मम अंतर्नाद

मम अंतर्नाद
मेरा एकल ग़ज़ल संग्रह

सोमवार, 1 दिसंबर 2025

सब्जी वाला



आलू परवल भिंडी लेलो, लेलो कद्दू लम्बा वाला,

एक अजब से सुर में गाता नित आता है सब्जी वाला.....


बारह सुर से भिन्न स्वरों में अपनी सब्जी बेच रहा है

भरे हुए अपने ठेले को मुस्का करके खेंच रहा है

भाभी काकी, नानी दादी को भाता है ये मतवाला

एक अजब से सुर में गाता नित आता है सब्जी वाला.....


बाँट रहा है हर घर में वो पोषक तत्वों वाला सागर

उसकी थाली में मिलता है केवल मोटा वाला चावल

रूखी सूखी रोटी खा कर, बाँट रहा है स्वस्थ निवाला

एक अजब से सुर में गाता नित आता है सब्जी वाला.....


जाड़ा गर्मी बारिश सह कर सब के घर पहुंचाता सब्जी

उससे ही लेनी तरकारी लगा रहा है हर घर अर्जी

फ्री में मिर्चा धनिया देता देखो कितना है दिलवाला

एक अजब से सुर में गाता नित आता है सब्जी वाला.....


पानी के छीटे दे दे कर, हरा साग ताज़ा रखता है

पूरे दिन ठेला ले घूमे फिर भी कहता "ना थकता है"

घर भर को खुशियाँ देता है, वो मेहनत का ओढ़ दुशाला

एक अजब से सुर में गाता नित आता है सब्जी वाला.....


ज़रा प्यार से बस पूछा था भैया पानी पीना है क्या?

आँखें छलक आयीं थी उसकी, बोला ये भी जीना है क्या

तनिक प्रेम से बह आयी थी, आँखों से अंतर की ज्वाला

एक अजब से सुर में गाता नित आता है सब्जी वाला.....



स्वधा रविंद्र उत्कर्षिता


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रविवार, 19 अक्टूबर 2025

दोहे


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तुम तुम हो मैं मैं रहूं, ये थी कल की बात

प्रेम चांदनी में लिपट, एक हुए मन गात।


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सोच समझ सब ख़त्म हो, जब हो मिलन विधान

प्रकृति पुरुष के साथ से , ही होता कल्यान।


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सर पर मटकी प्रेम की, भर निकली ब्रज नार

गोकुल से फिर श्याम ने, खींच लिए सब भार।।


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जड़ता की चादर लिए, सोया रहा फ़कीर

जो मलंग था प्रेम में, वो बन गया कबीर।


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शनिवार, 18 अक्टूबर 2025

आँगन का सूनापन



मन की चिमनी से उठता है क्यों कर आज धुँआ
शायद सुलग रहा है मन के भीतर छुपा सुआ......

आँगन का सूनापन मन को नित ही छलता है
पनघट पर कान्हा के बिन तन मेरा जलता है
बिना कंत के ह्रदय रुग्ण करुणामय लगता है
सृष्टि बसा हर जीव मुझे आ आ कर ठगता है
लावे सा जलता है मन कोई दो हमें दुआ

मन की चिमनी से उठता है क्यों कर आज धुँआ
शायद सुलग रहा है मन के भीतर छुपा सुआ......

निर्जन वन की हिरणी जैसी भटकी मैं दिन रात
नीरवता में दिन बीते और ठगिनी सी थी रात
अपनेपन का स्वप्न दिखाने जो अक्सर आता
हाथ पकड़ लेती उसका तो पल में उड़ जाता
दुर्भाग्यों के शूलों ने इस तरह मुझे छुआ

मन की चिमनी से उठता है क्यों कर आज धुँआ
शायद सुलग रहा है मन के भीतर छुपा सुआ......

जग को छोड़ निकलना होगा अब तो प्रभु की ओर
तभी मिलेगा शायद उर को सुख का अनुपम छोर
जब रिक्तता सुखद होगी, लोगों की भीड़ नहीं
तब देखोगे हिय के कोने, राघव बसें कहीं
जीवन के मरुथल में खोदो जाओ ज्ञान कुआँ

मन की चिमनी से उठता है क्यों कर आज धुँआ
शायद सुलग रहा है मन के भीतर छुपा सुआ......

चाहे राह कोई पकड़ो पर आँगन से छत तक
केवल रहे तुम्हारा मन प्रभु के चरणों में रत
स्वाँसे उसकी लय थामें, धड़कन उस चाल चले
जिन राहों पर सबके हित वाले हों पुष्प पले
हरि का नाम उच्चारण कर जीतोगे हर इक जुँआ

मन की चिमनी से उठता है क्यों कर आज धुँआ
शायद सुलग रहा है मन के भीतर छुपा सुआ......

बिलरिया मूषक खावे आई

 बिलरिया मूषक खावे आई

मंद मंद मुसकाई
बिलरिया मूषक खावे आई।
भोला मूषक समझ न पावे
बन विलाब की चाल
दौड़ावे मूषक का लेकिन
पकड़े न वो खाल
आगे आगे भागे इंदुर
सोच रहा कित जाई
बिलरिया मूषक खावे आई।
इत उत घूमे समझ न पावे
कैसे और कहां बच जावे
पूरब पच्छिम उत्तर दक्खिन
कितहूँ घूमे ठौर न पावे
देख कोठरी काल कराली
छुप के पैठ लगाई
बिलरिया मूषक खावे आई।
अंधियारे ने भय उपजाया
राम नाम मूषक ने गाया
तन मन भीति त्याग तब भागा
हृदय तार बलम संग लागा
भय भंजन की शरण पहुंच कर
मुसटा बिलरी खाई
बिलरिया मूषक खावे आई।
मगर न अंत मे वो बच पाई
बिलरिया मूषक पेट समाई
बिलरिया फिर न पलट कर आई
बिलरिया अंत बहुत पछताई।

 वो लिखेंगे समझ जो आ जाये

वो लिखेंगे जो जग को भा जाए
हम बनेंगे जो जन्म देता है,
वो नहीं जो किसी को खा जाए।

देखा है गया

नित नई ढपली नया इक ताल देखा है गया

शाश्वत चीज़ों के सर पर काल देखा है गया।

जिसको पूरी जिंदगी सबने कहा ईमानदार
उसके घर में दूसरों का माल देखा है गया।।
हँस रही थी खिलखिला कर जो कली उस बाग में
उस कली का हाल फिर बेहाल देखा है गया।।
बाँटता जो घूमता सर्टिफिकेट चारित्र्य के
एक रक्कासा के संग फिलहाल देखा है गया।।
ले गए थे वे अनाथालय से कह जिसको परी
उसको उसके घर में ही बदहाल देखा है गया।।
गा रहे हैं राम को कविताई में जो आज कल
संस्कारों से उन्हें कंगाल देखा है गया।।
मंच पर बैठी हैं जो कविताएँ पढ़ने के लिए
अपनी भाषा में उन्हें तंग हाल देखा है गया।।
जो स्वधा कल तक बताती थी बचें सब प्यार से
उसको शिव के प्रेम में खुशहाल देखा है गया।।

ख़ुश हो रहे हैं

 कौन कहता है, गिरह को, खोल कर ख़ुश हो रहे हैं

हम तो, "तुम मेरे हो केवल" बोल कर ख़ुश हो रहे हैं।

 पीड़ाओं को गाते गाते, नीर नयन तक आ पहुंचे हैं

अब मुस्कानों की भित्ति से इन्हें छिपाना मुश्किल होगा....
मुस्काते मुस्काते अब ये गीत सुनाना मुश्किल होगा......
तन को रेशम कर ढकती थी, मैं मन के पैबंद पुराने
सजा धजा कर के रखी थी अरमानों की लाश ठिकाने
कितने लेप लगा लूँ पर दुर्गन्ध छिपाना मुश्किल होगा
अब मुस्कानों की भित्ति से इन्हें छिपाना मुश्किल होगा....
मुस्काते मुस्काते अब ये गीत सुनाना मुश्किल होगा......
चौखट पर ठहरीं हैं मेरे कही अनकही चंद कथाएँ,
ह्रदय निरंतर सोच रहा है किसको मन के घाव दिखाएं
अब उर के इस सन्नाटे का दिल बहलाना मुश्किल होगा...
अब मुस्कानों की भित्ति से इन्हें छिपाना मुश्किल होगा....
मुस्काते मुस्काते अब ये गीत सुनाना मुश्किल होगा......
रातों की ठंडी चादर में लेकर बैठी रही दुआएं
सोच रही थी भीतर भीतर छूटे हुए लोग मिल जाएं
राख़ छिपे अंगारों पर अब नीर लुटाना मुश्किल होगा
अब मुस्कानों की भित्ति से इन्हें छिपाना मुश्किल होगा....
मुस्काते मुस्काते अब ये गीत सुनाना मुश्किल होगा......
जीवन के इस प्रश्नपत्र में उत्तर ग़लत लिखे सब मैंने
सोच रही हूँ क्यों नहिं सीखे दुनियादारी के ढब मैंने
चीख पुकार मचाते प्रश्नों को समझाना मुश्किल होगा
अब मुस्कानों की भित्ति से इन्हें छिपाना मुश्किल होगा....
मुस्काते मुस्काते अब ये गीत सुनाना मुश्किल होगा......

अम्मा ब्याह नहीं करना है


कारण एक नहीं है सौ हैं
मेरे इस निर्णय के पीछे
पर यह निश्चय है मेरा अब
अम्मा ब्याह नहीं करना है........
रधिया की हालत देखी थी, ब्याह बाद जब घर वो आई
तीन बरस में चार बाल बच्चों में, बचपन वो खो आई
हाथ खिलौने होने थे जब , तब वो बर्तन मांज रही थी
जब स्वप्नों की दुनिया तय थी, तब रातों को जाग रही थी
शिक्षा के प्रकाश को तज कर
जीवन स्याह नहीं करना है
अम्मा ब्याह नहीं करना है........
मुनिया जो पूरे समाज में सुंदरता की इक मिसाल थी
लाश मिली जब उस मुनिया की,जली कटी सी हाय खाल थी
उधड़ी काया के भीतर का, रोम रोम तक जला हुआ था,
अपनों के ही हाथों बेचारी का जीवन छला हुआ था
निर्विरोध हो जल जाऊं मैं
ऐसी चाह नहीं करना है
अम्मा ब्याह नहीं करना है........
सप्तपदी के साथ वचन क्यों किसी और के साथ निभाऊं
तुमने जन्म दिया है अम्मा, तुझ पर ही क्यों न मिट जाऊं
बाबा के सपने अपने कर, दूर गगन तक मैं उड़ जाऊं
जो भी दिया ईश ने , उसके लिए उन्हीं के गुण मैं गाऊँ
चंद नए रिश्तों में बंध
अनमन निर्वाह नहीं करना है
अम्मा ब्याह नहीं करना है........
जग हित की कामना संजो कर, आगे बढ़ना सहज सरल है
किंतु गलत रिश्ते पाने से, बेहतर मुझको आज गरल है
क्यों ढूंढूं इक राज कुंवर मैं, जब खुद रानी बन सकती हूं,
अपनी रक्षा हेतु स्वयं मैं, जब ऐशानी बन सकती हूं
जीवन के इस सरल मार्ग को
अब अवदाह नहीं करना है
अम्मा ब्याह नहीं करना है........

तब ही गीत हमारे गाएं


मन के घाव संजोये सारे
तब मेरी लेखनी लिख सकी, गीतों में बहते अंगारे
यूँ तो हैं ये अंगारे पर फिर भी ताप अगर हर पाएं
तब ही गीत हमारे गाएं
तब ही गीत हमारे गाएं।
जब सारा संसार रक्त की नदिया में डूबा जाता हो
तब हम मरहम बना रहे हों, जब जग पीड़ाएं गाता हो
यदि मेरे गीतों के दीपक अंधियारों में कर उजियारा
मृत आशाओं में फिर से कुछ शाश्वत प्राण बीज बो पाएं
तब ही गीत हमारे गाएं
तब ही गीत हमारे गाएं।
जग के हिस्से शूल न आएं, सो अनुभव सब लिख डाले
सबको सोमकलश देकर के, मैंने गरल पिए हैं काले
यदि मेरे गीतों के स्वर, ममता की लोरी बन करके
हौले हौले माथे पर जब इक स्नेहिल चुम्बन दे पाएं
तब ही गीत हमारे गाएं
तब ही गीत हमारे गाएं।
कितनी भी पीड़ा हो मन में अधरों पर मुस्कान सजाए
बन गीतों की राजकुमारी हमने गीत निरंतर गाए
पर तुम मेरे गीतों को अपने अधरों पर तब ही लाना
जब मेरे गीतों के स्वर से उत्सव उल्लासित हो पाएं
तब ही गीत हमारे गाएं
तब ही गीत हमारे गाएं।

गुरुवार, 19 जून 2025

नश्तरों की क्या ज़रूरत



 नश्तरों की क्या ज़रूरत जिनकी तगड़ी धार धार

आँख ही कर देती है कपड़े बदन के तार तार।।


ग़ैर के आगोश में जा कर मिलेगा क्या हमें
अब तो अपने ही लगाते ब्लेम हम पर बार बार।।

दौड़ में तो जीत जाते हम, भरोसा था हमें
भीड़ से अपनों ने चिल्लाया ओ धावक हार हार।।

जिनसे सच की थी उम्मीदें, झूठ वो कहते रहे
शर्म इतनी आई ख़ुद पर फ़िर हुए हम ज़ार ज़ार।।

अपनी थाली के निवाले में नमक कुछ कम लगा
दोस्त की थाली जो देखी मुँह में आई लार लार।।

खुशबुओं में मत उलझ तू, हैं कृत्रिम सब खुशबुएं
माँ ने बतलाया वही है शुद्ध जिसमें झार झार।।

क्या करेंगे अब बताओ हम भला इस देश का
उल्लुओं का आज डेरा हैं जहाँ पर डार डार।।

जब स्वधा ने कह दिया बस इश्क़ है मजहब मेरा
भीड़ ले तलवार बोली अब स्वधा को मार मार।।




स्वधा रविंद्र उत्कर्षिता

शुक्रवार, 1 मार्च 2024

मर जाने दे





जुनून ए इश्क़ मुझमें पूरा उतर जाने दे

मैं तेरे प्यार में मर जाऊँ तो मर जाने दे


ज़ख़्म मरहम के नहीं मुंतज़िर रहे मेरे

इनको तू अपनी छुअन भर से ही भर जाने दे।। 


तुम्हें फ़राग मुबारक मुझे ये बेसब्री

अब मेरी तिश्नगी को हद से गुज़र जाने दे।। 


तमाम उम्र जिन्हें हमने छिपा कर रखा, 

सामने आके तू वो दर्द उभर जाने दे।। 


तुझको गर देखना है कैसी हूँ तन्हाई में

फ़िर मुझे यार मेरे खुल के बिखर जाने दे।। 


मैं ख़ुद को ढूँढने में रस्ते से बे रस्ता हुआ

अब मेरे साथ है तू, अब तो सुधर जाने दे।। 


सासरे में हूँ, ये लगता है,देख कर दुनिया

अब तो मुझको तू वालिदैन के घर जाने दे।। 


ओ मेरे कृष्ण सर पे हाथ रख के आज ज़रा

इस स्वधा को भी तू राधा सा सँवर जाने दे।। 


शुक्रवार, 15 दिसंबर 2023

भोली थी वो लड़की जिसने


इक शायर का लिखा हुआ पढ़

अपना सब कुछ वार दिया था 

भोली थी वो लड़की जिसने

इक शायर से प्यार किया था............


पहले पहल शेर पढ़ कर जब

उसके दिल ने शोर किया था

एक झलक भर पा लेने का

हर प्रयत्न पुरज़ोर किया था

नंबर ढूँढा और मिला कर, अधरों को हर बार सिया था 


भोली थी वो लड़की जिसने

इक शायर से प्यार किया था............


कोई बहाना तो चहिये था

जिससे उस तक वो जा पाती

उसके जैसा बन जाना था

शायद तभी उसे वो भाती

अपने सब रंग त्याग दिए थे, उसका हर रंग धार लिया था


भोली थी वो लड़की जिसने

इक शायर से प्यार किया था............


गीतों की गंगा ने अपना

रस्ता बदला मंज़िल बदली

ग़ज़ल बन सके इसकी ख़ातिर

त्यागी सब तासीरें असली

उसने अपना सत्य समूचा पूर्णतया ही हार दिया था


भोली थी वो लड़की जिसने

इक शायर से प्यार किया था............


शायर था वो उसे प्रेरणा

उस पगली से कब तक मिलती

कब तक उसके मन की कलिका 

उसको देख देख कर खिलती 

चंद शेर कुछ नज़्में लिख, शायर ने उसे बिसार दिया था 


भोली थी वो लड़की जिसने

इक शायर से प्यार किया था............


सदा असंभव रहा शाख से

गिर कर पुनः वहाँ जुड़ पाना

अपने गुण धर्मों को तज कर

भला किसे कब मिला ख़ज़ाना

सदा डूबता दिखा वही जिसने खर को पतवार किया था 


भोली थी वो लड़की जिसने

इक शायर से प्यार किया था...........

शनिवार, 12 अगस्त 2023

रे मन नई दिशा में दौड़




रे मन नई दिशा में दौड़

पुराने सारे रस्ते छोड़..


काहे अब तक लेकर बैठा

है तू कष्ट पुराने

बढ़ा रहा है दुःख की गठरी

जाने और अजाने

नदिया की ही भांति राह के 

पत्थर से मुंह मोड़


रे मन नई दिशा में दौड़

पुराने सारे रस्ते छोड़..........


युद्ध क्षेत्र में आया है तो

युद्ध तुझे करना है

मन को विकल नहीं करना 

नित ऊर्जा से भरना है

चाहे कैसी स्थितियां हों

मत बनना रणछोड़


रे मन नई दिशा में दौड़

पुराने सारे रस्ते छोड़..........


नियति और प्रारब्ध सत्य पर

कर्म प्रधान रहा है

गीता में देवेश्वर ने यह 

लाखों बार कहा है

कर्म मार्ग पर चल यदि तुझको

बनना है बेजोड़


रे मन नई दिशा में दौड़

पुराने सारे रस्ते छोड़..........


शुक्रवार, 14 जुलाई 2023

भरम यह छोड़ दे छोटे सितारे⭐

 

बड़े लोगों ने यह तय कर लिया है,

बड़े लोगों को ही वह मान देंगे,

मगर छोटे लगे हैं उनके पीछे,

इस आशा में कि वे पहचान देंगे.....

भरम यह छोड़ दे छोटे सितारे⭐

तुझे ये अपना आसमान देंगे........


बहुत डर में हैं अब अस्तित्व इनके

बचाना ये स्वयं को चाहते हैं

मगर गिरते हुए ये पेड़ अक्सर

नए पौधों पे मिट्टी डालते हैं

जो खुद ही दर्द में डूबे हुए हैं

वो तुझको किस तरह दिरमान देंगे


भरम यह छोड़ दे छोटे सितारे⭐

तुझे ये अपना आसमान देंगे........


है कस्तूरी तुम्हारी नाभि में ख़ुद

क्यों उसको ख़ुद से बाहर ढूंढता है

महक अपनी बढ़ाने के लिए तू

किसी की चरण रज क्यों चूमता है

जो तुझको ही गिराना चाहते हैं

भला क्यों वे तुझे सम्मान देंगे


भरम यह छोड़ दे छोटे सितारे⭐

तुझे ये अपना आसमान देंगे........


विखंडन संलयन खुद में बढ़ा दे

तू तप कर सूर्य खुद बन कर दिखा दे

किसी से मांग कर पहचान अपनी

न खुद को अपनी नजरों में गिरा दे

तुझे अपने हवन का फल भला क्यों

ये कलयुग के युगी यजमान देंगे


भरम यह छोड़ दे छोटे सितारे⭐

तुझे ये अपना आसमान देंगे........



गुरुवार, 6 जुलाई 2023

जब समझ आ जाए अच्छा......

 🙋🙋🙋🙋🙋🙋🙋🙋


देर से आए या जल्दी 

जब समझ आ जाए अच्छा......


भाव की गंगा में गोते हो लगाते, तो लगाओ

किंतु यह भी देख लेना , खुद को ही मत भूल जाओ

जो तुम्हारे बन तुम्हें जीवन कि राहों पर मिलेंगे

वो ही तुमको छोड़ देंगे वो ही इक दिन फिर छलेंगे

सत्य यह तुम हो अकेले जब समझ आ जाए अच्छा


देर से आए या जल्दी 

जब समझ आ जाए अच्छा......


तुम हंसोंगे जब तलक यह सृष्टि सारी साथ होगी

यंत्रणाओं के भंवर में बस विविक्ता साथ होगी

साथ है संसार लेकिन, कब तलक यह साथ होगा

कब तलक इन प्रिय जनों का हाथ तेरे हाथ होगा

एक दिन सब छूट जाना जब समझ आ जाए अच्छा 


देर से आए या जल्दी 

जब समझ आ जाए अच्छा......


तुम वृहद होना विचारों से , नहीं संक्षिप्त होना

एक साधक की तरह सब देखना मत लिप्त होना

जो तुम्हारा है तुम्हारे आप में ही आप्त है वह

जन्म से है साथ तेरे , मोक्ष तक भी प्राप्त है वह 

नाव की पतवार है वह जब समझ आ जाए अच्छा


देर से आए या जल्दी 

जब समझ आ जाए अच्छा......


🙋🙋🙋🙋🙋🙋🙋🙋



शुक्रवार, 30 जून 2023

बदली दिशा मगर रहा, लक्ष्य सदा शिव धाम

नीलकंठ बन कर लिया, उपेक्षाओं को थाम,

उपेक्षाओं को थाम, सदा ही हम मुस्काए,

लिखा भाग्य में जिसके जो वह वो ही पाए

मिला सदा सूखापन, कभी भी मिली न बदली

मगर राह पर चली, उसी के दिशा न बदली।।


गुरुवार, 29 जून 2023

निर्बांध चलना चाहती हूं.


तुम चलो धारा में 

मैं निर्बांध चलना चाहती हूं.....


किस तरह बंधन भला स्वीकार लूं

तुम ही बताओ

रोक कर द्रुत लय मेरी तुम मत मुझे 

प्रियतम सताओ

तुम रहो स्थूल दृढ़ 

मैं किंतु गलना चाहती हूं


तुम चलो धारा में 

मैं निर्बांध चलना चाहती हूं.....


क्या मिलेगा ठोस होकर

नित्य ही मैं सोचती हूं

अपने हिस्से के सितारे 

खुद उचक कर नोचती हूं

मैं प्रकृति की भांति नित नव 

रूप ढलना चाहती हूं


तुम चलो धारा में 

मैं निर्बांध चलना चाहती हूं.....


ऊसरों में बीज बोकर मैं उन्हें नित 

तक रही हूं

जलरहित आकाश है, फिर भी नहीं

मैं थक रही हूं

प्रेम का परिजात हूं मैं

सिर्फ फलना चाहती हूं


तुम चलो धारा में 

मैं निर्बांध चलना चाहती हूं.....

बुधवार, 28 जून 2023

लगावट है बनावट है दिखावट पर दिखावट है

ये रिश्ते आज कल केवल रुकावट हैं मिलावट है

वो उनके साथ फ़ोटो में बड़े इंसान लगते हैं

बस इतनी बात के कारण ही रिश्तों में कसावट है।

शुक्रवार, 23 जून 2023

मेरे पास नहीं आए हो



प्रेम बढ़ाने की खातिर मैं

जतन सभी कर आई थी पर

सोच रहीं हूं क्यों अब तक तुम मेरे पास नहीं आए हो।।


याद तुम्हें होगा पत्रों में 

कितने भाव किए थे प्रेषित

आंखों में आंसू थे लेकिन 

मुस्कानों से थे आश्लेषित

बहुत कठिन था सत्य समझना, 

क्यों हमको इतना भाए हो


सोच रहीं हूं क्यों अब तक तुम मेरे पास नहीं आए हो।।


प्रेम बढ़ेगा जूठा खाकर

दादी से सुन कर जाना था

तेरी थाली से एक कौरा 

इसीलिए मुझको खाना था

एक कौर का असर अभी तक 

तुम मेरे मन पर छाए हो


सोच रहीं हूं क्यों अब तक तुम मेरे पास नहीं आए हो।।


एक तुम्हें पाने की खातिर

मंदिर मस्ज़िद माथा टेका

गुरुद्वारे में सबद सुन लिए

मन मयूर भी कितना केका

किंतु मेरे उपवासों का फल 

तुम अब तक क्यों नहीं लाए हो


सोच रहीं हूं क्यों अब तक तुम मेरे पास नहीं आए हो।।


भूल गई थी केवल मैने

पत्रों में मनुहार किया था

जूठा भी मैने खाया था

मैने ही बस प्यार किया था

तुम तो इन राहों पर बढ़ने में 

हर दम ही अलसाए हो


सोच रहीं हूं क्यों अब तक तुम मेरे पास नहीं आए हो।