मम अंतर्नाद

मम अंतर्नाद
मेरा एकल ग़ज़ल संग्रह

शुक्रवार, 15 दिसंबर 2023

भोली थी वो लड़की जिसने


इक शायर का लिखा हुआ पढ़

अपना सब कुछ वार दिया था 

भोली थी वो लड़की जिसने

इक शायर से प्यार किया था............


पहले पहल शेर पढ़ कर जब

उसके दिल ने शोर किया था

एक झलक भर पा लेने का

हर प्रयत्न पुरज़ोर किया था

नंबर ढूँढा और मिला कर, अधरों को हर बार सिया था 


भोली थी वो लड़की जिसने

इक शायर से प्यार किया था............


कोई बहाना तो चहिये था

जिससे उस तक वो जा पाती

उसके जैसा बन जाना था

शायद तभी उसे वो भाती

अपने सब रंग त्याग दिए थे, उसका हर रंग धार लिया था


भोली थी वो लड़की जिसने

इक शायर से प्यार किया था............


गीतों की गंगा ने अपना

रस्ता बदला मंज़िल बदली

ग़ज़ल बन सके इसकी ख़ातिर

त्यागी सब तासीरें असली

उसने अपना सत्य समूचा पूर्णतया ही हार दिया था


भोली थी वो लड़की जिसने

इक शायर से प्यार किया था............


शायर था वो उसे प्रेरणा

उस पगली से कब तक मिलती

कब तक उसके मन की कलिका 

उसको देख देख कर खिलती 

चंद शेर कुछ नज़्में लिख, शायर ने उसे बिसार दिया था 


भोली थी वो लड़की जिसने

इक शायर से प्यार किया था............


सदा असंभव रहा शाख से

गिर कर पुनः वहाँ जुड़ पाना

अपने गुण धर्मों को तज कर

भला किसे कब मिला ख़ज़ाना

सदा डूबता दिखा वही जिसने खर को पतवार किया था 


भोली थी वो लड़की जिसने

इक शायर से प्यार किया था...........

शनिवार, 12 अगस्त 2023

रे मन नई दिशा में दौड़




रे मन नई दिशा में दौड़

पुराने सारे रस्ते छोड़..


काहे अब तक लेकर बैठा

है तू कष्ट पुराने

बढ़ा रहा है दुःख की गठरी

जाने और अजाने

नदिया की ही भांति राह के 

पत्थर से मुंह मोड़


रे मन नई दिशा में दौड़

पुराने सारे रस्ते छोड़..........


युद्ध क्षेत्र में आया है तो

युद्ध तुझे करना है

मन को विकल नहीं करना 

नित ऊर्जा से भरना है

चाहे कैसी स्थितियां हों

मत बनना रणछोड़


रे मन नई दिशा में दौड़

पुराने सारे रस्ते छोड़..........


नियति और प्रारब्ध सत्य पर

कर्म प्रधान रहा है

गीता में देवेश्वर ने यह 

लाखों बार कहा है

कर्म मार्ग पर चल यदि तुझको

बनना है बेजोड़


रे मन नई दिशा में दौड़

पुराने सारे रस्ते छोड़..........


शुक्रवार, 14 जुलाई 2023

भरम यह छोड़ दे छोटे सितारे⭐

 

बड़े लोगों ने यह तय कर लिया है,

बड़े लोगों को ही वह मान देंगे,

मगर छोटे लगे हैं उनके पीछे,

इस आशा में कि वे पहचान देंगे.....

भरम यह छोड़ दे छोटे सितारे⭐

तुझे ये अपना आसमान देंगे........


बहुत डर में हैं अब अस्तित्व इनके

बचाना ये स्वयं को चाहते हैं

मगर गिरते हुए ये पेड़ अक्सर

नए पौधों पे मिट्टी डालते हैं

जो खुद ही दर्द में डूबे हुए हैं

वो तुझको किस तरह दिरमान देंगे


भरम यह छोड़ दे छोटे सितारे⭐

तुझे ये अपना आसमान देंगे........


है कस्तूरी तुम्हारी नाभि में ख़ुद

क्यों उसको ख़ुद से बाहर ढूंढता है

महक अपनी बढ़ाने के लिए तू

किसी की चरण रज क्यों चूमता है

जो तुझको ही गिराना चाहते हैं

भला क्यों वे तुझे सम्मान देंगे


भरम यह छोड़ दे छोटे सितारे⭐

तुझे ये अपना आसमान देंगे........


विखंडन संलयन खुद में बढ़ा दे

तू तप कर सूर्य खुद बन कर दिखा दे

किसी से मांग कर पहचान अपनी

न खुद को अपनी नजरों में गिरा दे

तुझे अपने हवन का फल भला क्यों

ये कलयुग के युगी यजमान देंगे


भरम यह छोड़ दे छोटे सितारे⭐

तुझे ये अपना आसमान देंगे........



गुरुवार, 6 जुलाई 2023

जब समझ आ जाए अच्छा......

 🙋🙋🙋🙋🙋🙋🙋🙋


देर से आए या जल्दी 

जब समझ आ जाए अच्छा......


भाव की गंगा में गोते हो लगाते, तो लगाओ

किंतु यह भी देख लेना , खुद को ही मत भूल जाओ

जो तुम्हारे बन तुम्हें जीवन कि राहों पर मिलेंगे

वो ही तुमको छोड़ देंगे वो ही इक दिन फिर छलेंगे

सत्य यह तुम हो अकेले जब समझ आ जाए अच्छा


देर से आए या जल्दी 

जब समझ आ जाए अच्छा......


तुम हंसोंगे जब तलक यह सृष्टि सारी साथ होगी

यंत्रणाओं के भंवर में बस विविक्ता साथ होगी

साथ है संसार लेकिन, कब तलक यह साथ होगा

कब तलक इन प्रिय जनों का हाथ तेरे हाथ होगा

एक दिन सब छूट जाना जब समझ आ जाए अच्छा 


देर से आए या जल्दी 

जब समझ आ जाए अच्छा......


तुम वृहद होना विचारों से , नहीं संक्षिप्त होना

एक साधक की तरह सब देखना मत लिप्त होना

जो तुम्हारा है तुम्हारे आप में ही आप्त है वह

जन्म से है साथ तेरे , मोक्ष तक भी प्राप्त है वह 

नाव की पतवार है वह जब समझ आ जाए अच्छा


देर से आए या जल्दी 

जब समझ आ जाए अच्छा......


🙋🙋🙋🙋🙋🙋🙋🙋



शुक्रवार, 30 जून 2023

बदली दिशा मगर रहा, लक्ष्य सदा शिव धाम

नीलकंठ बन कर लिया, उपेक्षाओं को थाम,

उपेक्षाओं को थाम, सदा ही हम मुस्काए,

लिखा भाग्य में जिसके जो वह वो ही पाए

मिला सदा सूखापन, कभी भी मिली न बदली

मगर राह पर चली, उसी के दिशा न बदली।।


गुरुवार, 29 जून 2023

निर्बांध चलना चाहती हूं.


तुम चलो धारा में 

मैं निर्बांध चलना चाहती हूं.....


किस तरह बंधन भला स्वीकार लूं

तुम ही बताओ

रोक कर द्रुत लय मेरी तुम मत मुझे 

प्रियतम सताओ

तुम रहो स्थूल दृढ़ 

मैं किंतु गलना चाहती हूं


तुम चलो धारा में 

मैं निर्बांध चलना चाहती हूं.....


क्या मिलेगा ठोस होकर

नित्य ही मैं सोचती हूं

अपने हिस्से के सितारे 

खुद उचक कर नोचती हूं

मैं प्रकृति की भांति नित नव 

रूप ढलना चाहती हूं


तुम चलो धारा में 

मैं निर्बांध चलना चाहती हूं.....


ऊसरों में बीज बोकर मैं उन्हें नित 

तक रही हूं

जलरहित आकाश है, फिर भी नहीं

मैं थक रही हूं

प्रेम का परिजात हूं मैं

सिर्फ फलना चाहती हूं


तुम चलो धारा में 

मैं निर्बांध चलना चाहती हूं.....

बुधवार, 28 जून 2023

लगावट है बनावट है दिखावट पर दिखावट है

ये रिश्ते आज कल केवल रुकावट हैं मिलावट है

वो उनके साथ फ़ोटो में बड़े इंसान लगते हैं

बस इतनी बात के कारण ही रिश्तों में कसावट है।

शुक्रवार, 23 जून 2023

मेरे पास नहीं आए हो



प्रेम बढ़ाने की खातिर मैं

जतन सभी कर आई थी पर

सोच रहीं हूं क्यों अब तक तुम मेरे पास नहीं आए हो।।


याद तुम्हें होगा पत्रों में 

कितने भाव किए थे प्रेषित

आंखों में आंसू थे लेकिन 

मुस्कानों से थे आश्लेषित

बहुत कठिन था सत्य समझना, 

क्यों हमको इतना भाए हो


सोच रहीं हूं क्यों अब तक तुम मेरे पास नहीं आए हो।।


प्रेम बढ़ेगा जूठा खाकर

दादी से सुन कर जाना था

तेरी थाली से एक कौरा 

इसीलिए मुझको खाना था

एक कौर का असर अभी तक 

तुम मेरे मन पर छाए हो


सोच रहीं हूं क्यों अब तक तुम मेरे पास नहीं आए हो।।


एक तुम्हें पाने की खातिर

मंदिर मस्ज़िद माथा टेका

गुरुद्वारे में सबद सुन लिए

मन मयूर भी कितना केका

किंतु मेरे उपवासों का फल 

तुम अब तक क्यों नहीं लाए हो


सोच रहीं हूं क्यों अब तक तुम मेरे पास नहीं आए हो।।


भूल गई थी केवल मैने

पत्रों में मनुहार किया था

जूठा भी मैने खाया था

मैने ही बस प्यार किया था

तुम तो इन राहों पर बढ़ने में 

हर दम ही अलसाए हो


सोच रहीं हूं क्यों अब तक तुम मेरे पास नहीं आए हो।



शुक्रवार, 14 अप्रैल 2023

अमर बेलें


पूरा पूरा विटप खा गईं, 

उन पर चढ़ी अमर बेलें।।


परजीवी संस्कृतियों ने ही

जीवन का संहार किया

जिस थाली में जा कर बैठीं

उसमें छेद हज़ार किया

अपना कह कर भावनाओं से

अक्सर ही अपने खेलें


पूरा पूरा विटप खा गईं, 

उन पर चढ़ी अमर बेलें।।


जिसने सदा संभाला सब कुछ

उस पर ही आरोप लगे

जिसने खुला कपाट रखा

वे सज्जन ही फिर गए ठगे

जो मानवता को अपनाते

वो ही मानव को झेलें


पूरा पूरा विटप खा गईं, 

उन पर चढ़ी अमर बेलें।।


जब भी अपने आंगन में

कोई नव बेल लगानी हो

देख लीजिए इतना उसकी

आंखों में भी पानी हो

वरना नव आगंतुक देते

कष्टों के शाश्वत मेले


पूरा पूरा विटप खा गईं, 

उन पर चढ़ी अमर बेलें।।




गुरुवार, 13 अप्रैल 2023

मैं सबके हित प्रीत लिखूंगी........


   


नहीं लिखूंगी प्रलय कभी भी, 

सृष्टि रचे वह रीत लिखूंगी

कवियों वाले कुनबे की हूं

मैं सबके हित प्रीत लिखूंगी.........


मेरे गीतों में मंदिर की आरतियों वाले स्वर होंगे

मेरे मुक्तक रस छंदों के अलंकरण वाले घर होंगे

मेरे दोहे फिर कबीर की स्मृतियों में ले जाएंगे

सदा प्रसन्न रहेंगे जो भी गीत मेरे निस दिन गायेंगे

जिससे सबका भला सदा हो मैं वो मंगल गीत लिखूंगी।।


कवियों वाले कुनबे की हूं

मैं सबके हित प्रीत लिखूंगी.........


वर्तमान की दुहिता हूं मैं इसके प्रति दायित्व मेरा है

जो भविष्य में होने वाला,जाने कैसा वो चेहरा है

प्रगति लिखूंगी, प्यार लिखूंगी, राग और अनुराग लिखूंगी

सुख के दुख के, योग वियोग भरे कितने ही फाग लिखूंगी

आज सुधार अपेक्षित है जब,मैं क्यों भला अतीत लिखूंगी


कवियों वाले कुनबे की हूं

मैं सबके हित प्रीत लिखूंगी.........


सिर्फ विसंगतियां लिख कर मैं जग को कोई चोट न दूंगी

समाधान भी लिखूंगी मैं, समस्याओं की ओट न दूंगी

बैरागन की पीर लिखी यदि, मन का संगम भी लिखूंगी,

केवल ताल नहीं लिखूंगी, संग में सरगम भी लिखूंगी

द्रुत लिखा यदि तो मध्यम लय

वाला भी संगीत लिखूंगी।।


कवियों वाले कुनबे की हूं

मैं सबके हित प्रीत लिखूंगी.........


जैसे ही इक गीत लिखूंगी, मंच नया तैयार रहेगा

मेरा गीत सृष्टि का कण कण सुनने को तैयार रहेगा

इक कोशिकी जीव से लेकर बहुकोशिकी सभी सुन लेंगे

गीतों में जो सार लिखूंगी गीता सम सब ही गुन लेंगे

सत्य सार्थक और यथार्थ मैं

सदा शाश्वत जीत लिखूंगी


कवियों वाले कुनबे की हूं

मैं सबके हित प्रीत लिखूंगी.........


बुधवार, 12 अप्रैल 2023

एक गजब की लड़की है




मुझको अपना कहती है पर

सबको गले लगा लेती है

बड़ी गज़ब की लड़की है वो

सबसे प्रेम निभा लेती है............


सुबह प्रभाती गाते गाते , घर आंगन पर छा जाती है

अम्मा बाबा भाई, बहन , बच्चों के मन को भा जाती है

सबके सुख में मुस्काती है सबके दुःख में रो देती है

घर की खुशहाली की खातिर अक्सर खुद को खो देती है

किंतु पूछ लो, तुम कैसी हो, तो हर कष्ट छिपा लेती है


बड़ी गज़ब की लड़की है वो

सबसे प्रेम निभा लेती है............


मेरे मित्र नहीं अब मेरे , उसके देवर बन इतराते

भाभी आज बनाया है क्या पूछ पूछ कर खाने आते

घर की बाई से लेकर ऑफिस के चपरासी की मां है

जो मेरे बच्चों की खातिर दोस्त और भोली अम्मा है

खुद कितनी भी थकी भले हो, बच्चों को दुलरा लेती है


बड़ी गज़ब की लड़की है वो

सबसे प्रेम निभा लेती है............


अपने सब रहस्य लेकर सब उसके पास चले आते हैं

और जगत भर में जाने क्यों सब उसके ही गुण गाते हैं

मेरा भाई भाई है उसका, मेरी बहन बहन है उसकी

वो बिल्कुल वैसी है जैसे भारीपन में चाय की चुस्की

मेरे सुख दुःख दर्द और कमियां सारी अपना लेती है


बड़ी गज़ब की लड़की है वो

सबसे प्रेम निभा लेती है............


कभी नहीं मांगती स्वयं के हेतु मंदिरों में वह जाकर

खुश हो जाती मां की साड़ी, बाबा के जूते संभाल कर

मेरा सब कुछ अब उसका है, किंतु समर्पित वह रहती है 

सबकी खातिर लड़ जाती है अपनी खातिर चुप रहती है

जाने किस मिट्टी की है वो पीड़ा में मुस्का लेती है


बड़ी गज़ब की लड़की है वो

सबसे प्रेम निभा लेती है............


सातों वचन निभाए उसने, बिना अपेक्षा मन में पाले

सुख में साथ चली मेरे और कष्टों में थी मुझे संभाले

आंगन गलियारा रसोई सब अपने रंग में रंग डाले हैं

भले काम में रत हो किंतु मिलन के स्वप्न नयन पाले है

सोता देख मुझे थक कर वो, सारे दीप बुझा लेती है


बड़ी गज़ब की लड़की है वो

सबसे प्रेम निभा लेती है............



मंगलवार, 11 अप्रैल 2023

सब अनूदित लग रहा है......




कह रहे हैं लोग कुछ मौलिक सुनाओ

और मुझको सब अनूदित लग रहा है......


भावनाओं के सभी अंकुर खिलेंगे एक जैसे

प्रेम को जो भी लिखेंगे वे लिखेंगे प्रेम जैसे

क्या कोई नव बीज कोई बाग में फिर बो सकेगा

यदि लिखूंगी कुछ नया तो क्या नया वह हो सकेगा,

लोग कहते हैं मैं अपनी मूल ध्वनि उनको सुनाऊं 

पर मुझे सब प्रतिध्वनित सा लग रहा है


कह रहे हैं लोग कुछ मौलिक सुनाओ

और मुझको सब अनूदित लग रहा है......


राम लिखूं काव्य में तो याद तुलसी आ रहे हैं

कृष्ण लिखूं तो हृदय में सूर, कान्हा गा रहे हैं

दर्शनों में यदि कभी भी गीत मेरे डूबते हैं

श्लोक गीता में लिखे जो वो हृदय में गूंजते हैं

लोग कहते वेद में जो मंत्र हैं वो हैं अजन्मे

पर मुझे यह अनपेक्षित लग रहा है


कह रहे हैं लोग कुछ मौलिक सुनाओ

और मुझको सब अनूदित लग रहा है......


बंद करके जब नयन , अंतस की आभा गह सकेंगे

सब स्वयं से है, स्वयं में हैं सदा यह कह सकेंगे

कुछ नहीं मौलिक सभी कुछ पूर्व में भी हो चुका है

ये समय है जो निरंतर चल रहा है , कब रुका है

लोग जिसको आज कहते हैं किसी प्राचीन क्षण का

एक अनुभव अग्रसारित लग रहा है


कह रहे हैं लोग कुछ मौलिक सुनाओ

और मुझको सब अनूदित लग रहा है......





रविवार, 19 मार्च 2023

गुड़िया ले लो बोले.......


केसरिया परिधान पहन कर

हरी ओढ़नी ओढ़े

मन सफेद कर बुढ़िया माई

गुड़िया ले लो बोले.......


रंग बिरंगी हर इक गुड़िया,है बिल्कुल अनमोल

कम ही दाम लगाए मैने,आओ ले लो मोल

चूल्हा जला छोड़ कर आई हूं, सुन लो तुम क्रेता

मजबूरी में बेचूं गुड़िया, बन कर मैं विक्रेता

जाने आज बिकेगी कोई या फिर कहना होगा

बिटिया मैं फिर नहीं ला सकी

तेरी खातिर होले


मन सफेद कर बुढ़िया माई

गुड़िया ले लो बोले.......


जब भी गुड़िया नई बनाई, बिटिया ने शृंगार किया,

भिन्न भिन्न रूपों में ढाला सुंदर सुंदर नाम दिया,

एक को बड़ी बहन कहती है, एक को छुटकी कहती है

मेरी बिटिया की मुस्काने इन गुड़ियों में रहती है

जल्दी जल्दी बेच इन्हें घर मुझको जाना होगा

घर पर मेरी गुड़िया 

बैठी है दरवाज़ा खोले


मन सफेद कर बुढ़िया माई

गुड़िया ले लो बोले.......


जान रही हूं इन्हें बेच,तन ही जिंदा रख पाऊंगी

मन से टूटेगी गुड़िया, जब गुड़िया बिन घर जाऊंगी

रो रो कर पूछेगी मुझसे कहां गई है मीना दीदी

और कहां तुम छोड़ आई हो, मेरी प्यारी सोना सीधी

उत्तर नहीं पास है मेरे क्या उसको बतलाऊंगी 

लेकर बैठी है बिटिया

प्रश्नों से भर कर झोले


मन सफेद कर बुढ़िया माई

गुड़िया ले लो बोले.......



सोमवार, 20 फ़रवरी 2023

बिल्ली की तो यही प्रकृति है

 



उस बिल्ली को जिस बंदर से 

जितना अधिक रहा है मतलब

उस बंदर के सम्मुख बिल्ली 

उतना रम कर नाचा करती

बिल्ली  की तो यही प्रकृति है

अपना हित ही बांचा करती।।


बंदर सब भोले भाले हैं

रोटी की खातिर लड़ जाते

शातिर बिल्ली देख रही है

नादां ये भी समझ न पाते

बांट बराबर कर पड़ले का

न्याय दिला देगी दोनों को

ऐसा कह कर मौसी बिल्ली

बंदर के संग झांसा करती


बिल्ली  की तो यही प्रकृति है

अपना हित ही बांचा करती।।


जो जितना झांसे में आया

उतना रक्त दान कर आया

कोई धन से लुटा खूब

अरु कोई तन मन तक दे आया

गले लगाती है जग भर को

लेकिन अंतस अभिशापित है

इसीलिए अपनत्व दिखा कर

बिल्ली "सबको" काटा करती


बिल्ली  की तो यही प्रकृति है

अपना हित ही बांचा करती।।


बड़ी बड़ी बातों के पीछे

छिछले छिछले कर्म किए हैं

धर्म धर्म की माला जप कर

उसने सभी अधर्म किए हैं

मीठा बोल घोलती है विष 

उसकी प्रकृति सदा से ऐसी

रिश्ते नाते और मित्रता

सबमें स्वार्थ तलाशा करती,


बिल्ली  की तो यही प्रकृति है

अपना हित ही बांचा करती।।


जब तक रोटी नहीं मिली वो

तब तक बंदर की मौसी थी

मिला नहीं यदि लक्ष्य उसे तो

पगली होती मुंह झौँसी थी

अपना अपना राग अलापे

उसे नहीं थी फिक्र किसी की

बस अपना हित पूरा होते 

वो जग भर को टाटा करती


बिल्ली  की तो यही प्रकृति है

अपना हित ही बांचा करती।।


सभी बंदरों को सलाह है

अपने मन की आंखे खोलो

बिल्ली जो कुछ भी कहती है

करने से पहले तुम तौलो

उसके जैसी प्रकृति सुनो तुम

कभी नहीं अपनाना क्योंकि 

बिल्ली तो अपना थूका ही

अक्सर वापस चाटा करती


बिल्ली  की तो यही प्रकृति है

अपना हित ही बांचा करती।।



मंगलवार, 17 जनवरी 2023

मां कैकेयी दुःखी न होना





गर्व करेंगे मैया इक दिन सब तेरी कुर्बानी पर 

मां कैकेयी दुःखी न होना तुम जग की नादानी पर।।


तुमने राम अनुग्रह सुन कर

अपने पर अभियोग लिया

पुत्र पति परजा सब ही का

जीवन भर प्रतियोग लिया


सब कुछ खोकर प्रश्न न पूछा क्यों प्रभु की मनमानी पर 

मां कैकेयी दुःखी न होना तुम जग की नादानी पर।।


जग बस उतना ही पढ़ पाया 

जितनी उनकी क्षमता थी,

उन्हें दिखा बस कोप भवन

पर दिखी न तेरी ममता थी


तुझ पर यूं आरोप लगाते स्वेद न था पेशानी पर 

मां कैकेयी दुःखी न होना तुम जग की नादानी पर।।


मानस के नित पाठ किए पर

मानस को सुन पाए नहीं

राम रचयिता हैं रचना के 

सत्य कभी गुन पाए नहीं 


सब आए किरदार निभाने, निर्देशक की बानी पर

मां कैकेयी दुःखी न होना तुम जग की नादानी पर।।


शुक्रवार, 6 जनवरी 2023

भाया वो पटवारी



बंदर ने केला मिलते ही नई गुलाटी मारी,

जिससे चिढ़ता था वो, उसको भाया वो पटवारी.......


चिल्ला चिल्ला कर खुद को सच्चा बतलाया करता

शेष नहीं सिद्धांत, यही इक, गाना गाया करता

राजभवन से एक निमंत्रण पत्र उसे क्या आया

उसके सर पर भी चढ़ बैठी सुन्दर ठगनी माया

जिसका प्रण था जग सुधार वो बन बैठा अभिचारी


बंदर ने केला मिलते ही नई गुलाटी मारी,

जिससे चिढ़ता था वो, उसको भाया वो पटवारी.......


अब बंदर पटवारी के संग, सब कुछ बांट रहा है

उसको दे कर उसका हिस्सा,अपना छांट रहा है

जैसी संगत वैसे ही गुण धर्म बदल जाते हैं

खरबूजे को देख सदा खरबूजे इतराते हैं

सोने में हो गई मिलावट, अब किसकी है बारी


बंदर ने केला मिलते ही नई गुलाटी मारी,

जिससे चिढ़ता था वो, उसको भाया वो पटवारी.......


भूख खत्म होते बानर ने नए राग हैं छेड़े

अब तो उसको भी भाते हैं रस्ते टेढ़े मेढे

सत्य प्रभावी था तब तक, तब तक सिद्धांत कड़े थे

जब तक बानर राज डाल से नीचे कहीं खड़े थे

बस कुनबे का एक निमंत्रण , बन बैठे व्यभिचारी


बंदर ने केला मिलते ही नई गुलाटी मारी,

जिससे चिढ़ता था वो, उसको भाया वो पटवारी.......


जो भी हैं मतलबपरस्त उनके अदभुद हैं रंग 

एक लिफ़ाफा चंद तालियां बदल रही सब ढंग

जिनसे मतलब उनके आगे बीन बजाते घूमें 

कल तक मल कहते थे जिनको, उनका माथा चूमे

अब तुम ही देखो इस जग का क्या होगा बनवारी......


बंदर ने केला मिलते ही नई गुलाटी मारी,

जिससे चिढ़ता था वो, उसको भाया वो पटवारी.......


सोमवार, 2 जनवरी 2023

सत्य कथाएं कितनी बार




झूठे लोगों ने लिखी है

सत्य कथाएं कितनी बार।।


सत्य यही है जो बिनते हैं

हर पल ही असत्य के धागे

वही बढ़े है लिए सफलता

कर्म मार्ग पर आगे आगे

झूठे प्रेमी को मिलता है 

इस जग में बस सच्चा प्यार


झूठे लोगों ने लिखी है

सत्य कथाएं कितनी बार।।


जिसने किए कुकर्म उसे

इस जग ने शीश बिठाए रक्खा

जिसके पास भरी थी माया 

कंधों उसे उठाए रक्खा

इससे ज्ञात हुआ अधमी के

अवगुण भी जग को स्वीकार


झूठे लोगों ने लिखी है

सत्य कथाएं कितनी बार।।


नंगे बदन घूमता जो ऋषि

उस पर आरोपों का जाल

सत्य बोलने वालों की ही

खिंच जाती है अक्सर खाल

शायद इसीलिए इस  युग में

राम कृष्ण की होती हार


झूठे लोगों ने लिखी है

सत्य कथाएं कितनी बार।।