मम अंतर्नाद

मम अंतर्नाद
मेरा एकल ग़ज़ल संग्रह

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2020

गीत:-एक है अन्तर्ध्यान




दो शरीर हैं अपने, दिखता एक, एक है अन्तर्ध्यान
जैसे धारे शक्ति कृपानी ऊपर उसके रहती म्यान।

अंतर्मन की शक्ति, शक्तिशाली है ,बड़ी प्रभावी है
कर्मठ हो कर , ध्येय साधने वाला, विजयी भावी है
वो पाता है ज्ञान लगाए जो अर्जुन सा ध्यान

दो शरीर हैं अपने, दिखता एक, एक है अन्तर्ध्यान
जैसे धारे शक्ति कृपानी ऊपर उसके रहती म्यान।

सुख मुद्रा में बैठ ,हाथ पर हाथ धरे, कर आँखे बंद
साँसों की माला पे जप ले राम नाम के अनुपम छंद
राम नाम ही पार उतारे, भव सागर जब हो अभियान

दो शरीर हैं अपने, दिखता एक, एक है अन्तर्ध्यान
जैसे धारे शक्ति कृपानी ऊपर उसके रहती म्यान।

दर्शन कहता गीता का बस एक कर्म ही करना है
अपने अंदर झांक, स्वांस की लय पर तुझको चलना है



गुरुवार, 27 फ़रवरी 2020

गीत:- ज्ञान प्राप्त होता है





ध्यान मार्ग पर चलने से ही ,ज्ञान प्राप्त होता है
छाता है उजास तब मन मे, अंधकार खोता है

सुख की नदियां बह उठती है, अँखियाँ दुख खोती है
जब सारे चक्रों की ऊर्जा, ऊर्ध्वाधर होती है
ज्ञान उदित जब हो जाता है, अज्ञानी रोता है,

ध्यान मार्ग पर चलने से ही ,ज्ञान प्राप्त होता है।

नश्वर है शरीर और शाश्वत ईश बसा जो उसमें
पवित्रता आनंद खुशी सुख का सागर है उसमें
फिर भी भौतिकता का आदी क्यों कर तू होता है

ध्यान मार्ग पर चलने से ही ,ज्ञान प्राप्त होता है।

स्वयं उजाला बन जाते जो भक्ति मार्ग चलते हैं
अंशुमान सी किरण बिखेरे त्रास सभी हरते हैं
जान रहा सब सत्य प्रकृति का क्यों कर तू सोता है

ध्यान मार्ग पर चलने से ही ,ज्ञान प्राप्त होता है।

जाग गई कुंडलिनी तेरी सत्य समझ जाएगा
तू ही धर्म क्षेत्र है तुझमें ही गीता पायेगा
मार्ग चुने जो स्वांस साध कर वो प्रभुमय होता है

ध्यान मार्ग पर चलने से ही ,ज्ञान प्राप्त होता है।




स्वधा रवींद्र "उत्कर्षिता"

बुधवार, 26 फ़रवरी 2020

गीत:- होठों पे मौन सजाए है


नैनों में भँवर, होंठों पे सदा, 
मन मे कुछ राज़ छुपाए है
जो कल तक बोला करती थी, 
होठों पे मौन सजाए है।

आयी थी जब वो प्रथम सामने 
मन मेरा मुस्काया था
अपनी चंचल चितवन से उसने 
मुझको यूँ भरमाया था
जो कल तक अल्हड़ नदिया थी 
वो चिर विश्राम निभाये है,

नैनों में भँवर, होंठों पे सदा, 
मन मे कुछ राज़ छुपाए है
जो कल तक बोला करती थी, 
होठों पे मौन सजाए है।

चेहरे पे कई लकीरें है 
अनुभव के लाखों रंग लिए
वो पलकें खोल देखती है , 
मन मे दुनिया के तंज लिए
मन टूटा है लेकिन फिर भी 
वो एक मुस्कान सजाए है

नैनों में भँवर, होंठों पे सदा, 
मन मे कुछ राज़ छुपाए है
जो कल तक बोला करती थी, 
होठों पे मौन सजाए है।

जाने कितने ही रूपों से 
उसने दुनिया को सरसाया
माँ बहन मित्र बन कर जीवन पर 
अमृत रस भी बरसाया
वो इन्द्रधनुष के रंगों सी बन कर 
हर हृदय लुभाये है

नैनों में भँवर, होंठों पे सदा, 
मन मे कुछ राज़ छुपाए है
जो कल तक बोला करती थी, 
होठों पे मौन सजाए है।

गीत:- छोर मिलाया करती हूँ




वो गोले के केंद्र खड़े हो परिधि नापते रहते हैं
मैं तिर्यक रेखा बन कर दो छोर मिलाया करती हूँ।

प्रेम नहीं संयोग चाहता वो वियोग में भी खुश है
योग भोगता निरत वियोगी उसको काहे का दुख है
वो नयनों से तीर चला, रत रहे प्रतीक्षा में निस दिन
मैं उंगली के पोरों से वो नाम मिटाया  करती हूँ

वो गोले के केंद्र खड़े हो परिधि नापते रहते हैं
मैं तिर्यक रेखा बन कर दो छोर मिलाया करती हूँ।

वो क्या जानें जब जब उनको लिखती हूँ पाती कोई
बहती रहती हैं ये अँखियाँ जो बरसों से ना सोई
वो अनदेखा कर मुझको गैरों का साथ निभाते हैं
मैं उनके पदचिन्हों पर फिर कदम बढ़ाया करती हूँ।

वो गोले के केंद्र खड़े हो परिधि नापते रहते हैं
मैं तिर्यक रेखा बन कर दो छोर मिलाया करती हूँ।

राम नाम की माला लेकर वो सन्यासी बन भटके
जिनको कान्हा मान बिरज में हम उलझे और हम अटके
वो जग भर के पुरुषोत्तम बन सबके त्रास मिटाते है 
मैं विष का प्याला पी कर फिर , उन्हें जिताया करती हूँ

वो गोले के केंद्र खड़े हो परिधि नापते रहते हैं
मैं तिर्यक रेखा बन कर दो छोर मिलाया करती हूँ।



रविवार, 23 फ़रवरी 2020

होली गीत


देखो रंग भरा चहुं ओर 
भागे गीली अली
रस बरसे आज चहुं ओर
भागे पीली अली।

श्याम विछोह में व्याकुल है ये
अँखिनयन जल ले आकुल है ये
भीगी अपने नयनजल आज
लागे सीली अली।

मोहन मोहन टेर रही है
माला नाम की फेर रही है
मिल गए जब नंद के लाल
लागे जी ली अली।

अंग अंग को श्याम किया है
मन को भी निष्काम किया है
पिया जब विछोह का माहुर
लागे नीली अली।

मन पिंजर से बंधा हुआ था
जीवन मे भी रमा हुआ था
मिटा भ्रम का मायाजाल
पी से मिल ली अली।

देखो रंग भरा चहुं ओर 
भागे गीली अली
रस बरसे आज चहुं ओर
भागे पीली अली।




स्वध

होली गीत


लिपट गई राधे मोहन संग
हाँथ में अपने लेके रंग।

श्याम अकेले खड़े मगन है
मुरली से बस लाग लगन है
देख वियोगन सी गोपियन को
उद्धव मारे व्यंग
हाँथ में अपने लेके रंग।

राधा रानी खेलन आयी
संग गोपियों को भी लाई 
बोली अबकी करने आई
मोहन तुझको तंग
हाँथ में अपने लेकर रंग।

बोली गाल गुलाल मलूँगी
आज श्याम तोहे लाल करूंगी
पीसऊंगी तेरी खातिर में
नंदलाला फिर भंग
हाँथ में अपने लेके रंग।

केसरिया रंग में रंग मोहन
खेलें रास मगन संग जोगन
आज बिरज की हालत देख के
मैं भी रह गयी दंग
हाँथ में अपने लेके रंग।




गुरुवार, 20 फ़रवरी 2020

गीत :- फकीरी



ढूंढ लिया सारा जग मैने 
राम नहीं मिल पाया
अँखियाँ करीं बंद जब मैंने, 
मन मन बीच लगाया
राम नज़र तब आया मुझको 
राम नज़र तब आया।

लागी रे फकीरी मुझे ऐसी पिया
तुझपे मरी मैं सैयां तुझको जिया।

नदिया बीच अटक गयी नैया
भंवर समझ ना आया
जग में रह कर जग की हो गयी
खुद को कभी न पाया
कहना था जब भी कभी
होंठो को सिया

तुझपे मरी मैं सैयां तुझको जिया
लागी रे फकीरी मुझे ऐसी पिया
तुझपे मरी मैं सैयां तुझको जिया।

मटकी लेकर आई जब जब
मैं गंगा के तीरे
भूल गयी माटी का मटका
उतरी उसमें धीरे
पाप पुण्य की गठरी छोड़ी
केवल प्रेम जिया

तुझपे मरी मैं सैयां तुझको जिया
लागी रे फकीरी मुझे ऐसी पिया
तुझपे मरी मैं सैयां तुझको जिया।

नंगे पैरों निकल पड़ी मैं
अनजानी राहों पर
ओढ़ी नहीं चुनरिया मैने
नाहिं ढका अपना सर
कहाँ बची अब जग की चिंता
जब विषपान  किया

तुझपे मरी मैं सैयां तुझको जिया
लागी रे फकीरी मुझे ऐसी पिया
तुझपे मरी मैं सैयां तुझको जिया।

टेर रही थी नाम तुम्हारा
भटक रही राहों पर
अक्षर बन गए शब्द हमारे
उतर गए वो अधर पर
जाते जाते इस दुनिया से
तेरा नाम लिया

तुझपे मरी मैं सैयां तुझको जिया
लागी रे फकीरी मुझे ऐसी पिया
तुझपे मरी मैं सैयां तुझको जिया।





मंगलवार, 18 फ़रवरी 2020

गीत :- ओ रंगरेज़


ओ रंगरेज़ तूने कैसा रंगा है
उतने न कैसे भी ये रंग
चलने लगी मैं तेरे संग।

छुआ नहीं कभी मुझे
फिर कैसे रंग दिया
पिया ये बता दे कैसे
अपने सा ढंग दिया
जपती हूँ माला पिया
तेरे नाम की
कहते हैं लोग हुई मैं तो मलंग।

साँसे हैं गुलाबी मेरी
धड़कन लाल
श्वेत रंग अंग सजा
काले काले बाल
पहनी है पीली चूनर
तेरे नाम की
श्याम रंग देख हुई दुनिया ये दंग।

चुप भी रहा न जाये
कहा भी न जाये
दर्द लगे मीठा 
कभी सहा भी न जाये
रूठे है सांसे मेरी
मुझसे पिया
देखा तुझे जो मैंने सौतन के संग।

ओ रंगरेज़ तूने कैसा रंगा है
उतने न कैसे भी ये रंग
चलने लगी मैं तेरे संग।



शनिवार, 15 फ़रवरी 2020

गीत:-प्रेम ही लक्ष्य है

गीत



तुम हमारे हो या हो किसी और के
बात छोटी है ये फर्क पड़ता नहीं
प्रेम ही मार्ग है प्रेम ही लक्ष्य है
इसपे कोई नया रंग चढ़ता नहीं।

प्रेम वो है कि जिसमें सदा आँख नम
और सदा ही हृदय मुस्कुराता हुआ
प्रेम वो है कि जिसमें छुआ ना गया
किंतु मन प्राण सब सरसराता हुआ
प्रेम पथ जो पथिक बढ़ गया वो कोई
और रस ,गीत में दोस्त गढ़ता नहीं

प्रेम ही मार्ग है प्रेम ही लक्ष्य है
इससे आगे कोई सत्य पड़ता नहीं।

प्रेम मीरा ने विष पी किया श्याम से
प्रेम में उर्मिला सोई वर्षों नहीं
प्रेम में डूब कर मर गयी सोहनी
प्रेम की राह पर जीत बोई नहीं
संग हो या विरह जीत या हार हो
दोष वो पी के सर कोई मढ़ता नहीं

प्रेम ही मार्ग है प्रेम ही लक्ष्य है
इससे आगे कोई सत्य पड़ता नहीं।

राम वन को गए अनुगमन बन गयी
विश्व भर के लिए वो चलन बन गयी
यदि पिया माँगती बेटियाँ राम सा
बेटों की मनप्रिया भी सिया बन गयी
राह कांटों भरी या फूलों भरी
प्रेम पथ जो चला फर्क पड़ता नहीं

प्रेम ही मार्ग है प्रेम ही लक्ष्य है
इससे आगे कोई सत्य पड़ता नहीं।




शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

मेरे बेटे जादू के लिए

तुम्हे पाके जाना है मैने कि दुनिया में मैं तुमसे ज़्यादा प्यार किसी को नहीं करती। आज वैलेंटाइन डे पर जब कुछ लिखने को कहा गया तो लगा तुमसे अधिक आवश्यक मेरे लिए कुछ नहीं है।
तुम हो तो हम हैं।

ये अशीष बस तुम्हारे लिए।

भाग्य करे अनुगमन तुम्हारा 
ऐसा है आशीष मेरा
शीश तेरे चमके ध्रुव तारा
ऐसा है आशीष मेरा

तुम बरगद के वृक्ष सरीखे
पनपो और विस्तार करो
चंदन के पेड़ों सी खुशबू
पर भी तुम अधिकार करो
आंगन की तुलसी बन जाओ
तुम घर भर से प्यार करो
इस तरह से पुत्र मेरे तुम
जीवन को वरदान करो

दूर रहें तुमसे विपत्तियाँ
ऐसा है आशीष मेरा
भाग्य करे अनुगमन तुम्हारा 
ऐसा है आशीष मेरा।

तुम गंगा की धार बनो
जग भर के पापों को धो दो
तुम धरती पर सत्य प्रेम 
मानवता के अंकुर बो दो
तुम विश्वास बनो हर मन का
हर विकार से दूर रहो
अच्छी राहों बढ़ कर भी
सद्कर्मो में चूर रहो

सूर्य सरीखी आभा तेरी
ऐसा है आशीष मेरा
भाग्य करे अनुगमन तुम्हारा 
ऐसा है आशीष मेरा।

शिव का डमरू बनो और 
जग भर को नृत्य कराओ तुम
आवश्यकता पड़ने पर बन त्रिशूल
फिर पाप मिटाओ तुम
भस्म लपेटे रहो ज्ञान की
चंद्र शक्ति का तुम धारो
दे तुमको वरदान स्वयं शिव
कभी न बालक तुम हारो

हो मस्तिष्क तुम्हारे शारद
ऐसा है आशीष मेरा
भाग्य करे अनुगमन तुम्हारा 
ऐसा है आशीष मेरा।

जब बोलो तो जग प्रसन्न हो
मौन रहो सब रुक जाए
स्वर लहरियाँ उठें ग्रीवा से 
सब सम्मुख हो झुक जाएं
तेरा हो सम्मान सदा
तू अनुपम अविजित अमोघ हो
तू मनमोहन सरल रहे
सघन विचारों को धारे हो
लेकिन फिर भी तरल रहे

अमृत हो तेरी वाणी में
ऐसा है अशीष मेरा
भाग्य करे अनुगमन तुम्हारा 
ऐसा है आशीष मेरा।


बुधवार, 12 फ़रवरी 2020

कुम्भार गीत




रे माटी के पुतले, तू काहे गूंधे माटी, और काहे चाक चढ़ाए

देह पुरानी होती जाती
और एक दिन खो जाती है
पिंजरा खाली रह जाता है 
और मैना उड़ जाती है
जान रहा मैं सत्य सृष्टि का
तू क्यों प्रश्न बिछाए

मैं माटी का पुतला ,माटी का मोल मैं जानूँ ,लूँ इससे दिए बनाये
रे माटी के पुतले, तू काहे गूंधे माटी, और काहे चाक चढ़ाए।

खाली कुम्भ बिना पानी के
बिल्कुल है बेमानी
कोरी चादर पहन निकल गयी
बन बिल्कुल दीवानी
बिना राम के बनी अहिल्या
जग भी मुझे सताए

मैं माटी का पुतला ,माटी का मोल मैं जानूँ ,लूँ इससे दिए बनाये
रे माटी के पुतले, तू काहे गूंधे माटी, और काहे चाक चढ़ाए।

टेर रही मैं नाम पिया का
जीवन चाक चलाऊँ
राम कभी और कृष्ण कभी
जोगन बन रटती जाऊँ
मिट्टी की ही काया सबकी
वो ही पार लगाए

मैं माटी का पुतला ,माटी का मोल मैं जानूँ ,लूँ इससे दिए बनाये
रे माटी के पुतले, तू काहे गूंधे माटी, और काहे चाक चढ़ाए।

झीनी हुई चदरिया मेरी
झीना हुआ मेरा मन
अँखियों से बिन मौसम बरसे
जाने कैसे ये घन
जब सब छूटा तब उसने ही
भव सागर तरवाये

मैं माटी का पुतला ,माटी का मोल मैं जानूँ ,लूँ इससे दिए बनाये
रे माटी के पुतले, तू काहे गूंधे माटी, और काहे चाक चढ़ाए।














सोमवार, 10 फ़रवरी 2020

गीत:- क्या लगा तुमको




क्या लगा तुमको
कि मेरे मार्ग को
अवरुध्द कर दोगे
तो रुक जाऊँगी मैं।।

मैं हलाहल हूँ नहीं
मैं सोम का अनुपम कलश हूँ
मैं नहीं हूँ झूठ
मैं चिर सत्य की शाश्वत झलक हूँ
क्या लगा तुमको
कि छल कर तुम मुझे फिर क्षुब्ध कर दोगे
तो चुक जाऊंगी मैं,

क्या लगा तुमको
कि मेरे मार्ग को
अवरुध्द कर दोगे
तो रुक जाऊँगी मैं।।

मैं पहाड़ी वो नदी हूँ
बांध से जो बंध न पाई
मैं मरुस्थल की तपिश जो
प्यास से भी थम न पाई
क्या लगा तुमको
कि तुम मुझको दिखा हठ युद्ध कर दोगे
तो झुक जाऊँगी मैं।

क्या लगा तुमको
कि मेरे मार्ग को अवरुध्द कर दोगे
तो रुक जाऊँगी मैं।।

झूठ से अवगत करा कर
सत्य उसको गर कहोगे
द्वेष को आकंठ भर कर
प्रेम की भाषा  गहोगे
क्या लगा तुमको
कि तुम खुद को अगर जो कृष्ण कर दोगे
तो दुख जाऊंगी मैं

क्या लगा तुमको
कि मेरे मार्ग को अवरुध्द कर दोगे
तो रुक जाऊँगी मैं।।

त्याग कर सर्वस्व अपना
आज जब मैं चल पड़ी हूँ
मैं जगत हित के लिए
संधान करने को खड़ी हूँ
क्या लगा तुमको
कि अपने क्रोध को अनल कर दोगे
तो फुंक जाऊंगी मैं

क्या लगा तुमको
कि मेरे मार्ग को अवरुध्द कर दोगे
तो रुक जाऊँगी मैं।।

रविवार, 9 फ़रवरी 2020

गीत :- दुधमुंहा बच्चा



वो दुधमुहाँ बच्चा
समझता है 
कि किसने प्रेम से 
उसको छुआ है
कौन माँ है कौन चाची
कौन मामी कौन बुआ है

वो दुधमुहाँ बच्चा
समझता है 
कि किसने प्रेम से 
उसको छुआ है।

वो दुधमुहाँ बच्चा 
पकड़ लेता है उँगली
छोटी छोटी उंगलियों से
और अपलक देख कर
वो मांगता है स्नेह का 
उपहार सबसे
चाहता है हर कोई गोदी उठाये
और देकर लाड़ उसको
बोल दे सारी धरा से 
ये मेरी मांगी दुआ है

वो दुधमुहाँ बच्चा
समझता है 
कि किसने प्रेम से 
उसको छुआ है।

है उसे हर कोई भाता
दूध देता जो खिलाता
जब भी आती दूध वाली
बाल्टी संग झूल जाता
बन हठी वो मांगता सब
पा खुशी से फूल जाता
और लगा कर दुग्ध में मुख
बोलता मन खुश हुआ है

वो दुधमुहाँ बच्चा
समझता है 
कि किसने प्रेम से 
उसको छुआ है।


देख कर सूरज मसलता है 
कभी वो आंख अपनी
और कभी ठंडी रजाई 
पैर से वो फेंकता है
रोता है हर भावना पे 
और कभी है मुस्कुराता
माँ की छाती से लिपट कर
वो स्वयं को सेंकता है
बोलता सा मौन लेकर
उसने भावों को छुआ है

वो दुधमुहाँ बच्चा
समझता है 
कि किसने प्रेम से 
उसको छुआ है।

वो दूधमुहाँ बच्चा
उलटकर दूध जब जब फेंकता है
माँ की विवश आंखों को
भूखा और प्यासा देखता है
जानता है वो कि केवल 
एक ये ही देह जिसको है उसी से नेह
उसकी भूख को महसूस करके
बोलती है
छाती भरा है दूध 
लल्ला कह रहा है भूख
ये अद्भुद नज़ारा अनछुआ है

वो दुधमुहाँ बच्चा
समझता है 
कि किसने प्रेम से 
उसको छुआ है।


है नहीं अनिभिज्ञ 
सच और झूठ से वो
है नहीं अनिभिज्ञ वो 
अच्छे बुरे से
है समझता मातु का 
वात्सल्य भी वह
और डरता है 
नुकीले से छुरे से
कांप उठता है वो 
अनजानी छुवन से
और भय खाता 
त्वचा का हर रुवां है

वो दुधमुहाँ बच्चा
समझता है 
कि किसने प्रेम से 
उसको छुआ है।

वो दुधमुहाँ बच्चा प्रकृति की 
दी हुई अनुपम कृति है 
आज जन्मा है मगर
अगले पलों की वो निधि है
वो ईश जैसा रूप लेकर
हर हृदय को हर रहा है
हर कोई लेता बलैयां
देख उसको तर रहा है
जिसने देखी मोहनी सूरत
वो उसका ही हुआ हूं

वो दुधमुहाँ बच्चा
समझता है 
कि किसने प्रेम से 
उसको छुआ है।










गीत:- प्यार का उत्सव दिया है


एक गीत:शारदा ने शारदा को प्यार का उत्सव दिया है


शारदा ने शारदा को प्यार का उत्सव दिया है
ज्ञान बुद्धि विवेक और सद्भाव का नव वर दिया है।

है लली परछाई माँ की , माँ सरीखे भाव उसके
माँ सरीखी लालिमा है , माँ सरीखे चाव उसके
वैष्णवी ने वैष्णवी को भावना से भर दिया है
प्रेम ,करुणा सत्य और सानिध्य का नव वर दिया है

शारदा ने शारदा को प्यार का उत्सव दिया है
ज्ञान बुद्धि विवेक और सद्भाव का नव वर दिया है।

सीखती हैं बेटियाँ सब संस्कारो को हृदय से
है मिटाती कष्ट अपनों का सदा पूरे हृदय से
भैरवी ने भैरवी को संवेदना से तर किया है
धैर्यता, दृढ़ शक्ति, दॄढ विश्वास का सम्बल दिया है

शारदा ने शारदा को प्यार का उत्सव दिया है
ज्ञान बुद्धि विवेक और सद्भाव का नव वर दिया है।

एक दूजे पर किया विश्वास दोनों ने सदा ही
पुत्रियों ने हैं संभाली पीढ़ियों की वेदना भी
अम्ब ने फिर अम्ब को अनुभूतियों से तर किया है
लक्ष्य के प्रति नित्य उन्मुख अग्रसर कर तर दिया है

शारदा ने शारदा को प्यार का उत्सव दिया है
ज्ञान बुद्धि विवेक और सद्भाव का नव वर दिया है।







शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2020

गीत:- नैन सब कुछ पार करके देखते हैं।



गीत



ढाँपने को दो नयन दो हाथ उन पर रख दिये थे 
पर नहीं मालूम था ये
हाथ अपनी गर्मियों से बस नयन को सेंकते हैं
नैन सबकुछ पार करके देखते हैं।

कल खरीदी थी पिता ने लाल साड़ी
सोलहों श्रंगार भी लाकर दिए थे
और चूनर पर सितारों जुगनुओं के
स्वप्न हीरे मोतियों से भी सीए थे
लाल चूड़ी , लाल सेंदुर , 
लाल बिंदिया, लाल तेवर
मांग टीका नाक की नथ
कान कुंडल और ज़ेवर
सब सजा कर थाल में ,बेटी करी थी दान
था अभिमान 
क्यों कर आज वो उस हॉस्पिटल के 
एक बर्निंग वार्ड के बाहर खड़ा था
पा खबर बेटी जली है आप से ही वो लड़ा था
आज बेटी के नयन के अश्रु का खारा नमक
जब घाव उसके हैं जलाते
तब पिता उसके नयन की रिक्तता में
खोए सपनों की कसक को देखते हैं

नैन सबकुछ पार करके देखते हैं।

जल रही थीं जब चिताएं , 
बिना लकड़ी और कफन के
थी सड़क शमशान उनका, 
कुछ पड़े थे बिन दफन के 
तब बहुत था ढूंढना मुश्किल कि इसमें 
कौन हिन्दू कौन मुसलमां
भीड़ केवल भीड़ होती है 
न इसका है मुजस्समा
तब पड़ी लाशों में माँ के हाथ
जब जब काँपते हाथों से बच्चे ढूंढते है
नैन विह्वल हो भरे खारी सी गंगा 
प्राण से खाली शरीरों में 
उसी माँ के कुंवर के
प्राण मिल जाये कहीं शायद पड़े ये देखते हैं

नैन सबकुछ पार करके देखते हैं।

मंदिरों में घंटियों के स्वर बजे जब
और मस्ज़िद में अज़ानों से सुबह हो
राजनीति के अखाड़ों में बहस के 
बम गिरे जब और संसद में जिरह हो
हो रहे घंटा घरों पर जब प्रदर्शन 
और जब बागों में कलियाँ मर रही हों
देश के बेटे जो बेटे जन्म से थे
उनको उनकी मायें खोकर मर रही हों
मांगते हों लोग इसका साक्ष्य
की किसने लगाई आग 
जनता हो रही हो क्षुब्ध 
हर कोई रहा हो भाग
और स्कूली समूहों में जहाँ बरसों से था बस प्रेम
लोगों ने बदल दी डीपियाँ 
बस तब दिखी थी प्रेम से भीगी सखी 
के मन के अंदर की थी खाली सीपियाँ
निस्तब्ध मन में थी व्यथाएँ
वेदना से भर हुए थे नैन भी जब तर
तब नयन ये भाव के सब पार पर्वत करके
खुद की सत्यता को देखते हैं

नैन सबकुछ पार करके देखते हैं
ढाँपने को दो नयन दो हाथ उन पर रख दिये थे 
पर नहीं मालूम था ये
हाथ अपनी गर्मियों से बस नयन को सेंकते हैं
नैन सबकुछ पार करके देखते हैं।





स्वधा रवींद्र "उत्कर्षिता"