सोने का बिछुआ
सोने की पायल पहने हो
ठकुराइन हो क्या?? यह प्रश्न सताता है...
है समाज की दशा आज भी वैसी ही
उठा प्रश्न यह, केवल यह बतलाता है.......
घर की देहरी पार नहीं कर पाती है
बूढ़ी काकी जिसकी चमड़ी काली है
लेकिन घूम रही है घर में आँगन में
जो गोरी है, दिल दिमाग़ से ख़ाली है
उसकी गोरी त्वचा देख दादी पूछे
जात धर्म से ऊँचे कुल की लगती हो
मिश्राइन हो क्या?? यह प्रश्न सताता है
है समाज की सभी व्याधियाँ वैसी ही
उठा प्रश्न यह, केवल यह बतलाता है.......
रंग बिरंगे कपड़े पहन मटकती है
घर भर में घर की बिटिया पगलायी सी
और अलग पीछे वाले एक कमरे में
बैठी है विधवा रधिया घबराई सी
श्वेत वसन, भीगी आँखें, मुंडवाया सर
देख पूछते हैं उससे ये जग वाले
किसकी विधवा हो?? यह प्रश्न सताता है
है समाज में अब भी कुंठित एक वर्ग
उठा प्रश्न यह, केवल यह बतलाता है.......
घर के कामों को समेट, बच्चों का कर
एक लड़की जब घर से बाहर जाती है
अपने मन के कपड़े मन के संसाधन
से अपने को थोड़ा बहुत सजाती है।
मुस्काती है, लोगों से बातें करके
तब सबकी आँखें यह प्रश्न उठाती हैं
नगर वधू हो क्या??यह प्रश्न सताता है
है समाज में पूर्वाग्रह अब तक हावी
उठा प्रश्न यह, केवल यह बतलाता है.......
सोने का बिछुआ
सोने की पायल पहने हो
ठकुराइन हो क्या?? यह प्रश्न सताता है...
है समाज की दशा आज भी वैसी ही
उठा प्रश्न यह, केवल यह बतलाता है.......

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