सुनी थी
बचपन मे
निराला की एक कविता
तोड़ती पत्थर
वो इलाहाबाद के पथ पर
तब भी नहीं थी छाया
तब भी फैली थी धूप
तब भी हाथ में हथौड़ा था
तब भी दर्द था
पर इतना नहीं
थोड़ा था
तब एक
एक स्त्री की कर्मठता
दिखाई दी थी
स्वेद बिंदुओं में बहती
उसकी
तन्मयता दिखाई दी थी
आज एक बच्चे की
विवशता दिखाई देती है
जिन हांथों में
कॉपी किताबें और खिलौने
सजने चाहिए थे
उनमें हथौड़ी दिखाई देती है।
वह भी तोड़ रहा है पत्थर
पर न जाने किस पथ पर
इस बात से बेख़बर
कि उसपर भी
कविताएं लिखी जाएंगी
उसकी तकलीफ
उसकी आजमाइश
लिखी जाएंगी
बरसों बाद तक
उस कविता को
याद किया जाएगा
शायद इतना दर्द लिखने पे
लिखने वाले को
नोबेल भी दिया जाएगा।
पर कोई नहीं जानता
उसके हृदय की व्यथा को
बाबा की दवाई
अम्मा का चिमटा
और बहन की
उसपर लगाई आस्था को
आज रोटी लाएगा भाई
शायद राखी के धागे की
लाज निभाएगा भाई।
अपनी व्यथाओं
में छिपी कथाओं को यादकर
वो तोड़ रहा था अविराम,
पत्थर।
और नियति को ठोकर मार
उठने की कोशिश कर
दे रहा था उत्तर
वो ये नहीं सोच रहा था
की कोई उसे
एक उज्ज्वल भाविष्य
देने आएगा
बल्कि
वो सोच रहा था
आज अगर
ज़्यादा पत्थर तोड़ सका
तो रोटी के साथ
पेंसिल पेन कॉपी, किताबें
और नए सपने
अपने घर भर के लिए
उपहार में ले जाएगा।
स्वधा रवींद्र"उत्कर्षिता"

Nice and beautiful poem. It reminds me since I was in class 8th we had this poem
जवाब देंहटाएंअत्यधिक सुंदर काव्यावली
जवाब देंहटाएंआभार
जवाब देंहटाएंVery nc
जवाब देंहटाएंआभार
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