माँ होती तो
माँ होती तो
उतारती नज़र
लगाती काला टीका
लेती बलैयां
और सर के ऊपर से उतार
सदके में दे देती
दो चार आठ दस रुपैया
देख लेती अगर
दर्द की पराकाष्ठा को
नम हो
आंखों से बहते
और मेरे झेले कष्टों को
पुनः मुझे सहते।
माँ होती तो
निहार लेती मेरा मुखड़ा
नहीं आने देती
मेरे नज़दीक
ग़म का
एक भी टुकड़ा,
फिर शायद नहीं होता
मेरे भी जीवन में
कोई भी
कहीं भी
कम या ज़्यादा
एक या आधा
कैसा भी दुखड़ा।
माँ होती तो
मैं उम्र दराज़ होकर भी
खेल रही होती
गुड़िया गुड्डे का खेल
मेरा भी आजीवन रहता
सपनों से मेल
मैं भी चटकारे ले ससुराल के किस्से
मैके में सुनाती
और मायके जाने पर
माँ ने क्या दिया है
सासरे में दिखाती
रोती , हंसती
भावनाओं की पेंगे कसती
और ज़रा सा भी कष्ट आने पर
बस अम्मा की गोदी में बसती।
माँ होती तो
ये बीमारियाँ नहीं होती
न डिप्रेशन, न ब्लड प्रेशर
न जीवन को मिला होता
बुरे अनुभवों का थ्रेशर
वो पलंग के चार चक्कर काट
अपना लेती मेरे सभी कष्ट
और उसके आशीषों से कट जाते
संघर्षों के वक़्त
माँ होती तो आंखों में दुख के नहीं
सुख के आँसू होते
माँ होती तो हम खिलखिला के हंसते
शायद कभी नहीं रोते
माँ होती तो
नहीं लिखी गयी होती
ये कविता
माँ होती तो कभी नहीं बहती
वेदनाओं से भरी ये सरिता।
स्वधा रवींद्र "उत्कर्षिता"

Sundar rachna
जवाब देंहटाएंbahut hi achchi.
जवाब देंहटाएंअदभुत, भावों को शब्दों में पिरोकर मां का अदभुत वर्णन, बधाईयों सहित नमन
जवाब देंहटाएंअदभुत, भावों को शब्दों में पिरोकर मां का अदभुत वर्णन, बधाईयों सहित नमन
जवाब देंहटाएंAdbhut rachana mam.
जवाब देंहटाएंMaa to bus maa hoti hai. kalpana se pare, prem aur mamtva ki parakashtha