मम अंतर्नाद

मम अंतर्नाद
मेरा एकल ग़ज़ल संग्रह

शनिवार, 30 जुलाई 2022

किस दिशा में आज जाऊँ.......


सब नसें अब कट गयीं हैं

रक्त बाहर आ रहा है

प्राण मेरा किंतु अब तक बस तुम्हीं को गा रहा है

तुम बताओ किस तरह प्रिय आज मैं विश्राम पाऊँ

किस दिशा में आज जाऊँ....... 


इस कदर टूटन बढ़ी मैं ना स्वयं को रोक पाई

धार पर अपनी कलाई दे तुम्हारे लोक आई

अब नहीं है जिस्म बंधन, अब कभी भी मिल सकेंगे

अब तुम्हारे घाव सारे संग रह कर सिल सकेंगे

अब बताओ दायें बैठूँ या तुम्हारे बाएँ जाऊँ

तुम बताओ किस तरह प्रिय आज मैं विश्राम पाऊँ

किस दिशा में आज जाऊँ....... 


थी करी विनती बहुत, तुम साथ मेरा छोड़ना मत

जो ज़रा सा शेष है तुम वो भरोसा तोड़ना मत

किंतु तुमने प्रश्नवाचक चिन्ह हिस्से में दिये थे

प्रेम के बदले दुखद एहसास के किस्से दिये थे

सब किया तुम पर समर्पित अब कहो क्या और लाऊँ

तुम बताओ किस तरह प्रिय आज मैं विश्राम पाऊँ

किस दिशा में आज जाऊँ....... 


मैं नहीं हूँ जानती क्या पाप है क्या पुन्य होगा

ईश वाली उस बही में तुम मिले या शून्य होगा

किंतु इतना जानती हूँ मृत्यु सब कुछ शांत करती

घाव कैसे भी लगे हों, एक पल में कष्ट हरती

आओ हाथों में घड़ा ले और पहने तुम खड़ाऊँ

तुम बताओ किस तरह प्रिय आज मैं विश्राम पाऊँ

किस दिशा में आज जाऊँ....... 


मुक्त हो तुम अब तुम्हें कोई सताने आयेगा ना

याद की सांकल बजा कर अब कोई मुस्कायेगा ना

अब शिकायत को लिखे वो पत्र तुमको ना मिलेंगे

अब तुम्हारे और मेरे घर में सन्नाटे मिलेंगे

तुम चले जाना किसी शिवधाम गर मैं याद आऊँ 

तुम बताओ किस तरह प्रिय आज मैं विश्राम पाऊँ

किस दिशा में आज जाऊँ....... 





गुरुवार, 28 जुलाई 2022

हलधर



चार पत्तों से छिपाये 

घूमता है सर

आज फ़िर हलधर।। 


था किताबी ज्ञान से अनिभिज्ञ लेकिन

जिंदगी को पास से उसने पढ़ा था

शब्द के मोती पिरो कर हर दफा ही

भावना से काव्य ज़ेवर को गढ़ा था

वो हलाहल बीच से भी ले ही आता

फिर घटभ अपना अमिय से भर


आँधियों में,बारिशों में 

हो रहा है तर

आज फिर हलधर।। 


तन भले कृषकाय था लेकिन हृदय में

स्नेह की स्निग्ध गंगा बह रही थी

दूसरों के कष्ट भय दुख और विपदा

बिन कहे वो आत्मा ख़ुद सह रही थी

आग तो सारे विपिन मे ही लगी थी

पर जला वो जो गया भीतर


आंगनों की खोज करता

जबकि हिस्से में नहीं है घर

आज फिर हलधर।। 


उम्र के अंतिम पड़ावों में मिला है

वेदनाओं को सदा सम्मान सच है

झूठ सिंहासन पे बैठा हँस रहा है

सत्य लेकिन आज तक सबको अपच है

मान पाकर काव्य को फ़िर से मिला है

दीर्घ आयु वो रहे यह वर


होंठ पर मुस्कान धारे

दिख रहा जर्जर 

आज फिर हलधर।। 










बुधवार, 27 जुलाई 2022

मेरे दायित्व

 



तुम संभाल लेना मेरे दायित्व 

अगर जाकर ना लौटूँ।


तुम पर है विश्वास मुझे उतना ही जितना खुद पर भी है

तुमसे जीवन के रहस्य सब कह दूं इसकी जल्दी सी है।

जाने किन राहों पर जीवन की संध्या दस्तक दे जाए

इसीलिए बस तुझपर प्रेम लुटा देने की जल्दी सी है

तुम संभाल लेना मेरा विश्वास अगर मैं इसको खो दूँ, 


तुम संभाल लेना मेरे कर्तव्य

अगर जाकर न लौटूँ।


जग तो जग है, वो ही देगा, जो उसके हिस्से आया है

सीधी राहें चलने वाला राही भला किसे भाया है

काँटे उसके रस्ते में हैं, जिसने सदा फूल ही बाँटे

जिसने जिता दिया दुनिया को, उसके हिस्से में सब घाटे

तुम संभाल लेना गर मन के आँगन में मैं कांटे बो दूँ


तुम संभाल लेना मेरा सर्वस्व

अगर जा कर ना लौटूँ।


हृदय व्यथित है, डरा हुआ है,ज़िंदा दिखता, मरा हुआ है

मेरी मुस्कानों के पीछे जाने क्या क्या छुपा हुआ है

तुझे आज आतंकित मन से अपने आज मिला देती हूँ

तुझको खोने के डर से मिटती हूँ रोज़, बता देती हूँ

तुम संभाल लेना मेरा भय, अगर कभी डर कर मैं रो दूँ


तुम संभाल लेना अकथित ये प्रेम

अगर जा कर ना लौटूँ।


मंगलवार, 26 जुलाई 2022

 


🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤


जिनके बग़ैर जीने की हसरत कभी न थी

उनके बग़ैर दोस्त जिये जा रहा हूँ मैं


इतना गिरा दिया मुझे मेरे मयार से

अब खुद को भी पहचान नहीं पा रहा हूँ मैं... 


🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤


शनिवार, 23 जुलाई 2022



सोने का बिछुआ 

सोने की पायल पहने हो

ठकुराइन हो क्या?? यह प्रश्न सताता है... 

है समाज की दशा आज भी वैसी ही

उठा प्रश्न यह, केवल यह बतलाता है....... 


घर की देहरी पार नहीं कर पाती है

बूढ़ी काकी जिसकी चमड़ी काली है

लेकिन घूम रही है घर में आँगन में

जो गोरी है, दिल दिमाग़ से ख़ाली है

उसकी गोरी त्वचा देख दादी पूछे

जात धर्म से ऊँचे कुल की लगती हो


मिश्राइन हो क्या?? यह प्रश्न सताता है

है समाज की सभी व्याधियाँ वैसी ही

उठा प्रश्न यह, केवल यह बतलाता है....... 


रंग बिरंगे कपड़े पहन मटकती है

घर भर में घर की बिटिया पगलायी सी

और अलग पीछे वाले एक कमरे में

बैठी है विधवा रधिया घबराई सी

श्वेत वसन, भीगी आँखें, मुंडवाया सर

देख पूछते हैं उससे ये जग वाले


किसकी विधवा हो?? यह प्रश्न सताता है

है समाज में अब भी कुंठित एक वर्ग

उठा प्रश्न यह, केवल यह बतलाता है.......


घर के कामों को समेट, बच्चों का कर

एक लड़की जब घर से बाहर जाती है

अपने मन के कपड़े मन के संसाधन

से अपने को थोड़ा बहुत सजाती है। 

मुस्काती है, लोगों से बातें करके

तब सबकी आँखें यह प्रश्न उठाती हैं


नगर वधू हो क्या??यह प्रश्न सताता है

है समाज में पूर्वाग्रह अब तक हावी

उठा प्रश्न यह, केवल यह बतलाता है.......


सोने का बिछुआ 

सोने की पायल पहने हो

ठकुराइन हो क्या?? यह प्रश्न सताता है... 

है समाज की दशा आज भी वैसी ही

उठा प्रश्न यह, केवल यह बतलाता है....... 


शुक्रवार, 22 जुलाई 2022

देवरानी जेठानी




कभी ज़रा छोटी होती है कभी बड़ी सी बात

देवरानी जेठानी में तो ठनती दिन और रात...... 


दोनों चक्की के पाटों सी 

सारा दिन हैं चलतीं

रहे व्यवस्थित सब कुछ घर में 

इस ख़ातिर हैं गलतीं

बर्तन जैसी बज जाती जब पड़ता है आघात

देवरानी जेठानी में तो ठनती दिन और रात...... 


मयके आई ननदी के

सुलटाएं सभी झमेले

अम्मा के कड़वे तानों को

मुस्का करके झेलें

लेकिन विषम परिस्थिति मे भी, करती न प्रतिघात

देवरानी जेठानी में तो ठनती दिन और रात...... 


दोनों दो अँखियों के जैसी

एक ओर ही जाएँ

भले लड़ाई कितनी भी हो

संग खेलें मुस्काएं

आख़िर दोनों ने झेले है एक जैसे ही घात

देवरानी जेठानी में तो ठनती दिन और रात......


बड़ा अजब सा रिश्ता है ये

बड़ा अनोखा चित्र

दोनों एक दूजे की दुश्मन

दोनों पक्की मित्र

एक दूजे की समझें दोनों बिन बोले हर बात

देवरानी जेठानी में तो ठनती दिन और रात......




गुरुवार, 21 जुलाई 2022

बड़ी बहू



दोनों पैरों में पहने है

वो अपने पाजेब

बड़ी बहू सर पर धारे है

घर भर के आसेब......... 


चूल्हा चौका झाड़ू पोछा

सब उठ कर निपटाती

सबके उठने से पहले

पानी भी वो भर लाती

फ़िर भी ख़ुश ना सास हुई

और ना खुश हैं साहेब


बड़ी बहू सर पर धारे है

घर भर के आसेब.........


उत्सव में सबसे पहले 

सबको करती तैयार

ननदी को दे देती अपना 

सोने वाला हार

फ़िर भी सब ही मुँह बिचकाते

पहने देख करेब


बड़ी बहू सर पर धारे है

घर भर के आसेब.........


चक्र व्यूह घर के भीतर

घर वाले नया बनाते

नई परीक्षाएं धर देते

कितने खेल खिलाते

इस घर की वो नहीं

सोच कर करते संग फरेब


बड़ी बहू सर पर धारे है

घर भर के आसेब.........


नियति अभी तक ना बदली है

बाबा की गुड़िया की

दुःख की ढपली बजा रही है

जो सुख की पुड़िया थी

हँसी ख़ुशी छन कर निकली

थी फ़टी हुई हर जेब


बड़ी बहू सर पर धारे है

घर भर के आसेब.........


बुधवार, 20 जुलाई 2022

 




क्या कभी भूखी अंतड़ियों में उठी 

उस कुलबुलाहट से, कहीं परिचय हुआ है

क्या कभी उस जेठ वाली दोपहर की

गर्मियों में तुम तपे हो ,

क्या कभी उसको छुआ है

क्या कभी बाटा लिबर्टी छोड़ कर 

तपती सड़क पर तुम चले हो

क्या कभी तुम एक रोटी के लिए

दिन भर गले हो

यदि नहीं ये सब किया तो किस तरह दुत्कारते हो


एक रोटी के लिए जो रात दिन मरता है

बोलो क्यों उसे फटकारते हो।


क्या कभी भी उन परिस्थितियों से 

जूझे हो बताओ

क्या कभी देखी है शाश्वत भूख से लड़ती 

तुम्हारी एक पीढ़ी, 

कह सुनाओ

क्या तुम्हें मालूम है 

इस हाल में वे किस तरह हैं

क्या मिला उनको अगर पूछूँ , 

तो क्या यह भी जिरह है

क्या तुम्हें मालूम है 

अधनंग चमड़ी पर पड़ी

उस गर्द के जमने की गाथा

क्या कभी देखा है तुमने फिक्र

चिंता से भरा वह एक माथा

फिक्र है इस बात की

कि दिन तो बीता, 

रात में गुड़िया कहाँ पर सोयेगी

एक रोटी में उसे कितना मैं दे दूं , 

जिससे वो न रोयेगी

चार रुपयों में कहां से 

आएगी माँ की दवाई

और कैसे क्रीम लूंगा 

जिससे भरनी है बिवाई

लाडले ने कल कहा था 

मैथ की कॉपी खत्म है

कैसे उस बिन पढ़ सकेगा 

उसको केवल एक गम है

फिक्र की उन सीढ़ियों पर चढ़ रहा था

रोज जीता था मगर वो मर रहा था

क्या तुम्हें मालूम है ये , 

किस तरह तुम शब्द भेदी मारते हो


एक रोटी के लिए जो रात दिन मरता है

बोलो क्यों उसे फटकारते हो।


सोचते हो तुम कभी 

हर रात कैसे ये खुशी से झूमता है

पूरा दिन जो चिलचिलाती धूप में

चमड़ी जलाता, ईंट ढोता घूमता है

काम से थक हार कर

जो द्वंद खुद से कर रहा हैं

भाग्य रेखा पर उभर आई दरारें 

आज तक जो भर रहा हैं

क्या तुम्हें मालूम है ये

वह कभी चुनता न यह पथ

गर न स्थितियों ने काटे 

होते उसके स्वप्न के रथ

गर अकेले बैठ रख कर हाथ 

उसके हाथ पर पूछोगे उससे

वह नहीं बोलेगा उसकी छलछलाती

आँख तब पूछेगी तुमसे

क्या तुम्हें मालूम है ये किस तरह 

अवहेलना के बाण उसको मारते हो


एक रोटी के लिए जो रात दिन मरता है

बोलो क्यों उसे फटकारते हो।


हो अगर मानव तो मानव धर्म समझो

कर्म छोटा न बड़ा यह मर्म समझो

बांटना होता तो ईश्वर बाँट देता

तुमको नीला उसको पीला रक्त देता

एक के हिस्से सकल सुख आये होते

एक के हिस्से में होती वेदनायें

पर ज़रा सोचो ख़ुदा ने इस तरह के

भेद करते नियम क्या हैं बनाए

उसने मोती, भाव वाले हर हृदय में हैं संजोये

फिर भला तू सीपियों को देख 

क्यों मन को डुबोये

यदि मनुज का धर्म तुमको है पता तो

क्यों नहीं एक दूसरे को तारते हो


एक रोटी के लिए जो रात दिन मरता है

बोलो क्यों उसे फटकारते हो।




सोमवार, 18 जुलाई 2022

एक प्रयास



 जो मन में आ गया वही करते रहे हैं हम

बस इसलिए जहान को खलते रहे हैं हम।। 

 

जिनको नहीं था मेरी लगावट का मोल कुछ

उनके लिए ही आग में जलते रहे हैं हम।। 


मंज़िल का कुछ पता था न रस्तों की थी ख़बर

जिस ओर वो दिखे वहीं चलते रहे हैं हम।। 


गिरगिट का डर नहीं है न सांपों का खौफ़ है

बस कुछ सफ़ेद पोशों से डरते रहे हैं हम।। 


सागर मथा गया तभी अमृत पिये सभी

बस विष से अपने आप को भरते रहे हैं हम।। 


तुमने भी अपनी हमपे उठाई है उंगलियां

फ़िर उसके बाद ख़ुद से भी डरते रहे हैं हम।। 


संदीपनी के कहने पे कान्हा चले गए

दीवानगी में राधा से, मरते रहे हैं हम।। 


स्वधा कहा तुम्ही ने चलो सीधी राहपर

बस इसलिए ही प्यादों पे मरते रहे हैं हम।। 


रविवार, 17 जुलाई 2022

सारे साहूकार



लिए बही खाता हाथों में बैठे हैं तैयार

सारे साहूकार


मंडी की तो रीत यही है

सबको सबकुछ मिलता

जिसकी जितनी अधिक ज़रूरत

वो है उतना छिलता

किसको कम किसको ज्यादा अब देना है उधार

सोच रहे हैं नाक पे धर कर ऐनक बारंबार

सारे साहूकार........... 


लाभ हानि का गणित भिड़ाते

इनका जीवन बीता

पुण्य कर्म का घड़ा मगर

अंतिम पथ पर था रीता

दुःखी हृदय को दुःख की पूंजीबांटी है हर बार

सोच रहे हैं स्वांसें गिनते काश लुटाते प्यार

सारे साहूकार...........


जो बोया वो काटेंगे सब

अंत समय यह तय है

इसी बात का साहूकारों के 

मन में अब भय है

रामलाल का खेत और रधिया का मंगलहार

उन्हें दिलाएंगे जीवन के रण में केवल हार


लिए बही खाता हाथों में बैठे हैं तैयार

सारे साहूकार।।। 







स्वधा रवींद्र उत्कर्षिता



शनिवार, 16 जुलाई 2022

पायल वाले पैर




कैसे समझेंगे वो बोलो

समय हुआ प्रतिकूल

जिन पायल वाले पैरों को 

लगी कभी ना धूल.......... 


मलमल की कालीनों पर

जिसका जीवन है बीता

जिसके घट में सदा सुधा है

जो घट कभी न रीता

उसको प्यास लगी पानी की

यह बस तेरी भूल


कैसे समझेंगे वो बोलो

समय हुआ प्रतिकूल।। 



सारी की सारी पीड़ा तो

फटी एड़ियाँ झेले

जिनके हिस्से में आये हैं

जग के सभी झमेले

कंकड़ पत्थर रस्ते वाले

और कटीले शूल


कैसे समझेंगे वो बोलो

समय हुआ प्रतिकूल


जिनके हिस्से में लिखा है

एक शाश्वत संग्राम

उनको भी आराम मिला

जब जप लेते राम

कष्टों की गिनती करते

भी जाते सब कुछ भूल


कैसे समझेंगे वो बोलो

समय हुआ प्रतिकूल।। 

जिन पायल वाले पैरों को 

लगी कभी ना धूल........

शुक्रवार, 15 जुलाई 2022

मुक्तक

 



मैं अपने स्वप्नों की नौका किसी और संग क्यों बाँधूं, 

ख़ुद में ख़ुद को ढूँढ सकूँ मैं, इतना क्यों ना मैं जागूँ

ख़ुद में ही ब्रह्मांड देख लूँ, ख़ुद में ही चैतन्य दिखे

क्यों ना मैं सन्यासी बन जागृत होकर मन को साधूं.... 


गुरुवार, 14 जुलाई 2022

दोहे


 

ढक्कन के बिन जिस तरह, डिब्बे की औकात,

प्रेम बिना उस तरह है, साजन की सौगात।


ठगे नयन हैं देखते, पी चितवन की ओर

प्रतिबिंबित छवि हो रही, अलकों की है कोर।


करी फकीरी हृदय ने,नैन लिए सन्यास

हाँथ जपे माला निरत,, राम मिले अनयास।


ड्योढ़ी लांघी तो लगा, जाऊंगी किस ओर

थामी पी की आस में, राम नाम की डोर।


अंजुरि में भर खड़ी हूँ, मैं बरसों की प्यास,

पी मस्तक को चूम लें, यही एक बस आस।


गीता पढ़ कर क्या हुआ, जब बदले नहिं भाव

आ जाता है आज भी, बात बात पर ताव।


टूटी खटिया फटा बिछौना  ओढ़नी तरामतार

अधरों पर मुस्कान उस तरह ज्यों वन में श्री राम।


मैं बैरागन हो गयी,तज सारे  अरमान,

ना अपयश से दुख मुझे , न यश का अभिमान।


भीगे नैना बोलते,भीगी भीगी बात,

बिटिया पिंजरा है भला, बाहर हैं आघात।


बुधवार, 13 जुलाई 2022

कृष्ण के प्रेम में



अब ना पकड़ना हाथ हमारा मोहन हमको जाने देना

रोकने का तुम यत्न ना करना, कह मुकरी सुलझाने देना

संग तुम्हारे नहीं हैं जो स्वाँसें तो स्वांसों को कान्हा मिटाने देना

तोड़ के पिंजरा प्रेम का कृष्ण हमें तुम खुद को भुलाने देना.......... 

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सामने काहे को आय के कान्हा नैनन को भरमाये रहे हो

पाती पियार की लिख लिख भेज के काहे हमें उलझाए रहे हो

काहे बजाए के बंसी हमें ओ नटवर इतना सताए रहे हो

दूर गए हो तो जाओ पिया तुम काहे हृदय में समाए रहे हो.... 

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पैर पे पैर चढ़ाये के कान्हा, लग के दीवार के साथ खड़े हैं, 

हाथ में मुंदरी तन पीतांबर मोर मुकुट गल माल पड़े हैं

बाँसुरी अपनी दिखाये दिखाये कन्हैया ना जाने काहे अड़े हैं

राधा दीवानी ना देख सके कुछ प्रेम रतन अँखियों में जड़े हैं


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सोमवार, 11 जुलाई 2022

कितनी बेग़ैरत लड़की है

 



पढ़ कर मेरे लिखे संदेशे

मुस्का कर वो सोच रहा था

कितनी बेग़ैरत लड़की है

बार बार वापस आती है.... 


प्रश्न बहुत करती है लेकिन उत्तर शून्य सदा से मेरा

बता दिया है उसको मैने उसने जबरन मुझको घेरा

फ़िर भी मेरे हित की ख़ातिर जाने क्यों मंदिर जाती है


कितनी बेग़ैरत लड़की है

बार बार वापस आती है.... 


अपशब्दों के बाण चला कर कितनी बार उसे मारा है

उससे यही कहा भावों का गंगाजल तेरे खारा है

फ़िर भी बुरे स्वप्न देखे तो मेरी ख़ातिर घबराती है


कितनी बेग़ैरत लड़की है

बार बार वापस आती है.... 


मेरे अपनों को अपने आँचल की छाया में रखती है

मेरी ख़ातिर सब कुछ करती, कभी कहीं ना वो थकती है

फ़िर भी मेरे आरोपों को वो सीने से चिपकाती है


कितनी बेग़ैरत लड़की है

बार बार वापस आती है.... 


उसे नहीं मालूम कि जिस दिन ना लौटी उस दिन क्या होगा

भीगी पलकें, रोती आँखें, खाली रातें क्या क्या होगा

यही सोच कर रोज़ मुझे वो कोरी चिट्ठी लिख जाती है


कितनी बेग़ैरत लड़की है

बार बार वापस आती है.... 


शनिवार, 9 जुलाई 2022

एक लड़की की बंद अलमारी


एक पूरी की पूरी दुनिया है

एक लड़की की बंद अलमारी 


माँ के सपने समेट कर उसने 

अपनी चुन्नी में बांध रखे हैं 

बाप की शर्ट के बटन टूटे

सूईं तागे के साथ रखे हैं

लिस्ट भी एक बना इंरखी है

भाई की क्या ज़रूरतें होंगी

और पैसे पड़े अगर कम तो

कैसी उतरी सी सूरतें होंगी

घर में जो जो ज़रूरतें होंगी

उनकी पहले से करती तैयारी


एक लड़की की बंद अलमारी.... 


अपने कपड़ों के बीच में उसने

अपनी इच्छायें सब छुपाई हैं

और लॉकर में बन्द करके वो

अपने एहसास छोड़ आई है

उसमें कुछ ख़त हैं जो लिखे उसने

एक लड़के को चाँद कहते हुए

साथ चलने की गुज़ारिश के साथ

और आँसू के साथ बहते हुए

कर रही है वो सिर्फ अपने साथ 

चंद अपनों के लिए अइय्यारी


एक लड़की की बंद अलमारी.... 


खोलकर देखना कभी उसको

जाने कितनी  कहानियाँ होंगी

सिसकियाँ हिचकियाँ मिलेंगी तुम्हें

कितनी रखी निशानियाँ होंगी

टूटे सपनों की एक गुल्लक में

ख़्वाब कुछ टूटे खनखनायेंगे

कोई पढ़ पाए ना कभी उसको

इसलिए पल्ले गुनगुनायेंगे

ख़ुद को ख़ुद में ही छिपा लेने की

कर रही है वो पूरी तैयारी


एक लड़की की बंद अलमारी.... 


शुक्रवार, 8 जुलाई 2022

चाय की टपरी


 

सूर्य के संग उग रही है

चाय की टपरी.... 


कुल्हडों के संग दिखते 

बिस्कुटों के गाँव

और ऊपर छा रही है

फूस सर पर छाँव

चिप्स पापड़ टाफियों 

के संग में पपड़ी


सूर्य के संग उग रही है

चाय की टपरी..... 


कुछ कुमारों ने वहाँ 

मिलने की ठानी है

और बुजुर्गो के दिलों की 

राजधानी है

प्यार की बजती वहाँ पर

नित्य ही ढपरी


सूर्य के संग उग रही है

चाय की टपरी..... 


डिग्रियों ने जबकि अपना

मोल है खोया

चाय की इन टपरियों ने

ख़्वाब बोया है

एम बी ए ने चाय बेची

ये नहीं तफरी


सूर्य के संग उग रही है

चाय की टपरी..... 


दे रही है ज्ञान यह 

नव मार्ग गढ़ने का

है बताती फायदा 

बस ये ही पढ़ने का

ख़ुद के ख़ुद मालिक बनो

क्यों खोलना अंजुरी


सूर्य के संग उग रही है

चाय की टपरी..... 


गुरुवार, 7 जुलाई 2022

एक बुड्ढा एक बुढ़िया......

 




देहरी पर बैठ करके बात करते

एक बुड्ढा एक बुढ़िया...... 


याद करते वो प्रथम पल

जब नयन अपलक मिले थे

मौन में भीगे हुए हमको 

सुलगते तुम मिले थे

नीड़ के निर्माण की संकल्पना

के उस चरण पर 

साथ आने के लिए 

व्याकुल हुए थे

एक चिड्डा एक चिड़िया


देहरी पर बैठ करके बात करते

एक बुड्ढा एक बुढ़िया..... 


चल पड़ी थी रेल जीवन की

बड़ी ही तीव्र गति से

थी कभी खुशियाँ कभी

रोयी थी आँखे दुर्गति से 

जानते थे काल गति है

बीतना हर एक समय है

बस यही एक भाव लेकर

हाथ थामे बढ़ रहे थे

एक गुड्डा एक गुड़िया


देहरी पर बैठ करके बात करते

एक बुड्ढा एक बुढ़िया..... 


आँख में अपनी समेटे 

स्वप्न अपनों की खुशी के

कर रहे हैं आज वे इतिहास 

की यात्रा पुनः फ़िर

देखते है आँख भर कर 

एक दूजे को कभी वे

और कभी गिनते हैं

मुस्का कर उभर जो आई झुर्रियाँ


देहरी पर बैठ करके बात करते

एक बुड्ढा एक बुढ़िया..... 

मंगलवार, 5 जुलाई 2022

बस एक शेर


 

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यकीं उसको यकीनन अब नहीं बिल्कुल बचा मुझ पर, 

जो मेरी पीठ पर तिल है, वो अपना काम कर आया।। 

 

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बस एक शेर

 


 

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तुम्हारे पास रहते थे तो हमको काम थे दो ही

तुम्हें सोते हुए तकना, तुम्हें तकते हुए सोना। 

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लल्ला सो रहा है......


        सब रहो अब मौन 

लल्ला सो रहा है...... 


कार्य में रत है निरंतर

किंतु सीने से लगाए

गुनगुनाती जा रही है

वो हृदय की वेदनायें

लोरियों के बंध में वो

यह निरंतर गा रही है

सब रहो अब मौन

लल्ला ख्वाब अंकुर बो रहा है


सब रहो अब मौन 

लल्ला सो रहा है...... 


एक माँ ही है सभी दायित्व

जो पूरे करे हैं

प्रेम वाली भावना से 

जो जगत भर को भरे है

स्नेह का परिमाप अपना

योजनों से भी बड़ा कर

कह रही सब चुप रहो

देखो ना लल्ला रो रहा है


सब रहो अब मौन 

लल्ला सो रहा है...... 


देह की गर्मी से अपनी

नित्य उसको सेकती है

और कभी अनिमेष नयनों से

ललन को देखती है

वो सभी कर्तव्य अपने 

पूर्ण श्रद्धा से निभाती

बोलती है शांति धर लो

लाल आकुल हो रहा है


सब रहो अब मौन 

लल्ला सो रहा है......

सोमवार, 4 जुलाई 2022

हरसिंगार


 


नहीं चाहिए गुलदानों को क्रय कर लाये पुष्प तुम्हारे

यदि प्रसन्न करना हो हमको, हरसिंगार तुम चुन कर लाना

मेरे आस पास ही रहना

ज्यादा दूर नहीं तुम जाना। 


इच्छायें सीमित है इतनी, दो वस्त्रों में जी सकते हैं

सुधा कलश की चाह नहीं है, तुम संग जल पी जी सकते हैं

साथ तुम्हारे चलना हो तो, शूल भरे पथ भी अपने हैं

स्वप्न तुम्हारे साथ जिये जो केवल स्वप्न वही अपने हैं

जेवर गहना नहीं चाहिए, साथ स्वयं का बुन कर लाना


मेरे आस पास ही रहना

ज्यादा दूर नहीं तुम जाना। 


रेशम वाली आस नहीं है हम कपास को अपना कहते

कनक धातु भर लगता हमको, हम पुष्पों की माला गहते

मोती माणिक हीरा पन्ना सब बेमोल तुम्हारे आगे

तुम आशीष ईश का हम पर जिससे भाग हमारे जागे

मेरी ख़ातिर भावनाओं के गजरे माला गुन कर लाना


मेरे आस पास ही रहना

ज्यादा दूर नहीं तुम जाना। 


प्राण वायु सम मेरे जीवन का निर्धारण तुम करते हो

मन के खाली घट को मेरे अपनेपन से तुम भरते हो

जीवन का शृंगार तुम्हीं हो, तुमको पा कर हम जीते हैं

बिन तेरे मेरे जीवन की व्यस्ताओं के पल रीते हैं

अपने मन के गीत प्रिये तुम मेरी ख़ातिर सुन कर लाना


मेरे आस पास ही रहना

ज्यादा दूर नहीं तुम जाना। 


रविवार, 3 जुलाई 2022

तुमसे बेहतर धारावी है।।



बड़े घरों में रहने वालों

तुमसे बेहतर धारावी है।। 


ऊँची ऊँची मीनारों में

छिछले छिछले मन रहते हैं

भरे हुए अंदर कोलाहल

बाहर शांति मंत्र कहते हैं

रत्न जड़ित मुकुटों का सच यह

रक्त पिपासु बने रहे हैं

ख़ुद को तरवर कहने वाले

फल खुद खा कर तने रहे हैं

जो भी सम्मुख दिखता है अब

सब का सब ही मायावी है।। 


बड़े घरों में रहने वालों

तुमसे बेहतर धारावी है।। 


संत महंतों की कुटिया में

हमने सभी प्रलोभन देखे

सोफा बेड कालीनें झूमर

ए सी से उपशोभन देखे

जब कृत्रिम हरियाली देखी

मन ही मन में हम मुस्काए

उपालंभ से दूर रहे हम

पर बिन कहे ये रुक ना पाए

ईश्वर निर्मित इस दुनिया में

अब ईश्वर भी दुनियावी है


बड़े घरों में रहने वालों

तुमसे बेहतर धारावी है।। 


दिखने में तो एक जैसे थे

फ़िर एक कटता एक काटता

एक सभी को एक बनाता

एक अलग किस्मों में बाँटता

हिस्से हिस्से देश हो गया

किस्सा अब यह आम हुआ है

राम हुए केवल तुलसी के

कबिरा अब बदनाम हुआ है

ऐसे हालातों में मानवता का 

मरना संभावी है


बड़े घरों में रहने वालों

तुमसे बेहतर धारावी है।। 


धारावी में रहने वाले 

अली मुहम्मद कृष्ण साथ हैं

राम खेलता है बस्ती में 

अकबर उसका बहुत खास है

गले काटते नहीं, दिवाली ईद 

गले मिल कर गाते हैं

रबिया हलवा चना बनाती

फिर सब मिलजुल कर खाते हैं

ऐसा हो माहौल तभी बस

राम राज्य बस अभिभावी है


बड़े घरों में रहने वालों

तुमसे बेहतर धारावी है।। 








शनिवार, 2 जुलाई 2022

महबूबा मुझे माँ जैसी लगती है।।



उसे मेरी भलाई के सिवा कुछ भी नहीं दिखता

यही वजह है महबूबा मुझे माँ जैसी लगती है।। 


खिला देती है मुझको कौर वो ख़ुद अपने हिस्से का,

मेरी ख़ातिर बचाये सारे पैसे खर्च करती है,

भले कितनी हो रुसवाई, भले कोई कहे कुछ भी

ज़माने भर से वो मेरे लिए हर रोज़ लड़ती है

मेरी ख़ातिर लुटा देती है अपनी हर खुशी पागल

मेरी खातिर जो बिकना भी पड़े तो रोज़ बिकती है


उसे मेरी भलाई के सिवा कुछ भी नहीं दिखता

यही वजह है महबूबा मुझे माँ जैसी लगती है।। 


मेरी आँखों में आँसू गर कभी भूले से आ जाएँ

वो रो रो कर ख़ुदा से प्रार्थनायें खूब करती है

मेरे जीवन की खुशखाली की खातिर बाँवरी मेरी

कभी व्रत कर रही होती, कभी वो रोज़े रखती है

उसे कब फर्क पड़ता है मेरे ना साथ होने से

वो बंजारन तो सब कुछ छोड़ मेरे साथ चलती है


उसे मेरी भलाई के सिवा कुछ भी नहीं दिखता

यही वजह है महबूबा मुझे माँ जैसी लगती है।। 


मेरे सुख में सुखी होती मेरे गम में वो पगलाती, 

मैं उससे दूर हो जाऊँ, तड़पती और घबराती

वसीयत में, वो अपना सब, मेरे ही नाम कर जाती

वो मुझसे पूछ कर जीती, मेरी ख़ातिर वो मर जाती

नहीं होती मगर नस नस में मेरे खूब बहती है

मुझे हर वक़्त मेरी ही फ़िकर करने को कहती है


उसे मेरी भलाई के सिवा कुछ भी नहीं दिखता

यही वजह है महबूबा मुझे माँ जैसी लगती है।। 


कहीं भी हो, कभी भी हो, वो मेरे साथ होती है

वो मेरे साथ हंसती है वो मेरे साथ रोती है

वो मेरे घर,मेरे रिश्ते सभी को बाँध रखती है

मैं सो जाता हूँ तब भी वो सिरहाने बैठ जगती है

अजब सी है, मेरा व्यहवार उसको नित रुलाता है

मगर जो दर्द भी मैं दूँ, उसे मुस्का के रखती है


उसे मेरी भलाई के सिवा कुछ भी नहीं दिखता

यही वजह है महबूबा मुझे माँ जैसी लगती है।।