शायद इसको ही जीते जी
मर जाना सब कहते होंगे
जब धमनी में रक्त नहीं
जल बिंदु तरल हो बहते होंगे।
बनते हैं सुकरात रूढ़ियों से
लड़ कर विष पीने वाले
ना जाने ये कैसे सब आरोप ,
सरल हो सहते होंगे।
शायद इसको ही जीते जी
मर जाना सब कहते होंगे।
पीड़ा ने आतंकित होकर
सुख की सांकल जब खटकाई
कैसे दुख को अपवर्तित कर ,
सदा विरल हो रहते होंगे।
शायद इसको ही जीते जी
मर जाना सब कहते होंगे।
मीरा, सूर, कबीर सरीखे ,
कितने क्रांति बवंडर आये
जिनके कंठों में अपनों के ,
दंश गरल हो बहते होंगे।
शायद इसको ही जीते जी
मर जाना सब कहते होंगे।
स्वधा रवींद्र "उत्कर्षिता"

अतिसुन्दर काव्य
जवाब देंहटाएंअतिसुंदर गीत
जवाब देंहटाएंअति सुंदर गीत
जवाब देंहटाएंसभी का कोटि कोटि आभार।
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर रचना. शाबाश.
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