मम अंतर्नाद

मम अंतर्नाद
मेरा एकल ग़ज़ल संग्रह

बुधवार, 30 दिसंबर 2020

गज़ल

 1।

बेवफा वो क्या समझ पायेगा मेरे हाल को 

जिसने डाला था, पकड़ने मछलियाँ फिर, जाल को |

2।

खत्म हो जाता है सारा वक़्त ही बेकार जब

तब पलट कर  देखता है जग बिताए साल को।

3।

जब तलक ज़िंदा था उसकी एक ना जग ने सुनी

मर गया तो अब निकालें , बाल की वो खाल को।

4।

उसने मेरे गर्मी ए एहसास को कह बेवफा

काट डाला जिसपे बैठा था स्वयं उस डाल को।

5।

लूटने वाले ने मुझको आज फिर आवाज़ दी

पर मैं अब  पहचानता था भेड़िए की चाल को।

6।

जब दिखे उसको गलत परिणाम अपने प्यार के 

हो गयी फिर चुप स्वधा ले मौन की उस ढाल को।

रविवार, 27 दिसंबर 2020

आज उत्तर प्रदेश महोत्सव की प्रस्तुति


 

काव्य पाठ

एक मंचीय प्रस्तुति आप सभी मित्रों के लिए



 https://www.facebook.com/104963714483006/posts/234377388208304/

शनिवार, 26 दिसंबर 2020

भारत का किसान


 

सर पर घनी धूप पाँवों में मिटटी का जेवर धारे

जेठ दोपहरी , लू के थपेड़े जिसको रोज़ रोज़ मारे

स्वेद बिन्दुओं से भीगा तन मन वेदना संजोये है

भारत का किसान , खुद भूखा, बिन आँसू के रोये हैं |

 

बंजर में हरियाली लाते लाते, प्रस्तर बन जाता

बाँट रहा रोटी जो जग को , थाली भूख सजा लाता  

मांग रहा है भीख आज, जीवन सबको देने वाला

आंतों की मरोड़ को, अमृत अन्न दान देने वाला।

धरतीपुत्र, लिपट धरती से बीज धरा में बोये है

 

भारत का किसान , खुद भूखा, बिन आँसू के रोये हैं |

 

हुए बड़े दयनीय गांव जब शहरों ने पहने जेवर

रोते रहे किसान दिखाए व्यापारी ने जब तेवर

लटका पुनः पेड़ पर देखा, जग ने फिर एक मतवाला

अन्न नहीं था खुद खाने को , बाँट रहा था  हलवाला

उसके अपने बच्चे देखो बिन खाए ही सोये हैं

 

भारत का किसान , खुद भूखा, बिन आँसू के रोये हैं |

 

तन की काया झुलस गई है, मन रोया अकुलाया है

शासन के गलियारों को वो , आंसू से धो आया है

मांग रहा है हक वो अपना, कोई नहीं सुनने वाला

सत्ता के कानों में झूल रहा है एक बड़का ताला

चिल्ला कर थक गया  सपन सब उसके देखो खोये हैं

 

भारत का किसान , खुद भूखा, बिन आँसू के रोये हैं |

 

कितने ही पर्याय हैं उसके , क्या क्या है वो कहलाता

कभी बना भगवान् , कभी है विद्रोही वो कहलाता

जब तक हरे क्षुधा लोगों की , तब तक है सम्मान बड़ा

हक़ मांगे लेकिन अपना तो देश द्रोही है बन जाता  

अपने हाथों से बरसों से अपनी लाशें ढोयें हैं  

 

भारत का किसान , खुद भूखा, बिन आँसू के रोये हैं |

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

गुरुवार, 24 दिसंबर 2020

प्रथम भारतीय क्रिकेट कप्तान शांता रंगा जी के लिए




तितली थी, पर बन के शेरनी, मैदानों पर छाई है

हाथ लिए बल्ला और कंदुक सबके मन को भाई है


उन्नीस सौ चौवन में जन्मी चेहरे पर उत्साह लिए

बचपन से ही मन मे अपने सपनों का आकाश लिए

वो था करना, जो कोई भी ,कभी नहीं था कर पाया

भय का एक अंश भी इनके हिस्से कभी नहीं आया

चेहरे पर ही लिखा था इतिहास बनाने आयी हैं


तितली थी पर बन के शेरनी मैदानों पर छाई है।


हरे भरे मैदान में जब वो बल्ला लेकर आती हैं

पिच पे अपने पैर जमा वो अंगद सी डट जाती हैं

बड़ा कठिन था उनका  फिर बिन लक्ष्य भेद वापस आना

कर दिखलाती थी वो सब कुछ जो भी था उनने ठाना

भारत माँ की इस बेटी की सबने कथा सुनाई है


तितली थी पर बन के शेरनी मैदानों पर छाई है।


सोलह टेस्ट मैचों में औसत सात सौ रन की पारी है

एकदिवस वाले मैचों में भी ये सबपर भारी है

हरफन मौला लोग सदा से ही इनको बतलाते हैं

कैप्टनशिप में कोई न इन सा ये भी राग सुनाते हैं

चेन्नई की बाघिनी शत्रु सेना पर फिर गुर्राई है


तितली थी पर बन के शेरनी मैदानों पर छाई है।


पूरा जीवन किया समर्पित शांता ने मैदानों को

नीले रंग के पंख लगा चिड़िया उड़ गई ठिकानों को

बैट बाल पिच विकेट बन गए आभूषण सज जाने को

रंगा अब तैयार खड़ी थी नई राह बढ़ जाने को

ले संन्यास क्रिकेट दुनिया से , अब वो फिर मुस्काई हैं


तितली थी पर बन के शेरनी मैदानों पर छाई है।


पूरा जीवन किया समर्पित भारत माँ के चरणों में

रंगा ने रंग दिया भाल माँ का अपने ही करणों से

मिले अवार्ड न जाने कितने, कितनों ने सम्मान किया

भारत माँ की इस बेटी ने सकल विश्व मे नाम किया

बढ़ा मां भारत माँ का ये बिटिया शीश झुकाई है


तितली थी पर बन के शेरनी मैदानों पर छाई है।

तितली थी, पर बन के शेरनी, मैदानों पर छाई है

हाथ लिए बल्ला और कंदुक सबके मन को भाई है



शनिवार, 7 नवंबर 2020

दिवाली गीत


 


चलो आज मिल कर दीवाली मनाएं 
चलो आज खुशियों के दीपक जलाएं।

विषमताएं हर कर सरलतायें बांटें 
हर एक रास्ते पे भरे शूल छाँटें
चलो फिर से फूलों से रस्ते सजाएं

चलो आज मिल कर दीवाली मनाएं 
चलो आज खुशियों के दीपक जलाएं।

हर एक घर के आंगन में फिर राम खेलें
न कोई भी मैया विरह अग्नि झेले
हर एक द्वार घर को अयोध्या बनाएं

चलो आज मिल कर दीवाली मनाएं 
चलो आज खुशियों के दीपक जलाएं।

सभी ओर फैला हो अनुपम उजाला
कलुषताओं का मुँह सदा ही हो काला
चलो सद्गुणों की रंगोली लगाएं

चलो आज मिल कर दीवाली मनाएं 
चलो आज खुशियों के दीपक जलाएं।

जहां राम जैसा हो हर घर मे बालक
जहां कृष्ण जैसा हो कर्मों का चालक
वहीं गीत अल्हड़ कबीरा के गायें

चलो आज मिल कर दीवाली मनाएं 
चलो आज खुशियों के दीपक जलाएं।

सकल सृष्टि में हो उजाला उजाला
हो पहने धरा फिर से दीपों की माला
हरें दम्भ रावण का और मुस्कुराएं

चलो आज मिल कर दीवाली मनाएं 
चलो आज खुशियों के दीपक जलाएं।


गुरुवार, 21 मई 2020

गीत :मछलियों के पर निकल आये




मछलियों के पर निकल आये वो उड़ने लग गयीं
छोड़ कर अपना जलाशय नभ पे चढ़ने लग गयीं।

स्वांस लेने में कठिनता हो रही थी हर घड़ी
थाम हठ का हाथ लेकिन वो नए रस्ते बढ़ी
वो जगत की रीतियों से आज लड़ने लग गयीं

मछलियों के पर निकल आये वो उड़ने लग गयीं।

हर तरफ चीत्कार थी और हर तरफ एक द्वंद था
जिस तरफ बढ़ती थी रस्ता उस तरफ ही बंद था
तंज सह कर वो जगत के और कढ़ने लग गयीं

मछलियों के पर निकल आये वो उड़ने लग गयीं।

सब विरोधी हो गए थे, कोई भी ना साथ था
मुश्कियों के दौर थे ये, बस तिमिर ही हाथ था
बन के जुगनू वो मगर रातों को पढ़ने लग गयीं

मछलियों के पर निकल आये वो उड़ने लग गयीं।

दौड़ती वो जा रहीं थी सिर्फ नभ की आस में
चाँद बनना था उन्हें , ये बात थी बस पास में
चल अकेली राह पर प्रतिमान गढ़ने लग गयीं

मछलियों के पर निकल आये वो उड़ने लग गयीं।

आज हैं आकाश पर , ध्रुव बन चमकती है वहाँ
और धरती पर खड़े , स्तब्ध जन देखें वहाँ
बन गईं ध्रुव तो वो, सूरज ओर बढ़ने लगे गयीं

मछलियों के पर निकल आये वो उड़ने लग गयीं।
छोड़ कर अपना जलाशय नभ पे चढ़ने लग गयीं।





स्वधा रवींद्र "उत्कर्षिता"

शुक्रवार, 8 मई 2020

कलम बोलती है

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लोग लिख रहे थे
रचनाओं पर रचनाएं
कथाओं पर कथाएं
उनमें से कुछ
लिख रहे थे
दुखी मन की
व्यथाएं
अनवरत जन्म रहा था
साहित्य
पर खत्म था 
साहित्य का लालित्य
क्योंकि 
शब्द उठा कर 
कागज पर रख देने से, 
किसी की किसी से 
तुलना मात्र कर देने से,
या छंदों और रसों को
कूट कूट भर देने से,
नहीं बनता है पद्य।

कुछ 
अल्प विराम
अर्ध विराम
उपविराम
पूर्ण विराम 
प्रश्न वाचक
और विस्मयादिबोधक
चिन्हों से
कुछ पंक्तियों 
और कुछ पंक्तियों की ग्रंथियों से 
नहीं बनता है गद्य।

लिखने के लिए
जीना पड़ता है
पैरों की उन फटी बिवाइयों
की पीर को
अम्मा की फटी हुई धोती 
की चीर को
गर्मी में झुलसती मजदूर की देह को
एक अनाथ के तरसे हुए नेह को
लिखने के लिए 
बनना पड़ता है सुकरात
खाने पड़ते हैं आघात।

और कभी कभी 
रोक के हलाहल 
गले की बीचों बीच
लेनी पड़ती है 
एक बड़ी स्वांस खींच
और निगल लेने होते हैं 
जाने कितने अवसाद
वाद और प्रतिवाद

भरना पड़ता है 
कलम में
स्याही की जगह
खून
और लिखते समय
बहाना पड़ता है
आँसुओं का हुज़ूम।

और इससे भी 
खतनाक होता है
सब कुछ बटोर कर 
छिपा लेना 
दिल के किसी कोने में
और सोच लेना 
कि क्या रखा है रोने में
इससे अधिक लाभ है
एक सुषुप्त ज्वालामुखी होने में ।

लावा जब अंदर उबलता है ना
तो कलम बोलती नहीं चीखती है
जाने क्या क्या उलीचती है
कुछ बेरंग सपने
कुछ छूटे हुए अपने
कुछ अनकहे प्रस्ताव
जिन्होंने दिए थे हृदयों को घाव
कुछ आकर्षण कुछ प्रतिकर्षण
कुछ संवेदनाएं 
और उनके होने के कारण 
जन्मी असंख्य वेदनाएं
कुछ मलबे और 
उन मलबों के पीछे 
लगाई गई घातें
और मलबों के अंदर से निकली
कुछ मासूम बच्चों की 
अधजली लाशें।
कुछ सरकारी दस्तावेज़
जिसे नीचे से जाते 
देख रही थी मेज़,
कुछ अनियोजित और स्वार्थपरक
परियोजनाएं
जिसके कारण गिरे थे पुल
दब गए थे कितने पिता, भाई , बहन और माताएं
वो जो कल बन्नो जली थी ना
और 
चैराहे पर खून से सनी 
उस कम्मो की लाश पड़ी थी ना
उसका भी राज़ खोलती है
जब 
लावे और खून से भर कर 
कलम बोलती है। 
जब 
लावे और खून से भर कर 
कलम बोलती है। 
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शनिवार, 2 मई 2020

गीत:- वो मजदूरन




वो मजदूरन मजदूरी में ईंटे ढोती है
भरी धूप में चलते फिरते सपने बोती है।

कच्चे चूल्हे पर , पक्की रोटी तैयार करे
खुद का पेट रखे खाली, खाने में प्यार भरे
कमी अगर हो खाने की चावल को नीर डुबोये
अँखिया खोले वो अपने अपने जीवन मे सोने बोए
अगले पल के भोजन की चिंता में रोती है।

वो मजदूरन मजदूरी में ईंटे ढोती है
भरी धूप में चलते फिरते सपने बोती है।

झीनी ओढ़ चदरिया जग की नीयत तोलती है
लेके एक तिपहिया पूरा शहर डोलती है
नंगे पैरों में लेकर वो फटी बिवाई फिर
अद्धा और सगरा ईंटा रख अपने सर पर फिर
अपने राधे के पीछे वो रधिया होती है

वो मजदूरन मजदूरी में ईंटे ढोती है
भरी धूप में चलते फिरते सपने बोती है।

ठेल रही है अपना जीवन जैसे ठेले गाड़ी
अक्सर पैरों में चुभती है काँटो वाली झाड़ी
एक सिरे पे बुधिया खींचे एक सिरा वो ठेले
इस तरह से दोनों मिलकर जीवन के दुख झेलें
रिसते घावों पर हँस कर मरहम होती है

वो मजदूरन मजदूरी में ईंटे ढोती है
भरी धूप में चलते फिरते सपने बोती है।

मौरंगों पर बिछा ओढ़नी मुन्ना रही सुलाये
कभी बांध पेड़ों पर साड़ी झूला उन्हें झुलाये
तपती धरती पर आँचल से साया देती है
और कभी खुद बन कर छतरी छाया देती है
और सुरक्षा की ख़ातिर वो कभी न सोती है

वो मजदूरन मजदूरी में ईंटे ढोती है
भरी धूप में चलते फिरते सपने बोती है।






शुक्रवार, 1 मई 2020

गीत: आंखों में मत आँसू लाओ






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ये अनंत यात्रा है , साक्षी बनों , देखते सब जाओ
पर अनुरोध तात तुमसे , आँखों मे आँसू मत लाओ।

ईश्वर ने दी हमें अमरता , केवल वस्त्र बदलना है
जब तक द्वैत खत्म ना होगा तब तक जग को चलना है
समझ हमारी रही अविकसित , अंश ढूँढते रहे सदा
मिलने निकल पड़ा है जीवन , सुख दुख दोनों यदा कदा

क्षणभंगुर शरीर की खातिर , तात न तुम अब कुम्हलाओ
ये अनंत यात्रा है , साक्षी बनों , देखते सब जाओ।

पंच तत्व मटकी भर कर के , यात्री यात्रा पर निकला
माया में अटका वो ऐसा जीवन पथ पर वो फिसला
भूल गया वो सत्य सभी, लेकर असत्य वो साथ चला
इस मारग पर जो भी निकला , कहाँ हुआ हित और भला

यह प्रपंच है दुनिया का, बस देख इसे तुम मुस्काओ
ये अनंत यात्रा है , साक्षी बनों , देखते सब जाओ।

गोमुख से निकली है गंगा, सागर तक जाना होगा
आदि अगर मिल गया उसे ,तो अंत स्वयं पाना होगा
पिंजरे में कब तक मैना सर पटकेगी चिल्लाएगी
छोड़ एक दिन दुनिया सारी वो असीम तक जाएगी

यात्राओं पे शोक करो मत , पढ़ गीता मन बहलाओ
ये अनंत यात्रा है , साक्षी बनों , देखते सब जाओ।


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शनिवार, 25 अप्रैल 2020

विरह गीत : मैं हूँ प्यासी नदी।


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मैं हूँ प्यासी धरा तुम गगन की घटा
सिंधु से जो मिला वो ही बरसाओगे
मैने अपलक निहारा तुम्हारी तरफ
बोलो कैसे मुझे तुम भुला पाओगे।

भोर से सांझ तक मैं तुम्हारे लिए
बढ़ रही ऑसि का हाथ थामे हुए
गुनगुनाती रही स्वांस की डोर पर
मैं तुम्हें अपना सर्वस्व माने हुए
इन हवाओं में खुशबू तुम्हारी घुली
दूर रहकर भला कैसे तरसाओगे।

मैं हूँ प्यासी धरा तुम गगन की घटा
सिंधु से जो मिला वो ही बरसाओगे
मैने अपलक निहारा तुम्हारी तरफ
बोलो कैसे मुझे तुम भुला पाओगे।

प्रेम पिंजरे की मैना हुई बांवली
सींकचों में ही सर वो पटकने लगी
प्यास नैनों में दर्शन की पाले हुए
वर्जना की गली में भटकने लगी
धड़कनों से तुम्हारी ही आहट मिले
छोड़ कर तुम मुझे फिर कहाँ जाओगे

मैं हूँ प्यासी धरा तुम गगन की घटा
सिंधु से जो मिला वो ही बरसाओगे
मैने अपलक निहारा तुम्हारी तरफ
बोलो कैसे मुझे तुम भुला पाओगे।

रंग कितने ज़माने में बिखरे सही
रतग तुमसा कोई  एक मिलता नहीं
देख डाले सभी बाग मैने मगर
एक भी पुष्प तुमसा न खिलता कहीं
प्रश्न बस एक ही मन को छलता रहा
कब मेरे मन में आकर बिखर जाओगे

मैं हूँ प्यासी धरा तुम गगन की घटा
सिंधु से जो मिला वो ही बरसाओगे
मैने अपलक निहारा तुम्हारी तरफ
बोलो कैसे मुझे तुम भुला पाओगे।

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नज़्म: खुद से मिल गए हैं




बेनूर थे बहुत हम , 
तुमसे ही नूर आया
तन्हाइयों में तुमसे 
हमको सुकून आया
सब कुछ था खाली खाली , 
कुछ भी नहीं था भाता
जब तू नहीं था सुन ले , 
कुछ भी नहीं था आता
तुझसे ही छंद सीखे 
तुझसे ही काव्य जाना
तुझसे मिली थी जब मैं
तब ही मिले निराला
कामायनी पढ़ी जब
तब थी प्रलय सी आयी
तूने ही सिखाया तब
उषा तिमिर से आई
ये रात भी बीतेगी
दिनमान भी चमकेगा
तू भी बनेगा ध्रुव और
आकाश में चमकेगा
दिनकर के रश्मिरथ चढ़
जीवन को संभाला था
तुझको समझ के गीता
हर ढंग में ढाला था
तुलसी कबीर, मीरा
अपने से तब लगे थे
जब तूने ये कहा था
वो अपने सब सगे थे।
तुम जानते हो नहीं हो
तुम स्वांस स्वांस में हो
धड़कन की हर धड़क में
अरु प्राण प्राण में हो
तन्हाइयों में हमने 
क्या क्या नहीं किया है
तुझपे मरे है बरसों
बरसों तुझे जिया है
तुमको नहीं पता है
क्या आज हो गए हैं
दुनिया से बेकली है 
तुझमें ही खो गए हैं
तुम जानते हो पहले 
दुनिया में घूमते थे ,
खुद भी न जानते थे
हम किसको ढूँढते थे
तुम क्या मिले कि हमको, 
भगवान मिल गए हैं
ये है प्रथम की हमको
हम खुद ही मिल गए हैं।
ये है प्रथम की हमको
हम खुद ही मिल गए हैं।




शुक्रवार, 24 अप्रैल 2020

तुम्हारे लिए


।1।
सुषुम्ना के अनाहत के अनाहद नाद जैसे हो,
हृदय में बज रहे दिन रात बिना आघात जैसे हो
तुम्ही में लीन हो कर जड़ से चेतन हो रही हूँ मैं
मुझे जो शिव पे है शाश्वत उसी विश्वास जैसे हो।

।2।
जो बजता साम के स्वर सा वो अनहद नाद तुम सा है
जो है अग्रज कलाओं का वो अंतर्नाद तुम सा है
जिसे साधक समझता है कोई भी पढ़ नहीं सकता
जो दे अनुभूति प्रभु के साथ की वो साथ तुमसा है।

सोमवार, 20 अप्रैल 2020




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।1।
जो मन मे बज रही मेरे ,वो अनुपम भैरवी हो तुम,
सभी कुछ है गलत मेरे लिए, अब बस सही हो तुम,
जिधर कह दो उधर से सूर्य होगा अब उदय मेरा,
जहाँ मैं लाभ में हर दम , वो जीवन की बही हो तुम।

<><><><><><><><><><><><><><>
।2।
मेरी आकाशगंगा के प्रखरतम सूर्य हो तुम ही
सजी है धड़कनों की ताल जिससे तूर्य हो तुम ही 
भटकती फिर रही थी मैं यहाँ अभिशप्त पाहन सी;
उजाला भर दिया मुझमें सुघड़ बैदूर्य हो तुम ही

<><><><><><><><><><><><><><>
।3।
मेरे भावों के उलझे बाग़ के हमदर्द माली तुम
मेरी होली के पक्के रंग और मेरी दिवाली तुम
तुम्हीं से बज रही है ताल धड़कन की कहरवे सी

तुम्हीं से राग की अनुगूँज हो मेरी कवाली तुम

बुधवार, 8 अप्रैल 2020

गीत: हम निरंतर मर रहे हैं






क्यों परीक्षा पर परीक्षा ले रहे हो तुम हमारी
क्यों नहीं तुम देखते हो हम निरंतर मर रहे हैं

आज से जाना नहीं , तुमको जिया है हमने बरसों
ढूँढते थे हम तुम्हें जब भी खिली खेतों में सरसों
शीत में तुम धूप बन कर साथ चलते थे हमारे
और नवल बासन्त में जब कुछ नहीं था,तुम सहारे
बस तुम्हारे साथ से जीवन के पतझड़ हर रहे है 

क्यों नहीं तुम देखते हो, हम निरंतर मर रहे हैं।

स्नेह है, आसक्ति इसको मत समझना प्रिय मेरे
भक्ति है , व्यक्तित्व से, ना व्यक्तिगत कुछ स्वार्थ मेरे 
साथ होते हो तो जीवन हो ठगा सा देखता है
और नहीं तो फिर स्वयं यम प्राण मेरे खेंचता है
जान लो ये बस तुम्ही से घट नयन के भर रहे हैं

क्यों नहीं तुम देखते हो, हम निरंतर मर रहे हैं।

जोड़ते हो राम से यह कह, रगों में है तुम्हारी
तोड़ते फिर उस तरह , ज्यों हो विलग सीता थी हारी
क्यों नहीं तुम सत्य को स्वीकारते हो राम मेरे
क्यों नहीं आते पलट कर , हे प्रभु तुम धाम मेरे
आज मरघट बैठ शिव के साथ हम फिर तर रहे हैं

क्यों नहीं तुम देखते हो, हम निरंतर मर रहे हैं।
क्यों परीक्षा पर परीक्षा ले रहे हो तुम हमारी
क्यों नहीं तुम देखते हो, हम निरंतर मर रहे हैं।



मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

लखन गीत







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पैरों के नूपुर चीन्हने वाला माता को समझाता है
तुम कहीं नहीं जाना मैया ये कह के परिधि बनाता है

देखा न कभी मुख माता का, चरणों मे ही नित ध्यान रहा
बस एक सुरक्षा की ख़ातिर वर्षों तक शर संधान रहा
ना सोया ना खाया जिसने वो कंद मूल बिन लाता है

तुम कहीं नहीं जाना मैया ये कह के परिधि बनाता है।

उस पर्णकुटी का रखवाला, जो शेष विशेष है जन्मों से
जो राम की सेवा में नित रत, जो है महेश का कर्मों से
वो स्वयं भारती सीता की आज्ञा पर सब कर जाता है

तुम कहीं नहीं जाना मैया ये कह के परिधि बनाता है।

जब पार करी ,लक्ष्मण रेखा ,सीता से सब कुछ छूट गया
प्रभु राम ढूँढते रहे उन्हें, विह्वल होकर मन टूट गया
जो सीख  मिली मानस से उसको मान तेरा क्या जाता है

तुम कहीं नहीं जाना मैया ये कह के परिधि बनाता है

जब विषम काल आये तो बस नियमों का तुम निर्वाह करो
खुद सत्य मार्ग पर चलो और लोगों की भी परवाह करो
विपदाएं भी भय खाती हैं, जब मनुज एक हो जाता है

तुम कहीं नहीं जाना मैया ये कह के परिधि बनाता है
पैरों के नूपुर चीन्हने वाला माता को समझाता है।


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शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

मेरे राम

https://youtu.be/YgaqaRg9GKo
https://youtu.be/YgaqaRg9GKo


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मेरे अपने राम



स्वांस की पुकार राम, धड़कनों में राम हैं
हर विकार मार दे जो, वो प्रभाव राम हैं।

राम सूर्य सूर्य का हैं, चन्द्रमा का चंद्र हैं
राम काव्य की कला है, राम एक छंद हैं
राम रस है, राम ही अलंकरण अनूप है
राम छांव हैं कभी तो शीत वाली धूप हैं

भाव की प्रवणता राम , और स्वभाव राम हैं
हर विकार मार दे जो, वो प्रभाव राम हैं।

संस्कारों का प्रमाण, संस्कृति का मूल हैं
तार दे जो हर जनम को , वो चरण की धूल है
राम भक्ति राम शक्ति, राम ही पुनीत है
राम तथ्य राम कथ्य, राम ही गुनीत है

सत्य मार्ग का चुनाव, वो चुनाव राम हैं
हर विकार मार दे जो, वो प्रभाव राम हैं।

तारते अहिल्या और मारते है ताड़का
है विराट रूप उनका, जैसे रूप ताड़ का
एक पग में धरती नपती एक पग पाताल है
एक पग नपे आकाश, वो बड़े विशाल है

भाई का जो भाई से हो, वो जुड़ाव राम है
हर विकार मार दे जो, वो प्रभाव राम हैं।

लोक के वो नायक है , चेतना का तत्व हैं
तीन तरह के गुणों में राम ही सत्त्व हैं
पंच तत्व से दिलाए मुक्ति का वो प्राय है
वो स्वयं में एक मात्र मोक्ष का उपाय हैं

जो गुरुत्व से भी तेज वो खिंचाव राम हैं
हर विकार मार दे जो, वो प्रभाव राम हैं।

हैं अनन्त दिगदिगन्त, वो हरी के रूप हैं
वन में घूमते हैं किंतु राम जग के भूप हैं
हर हृदय में जो बसे वो धड़कनों की ताल है
राम भारतीयता का उच्च शीर्ष भाल है

मुक्ति मार्ग जो दिलाये राम वो चढ़ाव हैं
हर विकार मार दे जो, वो प्रभाव राम हैं।

मोह से विरक्ति दे के वो स्वयं से जोड़ ले
भाग जिसको खोलने हो राम मन से बोल ले
गा रहे हो राम तुलसी तो सुधीर राम है
और कबीर भक्त हो तो फिर फकीर राम है

बिन शरीर के जो हर शरीर का बचाव है
हर विकार मार दे जो, वो प्रभाव राम हैं।

राम है कठिन बहुत, अगर तू एक विकार है
और उतने ही सरल हैं ,गर हृदय में प्यार है
राम शक्ति शक्ति के हैं, शक्ति के स्वरूप है
राम की जो भक्ति शिव से भक्ति वो अनूप है

शेष से विशेष करे वो चढ़ाव राम है
हर विकार मार दे जो, वो प्रभाव राम हैं।





स्वधा रवींद्र "उत्कर्षिता"

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बुधवार, 25 मार्च 2020

एकांतवास



मुझे नहीं मालूम 
तुम क्या कर रहे हो 
अपने इस एकांतवास में
पर मैने निकाल ली है
अपनी पुरानी किताबें
जो अधपढी और अधपकी
से रह गयी थी बरसों पहले 
मन और मस्तिष्क के आंगन में।
फिर से दोहरा रही हूँ
उनके अर्थ 
और जी रही हूँ उनका
एक एक पात्र 
अपने अंदर
कभी रश्मिरथी का कर्ण 
बन जाती
तो 
कभी मेघदूत का वो 
काला मेघ
और उड़ती फिरती 
कालिदास, तुलसी, मीरा और कबीर 
के साथ 
भक्ति के अनंत आकाश में।


मुझे नहीं मालूम 
तुम क्या कर रहे हो 
अपने इस एकांतवास में
पर मैने निकाल लिए हैं
अपने वो कुछ सूखे कुछ गीले रंग
कुछ ब्रश 
जिनके पीछे की लकड़ी
काटी थी मैने 
अपने ही दांतों से
ये सोचते हुए 
किन रंगों से रंगनी है 
कैनवास की ये दुनिया
जिसका ईश्वर कोई और नहीं 
मैं ही तो हूँ
कर सकती हूँ आकाश को हरा
धरती को नीला
पानी को लाल
और खून को बेरंगा और पारदर्शी
अपनी कल्पनाओं की इस दुनिया में


मुझे नहीं मालूम 
तुम क्या कर रहे हो 
अपने इस एकांतवास में
पर मैने निकाले हैं 
कुछ सूफी 
कुछ पुराने
कुछ नए गाने
कुछ गज़लें कुछ भजन 
और कुछ अनसुने तराने
जिनमें बंदगी है,
और ज़िंदगी भी
घूम रही हूँ लगा कर 
कान में ब्लू टूथ वाला ईयरपीस
और गुनगुना रहीं हूँ
कभी सुर में तो कभी
थोड़ा बेसुरा होकर
मुस्कुराते हुए, 
व्यस्त हूँ मैं अपने घर के 
कुछ सुरीलों को चिढ़ाने में।

मुझे नहीं मालूम 
तुम क्या कर रहे हो 
अपने इस एकांतवास में
पर मैने 
जाने कितने ही 
कामों को करते हुए 
बंद कर ली हैं आँखें
और ढूंढ रही हूँ खुद को
अपने ही अंदर
पढ़ी थी कुछ दिनों पूर्व 
यथार्थ गीता
पढ़ा था महाभारत कहीं और नहीं
हमारा शरीर है
सद्कर्मो का प्रेषक जीता है धर्म क्षेत्र
और दुष्कर्म ही 
जन्म देते हैं अपने अंदर
एक कुरुक्षेत्र
तुम स्वयं अर्जुन भी हो
और कृष्ण भी
अपनी प्रकृति का निर्धारण
तुम्ही कर सकते हो
बस यही सोच
रत हूँ
अपने अंदर बसे अर्जुन को
कृष्ण बनाने में

मुझे नहीं मालूम 
तुम क्या कर रहे हो 
अपने इस एकांतवास में
पर मैं जी रही हूँ 
एक एक पल
बिना डरे, बिना सोचे
कि कल क्या होगा
हम होंगे या नहीं, 
वो होगा या नहीं
मैं तो बस इतना जानती हूँ
हर बात के दो पहलू होते है
एक अच्छा और एक बुरा
बुरे पे ध्यान केंद्रित होना 
आसान है
पर मुझे आसान कब रास आया है
इसलिए कठिनतम जी रही हूँ,
देखते हुए 
अच्छा पहलू
इस विभीषिका का
और रत हूँ सबको ये समझाने में
जी लो
ये क्षण बहुत कीमती है
फिर मिले न मिलें
और लग गयी हूँ 
इस विषमता में भी 
अपने लिए एक नया 
भविष्य रचने में

मुझे नहीं मालूम 
तुम क्या कर रहे हो 
अपने इस एकांतवास में
पर मैं........