मम अंतर्नाद

मम अंतर्नाद
मेरा एकल ग़ज़ल संग्रह

सोमवार, 29 अगस्त 2022

सोई और आराम किया




उसने मुझको छोड़ दिया तो मैंने भी ये काम किया

उसको ताक पे रखा मैंने, सोई और आराम किया।। 


लोगों ने मंदिर में जाकर धूप दीप वंदना करी

मैंने अपने मन को मंदिर तन को अक्षरधाम किया।। 


दुनियादारी वाली गठरी लदी पीठ पर बरसों से

मैंने उसको लादे लादे खुद से नित संग्राम किया।। 


अय्यारों के बीच रही पर कोई फरेब न छू पाया, 

मैंने सच की जोत थाम कर, अपना हर इमाम किया।। 


महफ़िल में रह कर भी ख़ुद को ख़ुद में बाँधे रखा सदा, 

इस तरह से मैंने ख़ुद को देखो आत्माराम किया।। 


जिसने भी गाली दी उसको उसी समय माफ़ी देकर

अपने हिस्से शांति बटोरी राम राम बस राम किया।। 


मुझसे अपनों को यूँ करके रही शिकायत मन भर की

बिना किये, गलती मानी और मैंने युद्ध विराम किया।। 


लोग लड़ रहे थे संज्ञा बनने की ख़ातिर इस जग में

मैंने ख़ुद को हम कहकर संज्ञा की जगह सर्वनाम किया।। 


स्वधा चैन से सो पाती है इसका बस एक कारण है

अपनों की खुशियों को उसने कभी नहीं नीलाम किया।। 



शुक्रवार, 26 अगस्त 2022

एक मुक्तक



अब नहीं कुछ भी कहना मुझे, मौन ही मुझको भाने लगा है, 

एक अनहद  सुरीला सा स्वर मेरे मन को सजाने लगा है, 

तृप्त अब है हर इक कोशिका, कोई तृष्णा नहीं शेष है, 

जब से उसने छुआ है मुझे, मन ये बंसी बजाने लगा है।। 


गुरुवार, 25 अगस्त 2022

एक मुक्तक

 

प्रेम चुंबक नहीं है प्रिये, एक उन्मुक्त आकाश है, 

जिसमें कोई भी चिंता न हो प्रेम कुछ ऐसा अवकाश है

जिसमें कितनी भी पीड़ा मिले किंतु मन मुस्कुराता रहे

प्रेम सबको छकाता फिरे ऐसा मीठा सा बदमाश☺ है।। 


सोमवार, 22 अगस्त 2022

सुनो तथागत




सुनो तथागत! 

कभी देखा है तुमने मौन को

शोर करते हुए

कभी देखी है कोई विद्युत धारा 

उल्टी दिशा में बहती

कभी देखा है 

चलता हुआ चेतना विहीन शरीर

कभी देखा है

बिना कोई इच्छा कोई आस धारे

किसी मन को अधीर...... 


नहीं देखा होगा, 

कह सकती हूँ मैं यह.... 

जानते हो क्यों? 


क्योंकि

इन्हें देखने के लिए चाहिए

विशेष दृष्टि

जो कर सकती हो प्रलय के पलों में 

प्रेम की सृष्टि


और वह दृष्टि पाने के लिए

बनना पड़ता है नीलकंठ

पीना पड़ता है विष

पर कठिन है नीलकंठ बन पाना

यह भी समझती हूँ


बताती हूँ तुम्हें एक और उपाय 

यदि देखने हों तुम्हें

आशाओं की टूटती दीवारों पर 

टिकी जीवन रूपीछत, 

जो दे रही है छाया 

ख़ुद हो कर छत विक्षत


बन न सको नीलकंठ तो 

बन जाना सुकरात

बन जाना मीरा

उठा लेना विष 

कभी प्रेम और कभी समाज के लिए


निश्चित ही तब समझ पाओगे तुम

शांत समंदर के अंदर छिपे तूफ़ान को। 



रविवार, 21 अगस्त 2022

पेड़ पर लिख आए हैं हम



आई मिस यू, आई लव यू, लाइक यू के भाव सारे, 

पेड़ पर लिख आए हैं हम प्रेम के पर्याय सारे....... 


कह नहीं पाए प्रिये को सो प्रकृति से कह रहे हैं

पर्वतों से लड़ रहे हैं, हर नदी में बह रहे हैं

बाग,वन,झरने हमारे संग प्रिय को अब पुकारे


पेड़ पर लिख आए हैं हम प्रेम के पर्याय सारे....... 


नैन निस दिन बह रहे हैं, धड़कनों में तीव्रता है, 

सोचता मस्तिष्क अब ना, हाथ आई वेदना है

हो गए हैं अब हृदय में प्रेम के प्रतिश्याय सारे


पेड़ पर लिख आए हैं हम प्रेम के पर्याय सारे....... 


छंद लिखे गीत लिखे , प्रिय समर्पित बंध लिखे

और फ़िर प्रिय ने किये जो संग, वो छल छंद लिखे

खत्म अब कर आए हैं हम  प्रेम के अध्याय सारे


पेड़ पर लिख आए हैं हम प्रेम के पर्याय सारे....... 





गुरुवार, 18 अगस्त 2022

क्यों?



मुहब्बत है तो फिर आँखों में पानी क्यों?? 

ये अपने साथ तेरी बदगुमानी क्यों?? 


जहाँ नज़रों से सारे काम होने हैं

वहाँ बंदूक अब तुझको चलानी क्यों?? 


तुझे जिसका अदब करना था मेरे दिल

उसी के साथ तेरी बद जुबानी क्यों?? 


ज़हर किसने दिया और कब दिया बोलो

ये तेरे खून का रंग आसमानी क्यों?? 


तुम्हारा लाल धुत है जब नशे में फ़िर

बहु चहिए तुम्हें अब खानदानी क्यों?? 


नहीं माँगा था जिसने कुछ भी तुमसे फ़िर

उसी के साथ तेरी बेईमानी क्यों?? 


रसोईं में खड़ा जब हो गया आकर

तेरा जज़्बा अभी तक मेहमानी क्यों?? 


तेरे किरदार का रंग सबने देखा है

तू उसकी कर रहा है तर्जुमानी क्यों?? 


मरा है देश जब जब खोखला हो कर

पहन ली मंत्रियों ने शेरवानी क्यों?? 


चलाने के लिए हैं हाथ अरबों जब

उन्हें दिखते हैं अंबानी अडानी क्यों?? 


जिन्हें तुमको पकड़ना साँप हैं वोवो सब

फ़िर उनको कैद करने चूहेदानी क्यों?? 


स्वधा कर पायेगी ना चापलूसी जब

बताओ कर रहे फ़िर मेहबानी क्यों?? 


रविवार, 14 अगस्त 2022

एक मुक्तक

 बस यूं ही


उड़ने को हैं पंख मगर, पिंजरे से इश्क़ लगाया है

हमने तो मन के भीतर ही, इक संसार बसाया है

खुद में ही हम गुम रहते हैं , खुद से बातें करते हैं

खुद की ख़ातिर खुद से खुद को हमने रोज़ मिलाया है।



शनिवार, 13 अगस्त 2022

दोहे

 



ढक्कन के बिन जिस तरह, डिब्बे की औकात,

प्रेम बिना उस तरह है, साजन की सौगात।


ठगे नयन हैं देखते, पी चितवन की ओर

प्रतिबिंबित छवि हो रही, अलकों की है कोर।


करी फकीरी हृदय ने,नैन लिए सन्यास

हाँथ जपे माला निरत,, राम मिले अनयास।


ड्योढ़ी लांघी तो लगा, जाऊंगी किस ओर

थामी पी की आस में, राम नाम की डोर।


अंजुरि में भर खड़ी हूँ, मैं बरसों की प्यास,

पी मस्तक को चूम लें, यही एक बस आस।


गीता पढ़ कर क्या हुआ, जब बदले नहिं भाव

आ जाता है आज भी, बात बात पर ताव।


टूटी खटिया फटा बिछौना  ओढ़नी तरामतार

अधरों पर मुस्कान उस तरह ज्यों वन में श्री राम।


मैं बैरागन हो गयी,तज सारे  अरमान,

ना अपयश से दुख मुझे , न यश का अभिमान।


भीगे नैना बोलते,भीगी भीगी बात,

बिटिया पिंजरा है भला, बाहर हैं आघात।

शुक्रवार, 12 अगस्त 2022

😍😍😍😍



खुल के रोने के लिए और खुल के हँसने को

मन का बच्चे सा बने रहना, एक ज़रूरत है। 



😍😍😍😍

बुधवार, 10 अगस्त 2022

लड़के हो तुम



पीड़ा कितनी भी बढ़ जाए

नीर नयन से बाहर आयें

लेकिन तुम्हें कसम है तुम चिल्लाना मत

लड़के हो तुम रो रो अश्रु बहाना मत।। 



झिड़ में रहना इड़ में रहना ,सीधेपन से चिढ़ में रहना

तड़क भड़क रंगीन मिजाज़ी लेकर इगो इड में रहना

सबको ज़ीरो सदा समझना

खुद को हीरो मान गरजना

घर भर फैला भी हो तो तुम, उसको फ़िर सरियाना मत


लड़के हो तुम रो रो अश्रु बहाना मत।। 


भावनओं की गंगा को तुम कभी न बाहर आने देना

इमली, अमरक और बताशे ख़ुद को कभी न खाने देना

अपने मन की ही बस करना

दूजों का मन कभी न धरना

और अगर ना मन की हो तो छिप कर भी पिपियाना मत


लड़के हो तुम रो रो अश्रु बहाना मत।।


बचपन से ही सिखलाया है, तुमको वीर शिरोमणि बनना

चाहे कैसी भी स्थिति हो, झुकना मत तुम केवल तनना

झुक जाना ही कमज़ोरी है, 

लड़ने में कैसी चोरी है

चाहे कैसी भी स्थिति हो लेकिन तुम रिरियाना मत


लड़के हो तुम रो रो अश्रु बहाना मत।। 


शनिवार, 6 अगस्त 2022

एक मुक्तक

 



शिराएं हैं सभी निष्प्राण, स्पंदन नहीं होता, 

विकल होता है मन लेकिन कभी क्रंदन नहीं होता, 

मैं जुड़ जाती हूँ लिख कर भाव के पर्याय सब उसको

मग़र वो दे सदा उत्तर, कभी बंधन नहीं होता।।। 



शुक्रवार, 5 अगस्त 2022




जन्म लेने के लिए सबसे ज़रूरी ये है, 

खत्म पूरी तरह से पहले हुआ तो जाए... 

वो जो है ग़ैर का अपना भी बनेगा एक दिन

जिस्म की जगह मगर दिल को छुआ तो जाए


गुरुवार, 4 अगस्त 2022

बस यूँ ही




 गुड मॉर्निंग के उत्तर में जो गुड मॉर्निंग भी ना बोले

उससे दूर ज़रा रहिये जो राज़ हृदय के ना खोले


चाहे चखने में कितना भी मीठा हो वो फल लेकिन

उससे अच्छे इमली अमरक जो यादों के रस घोले


भावनाओं को करो समर्पित लेकिन बस उस मंदिर में

केवट शबरी और अहिल्या जिसके आँगन में डोले


जो अपनी ही हाँक रहें हों, उनसे रहना दूरी पर

उनसे तो बेहतर वो इंसा जो रहते है अनबोले


सुनना है तो सिर्फ सुना कर तू अपने दिल की आवाज़

काहे बेमतलब की बातों से भरता मन के झोले


जिसे चांद महबूब लगा हो, पाखंडी हो सकता है

मामा और रोटी जो देखे, वो सारे मन से भोले


एक ही पल में मन तेरा बिल्कुल हल्का हो जायेगा

बच्चों की तरह या तो हँस या उनकी तरह रो ले


लुका छिपी का खेल खेलते हैं जो रिश्ते नातों में

तू भी टीप मार दे छिप कर, उनकी तरह का हो ले


जब तकलीफ़ बढ़े हद से तो बस तू एक दवाई ले

ताक पे रख दे सारी दुनिया और ज़रा सा तू सो ले


तुझको भी संतुष्टि मिलेगी, जब तू बढ़ता देखेगा

अपने आँगन में फूलों वाला एक पौधा गर बो ले


कभी किसी का होना चाहे कभी किसी से भाग रहा

गर पाना है ईश्वर को तो, केवल तू अपना हो ले


गज़ल समझ कर मत पढ़ना तुम मेरे इन अशआरों को

मैंने तो बस भाव लिखें हैं, तू भी इनके संग हो ले

मंगलवार, 2 अगस्त 2022

शज़र पीला, हुआ है क्या



नदी काली, जमीं नीली, शज़र पीला, हुआ है क्या

बिना रोए कभी तकिया कहो गीला हुआ है क्या


हमारी आँख में आँसू की जगह खून दिखता है

बताओ हादसा जीवन में कुछ ऐसा हुआ है क्या?? 


किशन ने खुद ही अपनी बाँसुरी राधा को दे दी है

किसी की बात का उन पर असर इतना हुआ है क्या?? 


लुटा बैठा है खुद ही लूटने वाला अजब ही है

ज़माने का चलन फिर आज कल उल्टा हुआ है क्या?? 


नदी ने आज पूछा है समन्दर से न जाने क्यों

मिलन भर से,ज़रा सा ही, वो कुछ मीठा हुआ है क्या?? 


रखा माँ बाप ने औलाद का जब नाम दीपक तो, 

उजाला घर के आँगन में कहो ज़्यादा हुआ है क्या?? 


तमन्ना रोज़ बढ़ती है मेरी नज़दीक आने की

जिसे सब इश्क़ कहते हैं, मुझे वैसा हुआ है क्या?? 


यकीनन इल्म है उसको कि बस अब रुख़्सती ही है

इसी वजह से उसके दिल में एक धड़का हुआ है क्या?? 


स्वधा को फ़िर किसी ने राधिका कह कर पुकारा है

बड़े अचरज में है कलयुग में फ़िर कान्हा हुआ है क्या?? 

सोमवार, 1 अगस्त 2022

बिरहन रो रही है



मुसलसल तेज बारिश हो रही थी, 

कहीं पर कोई बिरहन रो रही थी.. 


पिया को ढूँढने की चाह में नित

वो पगली ख़ुद को ख़ुद ही खो रही थी.. 


जिसे मारा था उसके हमनशीं ने

वो अपनी लाश ख़ुद ही ढो रही थी.... 


जिसे तुम पूछते हो क्या हुआ था

वो चोरी के समय पर सो रही थी.... 


बचाने के लिए अपनों का दामन

स्वधा फ़िर दाग़ उनके धो रही थी...