
ऐसा सतयुगी सा प्यार

भूल जाती हूँ 
कि रिश्ता
एक तरफा है हमारा
और तुमसे मांग उठती हूँ
मैं अक्सर प्यार।