मम अंतर्नाद

मम अंतर्नाद
मेरा एकल ग़ज़ल संग्रह

गुरुवार, 22 दिसंबर 2022

मकड़जाल है

 



फंसे हुए की क्या मजाल है

अरे बुरा हाल है

ये जीवन इक मकड़जाल है........


फंदों के बाज़ारवाद में 

जो भी फंसा निकल ना पाया, 

उलझा लेता है खुद में यह

इसकी अय्यारों सी माया

दिखने में तो सहज सरल है

पर भीतर से इंद्र जाल है

अरे बुरा हाल है

ये जीवन इक मकड़जाल है........


दिखने में नौलखे हार सा

किंतु घोंटता दम रहता है

सुख की नदिया से ज्यादा 

इसमें दुख का लावा बहता है

फिर भी सबको यही चाहिए

कैसा ये देखो कमाल है

अरे बुरा हाल है

ये जीवन इक मकड़जाल है........


लीलाधर ने लीला करके

अद्भुद ये संसार बनाया

बड़े और छोटे से छोटे

कण में अपना बिंब बसाया,

जिसको बाहर ढूंढ रहा तू

मन में वो तेरे, कृपाल है

अरे बुरा हाल है

ये जीवन इक मकड़जाल है.......

फंसे हुए की क्या मजाल है

अरे बुरा हाल है

ये जीवन इक मकड़जाल है........


शनिवार, 26 नवंबर 2022

औरतें

 

एक गीतिका


रंग काला है मगर मन से कपोती औरतें

फिर भी घर वालों कि ख़ातिर हैं पनौती औरतें।। 


डोलची भर भार सर पर, जंगलों में है बसर

पात, माटी , डंडियाँ और झाड़ ढोती औरतें।


पीठ पर है बोझ घर का , शीश पर छलके घड़ा

हाथ मे लालन उठाये, खुद को खोती औरतें।


उम्र कटनी थी जो पढ़ लिख कर किसी दरबार में

अब किसी बिस्तर पड़ी बेकार होती औरतें।


बाप का दुख, और घरवाले की सारी मुश्किलें

देख कर बेचैन होती और  रोती औरतें।


जब किसी की कोख में कलियों ने करवट ली तो फिर

औरतें बनने से पहले खाक होती औरतें।


जब स्वधा बन कर जगत में आ गयी तो ये हुआ

जुगनुओं से बन गईं अंगार बोती औरतें।



सोमवार, 3 अक्टूबर 2022

एक गज़ल

 




उर्दू अदब के कायदे कानून जानकर

हम क्या करेंगे गीतों को ग़ज़लों में ढाल कर।। 


अब तक नहीं है याद हमें अपनी इबारत, 

फिर क्या मिलेगा लाम मीम को संभाल कर।। 


जो मेरा था नहीं, कभी भी, उसके हक में हम

अब क्या करेंगे आँख में कुछ सपने पाल कर।। 


जिसको नहीं है इल्म ज़रा सा भी त्याग का

हम क्यों बढ़ेगें उसकी तरफ दूजा गाल कर।। 


मिट्टी हैं एक रोज़ फ़िर से होना है मिट्टी

कूज़े पे जो चढ़े तो वो रख दे गा ढाल कर। 


जिसको भी बताओगे अपने दर्द ओ गम कभी

ये तय है कि जायेगा लौट गोलमाल कर।। 


हमने स्वधा को अपने ही भीतर छिपा लिया

अब कोई भी तोड़ेगा फ़िर इस्तमाल कर ।। 


सोमवार, 12 सितंबर 2022

वो तो केवल एक साहूकार निकला




जिसको पंडित प्यार का माना कभी था

वो तो केवल एक साहूकार निकला

झूठ थी बातें सभी उस सत्यव्रत की

झूठ उसका प्यार और व्यहवार निकला । 


था कभी देखा जहाँ पर एक जोगी

उस हृदय में एक रोगी बस रहा था

नित्य संशय के नवल कुछ बीज लाकर 

वो स्वयं अंतस में बरबस बो रहा था

जो बताता प्रेम को आधार अपना

आज झूठा उसका हर आधार निकला


जिसको पंडित प्यार का माना कभी था

वो तो केवल एक साहूकार निकला।। 


ढूँढता था कथ्य के पर्याय सारे 

किंतु जो भाये उसे वह मानता था

दीप जिसको मान कर हमने चुना था

वो तिमिर में ख़ुद उजाला छानता था

जिसको तट हम मानकर चलने लगे थे

वो स्वयं ही कर्म से मंझधार निकला


जिसको पंडित प्यार का माना कभी था

वो तो केवल एक साहूकार निकला।। 


आस्तीनों में बसे सर्पों की ख़ातिर

उसने घर की एक मैना को रुलाया

जो उसी के हित में पढ़ते थे दुआएँ

वो वही कर, आज फिर से काट आया

जिसको अमृत मान कर हम पी रहे थे

वो गरल की तप्त अविरल धार निकला 


जिसको पंडित प्यार का माना कभी था

वो तो केवल एक साहूकार निकला।। 




सोमवार, 29 अगस्त 2022

सोई और आराम किया




उसने मुझको छोड़ दिया तो मैंने भी ये काम किया

उसको ताक पे रखा मैंने, सोई और आराम किया।। 


लोगों ने मंदिर में जाकर धूप दीप वंदना करी

मैंने अपने मन को मंदिर तन को अक्षरधाम किया।। 


दुनियादारी वाली गठरी लदी पीठ पर बरसों से

मैंने उसको लादे लादे खुद से नित संग्राम किया।। 


अय्यारों के बीच रही पर कोई फरेब न छू पाया, 

मैंने सच की जोत थाम कर, अपना हर इमाम किया।। 


महफ़िल में रह कर भी ख़ुद को ख़ुद में बाँधे रखा सदा, 

इस तरह से मैंने ख़ुद को देखो आत्माराम किया।। 


जिसने भी गाली दी उसको उसी समय माफ़ी देकर

अपने हिस्से शांति बटोरी राम राम बस राम किया।। 


मुझसे अपनों को यूँ करके रही शिकायत मन भर की

बिना किये, गलती मानी और मैंने युद्ध विराम किया।। 


लोग लड़ रहे थे संज्ञा बनने की ख़ातिर इस जग में

मैंने ख़ुद को हम कहकर संज्ञा की जगह सर्वनाम किया।। 


स्वधा चैन से सो पाती है इसका बस एक कारण है

अपनों की खुशियों को उसने कभी नहीं नीलाम किया।। 



शुक्रवार, 26 अगस्त 2022

एक मुक्तक



अब नहीं कुछ भी कहना मुझे, मौन ही मुझको भाने लगा है, 

एक अनहद  सुरीला सा स्वर मेरे मन को सजाने लगा है, 

तृप्त अब है हर इक कोशिका, कोई तृष्णा नहीं शेष है, 

जब से उसने छुआ है मुझे, मन ये बंसी बजाने लगा है।। 


गुरुवार, 25 अगस्त 2022

एक मुक्तक

 

प्रेम चुंबक नहीं है प्रिये, एक उन्मुक्त आकाश है, 

जिसमें कोई भी चिंता न हो प्रेम कुछ ऐसा अवकाश है

जिसमें कितनी भी पीड़ा मिले किंतु मन मुस्कुराता रहे

प्रेम सबको छकाता फिरे ऐसा मीठा सा बदमाश☺ है।। 


सोमवार, 22 अगस्त 2022

सुनो तथागत




सुनो तथागत! 

कभी देखा है तुमने मौन को

शोर करते हुए

कभी देखी है कोई विद्युत धारा 

उल्टी दिशा में बहती

कभी देखा है 

चलता हुआ चेतना विहीन शरीर

कभी देखा है

बिना कोई इच्छा कोई आस धारे

किसी मन को अधीर...... 


नहीं देखा होगा, 

कह सकती हूँ मैं यह.... 

जानते हो क्यों? 


क्योंकि

इन्हें देखने के लिए चाहिए

विशेष दृष्टि

जो कर सकती हो प्रलय के पलों में 

प्रेम की सृष्टि


और वह दृष्टि पाने के लिए

बनना पड़ता है नीलकंठ

पीना पड़ता है विष

पर कठिन है नीलकंठ बन पाना

यह भी समझती हूँ


बताती हूँ तुम्हें एक और उपाय 

यदि देखने हों तुम्हें

आशाओं की टूटती दीवारों पर 

टिकी जीवन रूपीछत, 

जो दे रही है छाया 

ख़ुद हो कर छत विक्षत


बन न सको नीलकंठ तो 

बन जाना सुकरात

बन जाना मीरा

उठा लेना विष 

कभी प्रेम और कभी समाज के लिए


निश्चित ही तब समझ पाओगे तुम

शांत समंदर के अंदर छिपे तूफ़ान को। 



रविवार, 21 अगस्त 2022

पेड़ पर लिख आए हैं हम



आई मिस यू, आई लव यू, लाइक यू के भाव सारे, 

पेड़ पर लिख आए हैं हम प्रेम के पर्याय सारे....... 


कह नहीं पाए प्रिये को सो प्रकृति से कह रहे हैं

पर्वतों से लड़ रहे हैं, हर नदी में बह रहे हैं

बाग,वन,झरने हमारे संग प्रिय को अब पुकारे


पेड़ पर लिख आए हैं हम प्रेम के पर्याय सारे....... 


नैन निस दिन बह रहे हैं, धड़कनों में तीव्रता है, 

सोचता मस्तिष्क अब ना, हाथ आई वेदना है

हो गए हैं अब हृदय में प्रेम के प्रतिश्याय सारे


पेड़ पर लिख आए हैं हम प्रेम के पर्याय सारे....... 


छंद लिखे गीत लिखे , प्रिय समर्पित बंध लिखे

और फ़िर प्रिय ने किये जो संग, वो छल छंद लिखे

खत्म अब कर आए हैं हम  प्रेम के अध्याय सारे


पेड़ पर लिख आए हैं हम प्रेम के पर्याय सारे....... 





गुरुवार, 18 अगस्त 2022

क्यों?



मुहब्बत है तो फिर आँखों में पानी क्यों?? 

ये अपने साथ तेरी बदगुमानी क्यों?? 


जहाँ नज़रों से सारे काम होने हैं

वहाँ बंदूक अब तुझको चलानी क्यों?? 


तुझे जिसका अदब करना था मेरे दिल

उसी के साथ तेरी बद जुबानी क्यों?? 


ज़हर किसने दिया और कब दिया बोलो

ये तेरे खून का रंग आसमानी क्यों?? 


तुम्हारा लाल धुत है जब नशे में फ़िर

बहु चहिए तुम्हें अब खानदानी क्यों?? 


नहीं माँगा था जिसने कुछ भी तुमसे फ़िर

उसी के साथ तेरी बेईमानी क्यों?? 


रसोईं में खड़ा जब हो गया आकर

तेरा जज़्बा अभी तक मेहमानी क्यों?? 


तेरे किरदार का रंग सबने देखा है

तू उसकी कर रहा है तर्जुमानी क्यों?? 


मरा है देश जब जब खोखला हो कर

पहन ली मंत्रियों ने शेरवानी क्यों?? 


चलाने के लिए हैं हाथ अरबों जब

उन्हें दिखते हैं अंबानी अडानी क्यों?? 


जिन्हें तुमको पकड़ना साँप हैं वोवो सब

फ़िर उनको कैद करने चूहेदानी क्यों?? 


स्वधा कर पायेगी ना चापलूसी जब

बताओ कर रहे फ़िर मेहबानी क्यों?? 


रविवार, 14 अगस्त 2022

एक मुक्तक

 बस यूं ही


उड़ने को हैं पंख मगर, पिंजरे से इश्क़ लगाया है

हमने तो मन के भीतर ही, इक संसार बसाया है

खुद में ही हम गुम रहते हैं , खुद से बातें करते हैं

खुद की ख़ातिर खुद से खुद को हमने रोज़ मिलाया है।



शनिवार, 13 अगस्त 2022

दोहे

 



ढक्कन के बिन जिस तरह, डिब्बे की औकात,

प्रेम बिना उस तरह है, साजन की सौगात।


ठगे नयन हैं देखते, पी चितवन की ओर

प्रतिबिंबित छवि हो रही, अलकों की है कोर।


करी फकीरी हृदय ने,नैन लिए सन्यास

हाँथ जपे माला निरत,, राम मिले अनयास।


ड्योढ़ी लांघी तो लगा, जाऊंगी किस ओर

थामी पी की आस में, राम नाम की डोर।


अंजुरि में भर खड़ी हूँ, मैं बरसों की प्यास,

पी मस्तक को चूम लें, यही एक बस आस।


गीता पढ़ कर क्या हुआ, जब बदले नहिं भाव

आ जाता है आज भी, बात बात पर ताव।


टूटी खटिया फटा बिछौना  ओढ़नी तरामतार

अधरों पर मुस्कान उस तरह ज्यों वन में श्री राम।


मैं बैरागन हो गयी,तज सारे  अरमान,

ना अपयश से दुख मुझे , न यश का अभिमान।


भीगे नैना बोलते,भीगी भीगी बात,

बिटिया पिंजरा है भला, बाहर हैं आघात।

शुक्रवार, 12 अगस्त 2022

😍😍😍😍



खुल के रोने के लिए और खुल के हँसने को

मन का बच्चे सा बने रहना, एक ज़रूरत है। 



😍😍😍😍

बुधवार, 10 अगस्त 2022

लड़के हो तुम



पीड़ा कितनी भी बढ़ जाए

नीर नयन से बाहर आयें

लेकिन तुम्हें कसम है तुम चिल्लाना मत

लड़के हो तुम रो रो अश्रु बहाना मत।। 



झिड़ में रहना इड़ में रहना ,सीधेपन से चिढ़ में रहना

तड़क भड़क रंगीन मिजाज़ी लेकर इगो इड में रहना

सबको ज़ीरो सदा समझना

खुद को हीरो मान गरजना

घर भर फैला भी हो तो तुम, उसको फ़िर सरियाना मत


लड़के हो तुम रो रो अश्रु बहाना मत।। 


भावनओं की गंगा को तुम कभी न बाहर आने देना

इमली, अमरक और बताशे ख़ुद को कभी न खाने देना

अपने मन की ही बस करना

दूजों का मन कभी न धरना

और अगर ना मन की हो तो छिप कर भी पिपियाना मत


लड़के हो तुम रो रो अश्रु बहाना मत।।


बचपन से ही सिखलाया है, तुमको वीर शिरोमणि बनना

चाहे कैसी भी स्थिति हो, झुकना मत तुम केवल तनना

झुक जाना ही कमज़ोरी है, 

लड़ने में कैसी चोरी है

चाहे कैसी भी स्थिति हो लेकिन तुम रिरियाना मत


लड़के हो तुम रो रो अश्रु बहाना मत।। 


शनिवार, 6 अगस्त 2022

एक मुक्तक

 



शिराएं हैं सभी निष्प्राण, स्पंदन नहीं होता, 

विकल होता है मन लेकिन कभी क्रंदन नहीं होता, 

मैं जुड़ जाती हूँ लिख कर भाव के पर्याय सब उसको

मग़र वो दे सदा उत्तर, कभी बंधन नहीं होता।।। 



शुक्रवार, 5 अगस्त 2022




जन्म लेने के लिए सबसे ज़रूरी ये है, 

खत्म पूरी तरह से पहले हुआ तो जाए... 

वो जो है ग़ैर का अपना भी बनेगा एक दिन

जिस्म की जगह मगर दिल को छुआ तो जाए


गुरुवार, 4 अगस्त 2022

बस यूँ ही




 गुड मॉर्निंग के उत्तर में जो गुड मॉर्निंग भी ना बोले

उससे दूर ज़रा रहिये जो राज़ हृदय के ना खोले


चाहे चखने में कितना भी मीठा हो वो फल लेकिन

उससे अच्छे इमली अमरक जो यादों के रस घोले


भावनाओं को करो समर्पित लेकिन बस उस मंदिर में

केवट शबरी और अहिल्या जिसके आँगन में डोले


जो अपनी ही हाँक रहें हों, उनसे रहना दूरी पर

उनसे तो बेहतर वो इंसा जो रहते है अनबोले


सुनना है तो सिर्फ सुना कर तू अपने दिल की आवाज़

काहे बेमतलब की बातों से भरता मन के झोले


जिसे चांद महबूब लगा हो, पाखंडी हो सकता है

मामा और रोटी जो देखे, वो सारे मन से भोले


एक ही पल में मन तेरा बिल्कुल हल्का हो जायेगा

बच्चों की तरह या तो हँस या उनकी तरह रो ले


लुका छिपी का खेल खेलते हैं जो रिश्ते नातों में

तू भी टीप मार दे छिप कर, उनकी तरह का हो ले


जब तकलीफ़ बढ़े हद से तो बस तू एक दवाई ले

ताक पे रख दे सारी दुनिया और ज़रा सा तू सो ले


तुझको भी संतुष्टि मिलेगी, जब तू बढ़ता देखेगा

अपने आँगन में फूलों वाला एक पौधा गर बो ले


कभी किसी का होना चाहे कभी किसी से भाग रहा

गर पाना है ईश्वर को तो, केवल तू अपना हो ले


गज़ल समझ कर मत पढ़ना तुम मेरे इन अशआरों को

मैंने तो बस भाव लिखें हैं, तू भी इनके संग हो ले

मंगलवार, 2 अगस्त 2022

शज़र पीला, हुआ है क्या



नदी काली, जमीं नीली, शज़र पीला, हुआ है क्या

बिना रोए कभी तकिया कहो गीला हुआ है क्या


हमारी आँख में आँसू की जगह खून दिखता है

बताओ हादसा जीवन में कुछ ऐसा हुआ है क्या?? 


किशन ने खुद ही अपनी बाँसुरी राधा को दे दी है

किसी की बात का उन पर असर इतना हुआ है क्या?? 


लुटा बैठा है खुद ही लूटने वाला अजब ही है

ज़माने का चलन फिर आज कल उल्टा हुआ है क्या?? 


नदी ने आज पूछा है समन्दर से न जाने क्यों

मिलन भर से,ज़रा सा ही, वो कुछ मीठा हुआ है क्या?? 


रखा माँ बाप ने औलाद का जब नाम दीपक तो, 

उजाला घर के आँगन में कहो ज़्यादा हुआ है क्या?? 


तमन्ना रोज़ बढ़ती है मेरी नज़दीक आने की

जिसे सब इश्क़ कहते हैं, मुझे वैसा हुआ है क्या?? 


यकीनन इल्म है उसको कि बस अब रुख़्सती ही है

इसी वजह से उसके दिल में एक धड़का हुआ है क्या?? 


स्वधा को फ़िर किसी ने राधिका कह कर पुकारा है

बड़े अचरज में है कलयुग में फ़िर कान्हा हुआ है क्या?? 

सोमवार, 1 अगस्त 2022

बिरहन रो रही है



मुसलसल तेज बारिश हो रही थी, 

कहीं पर कोई बिरहन रो रही थी.. 


पिया को ढूँढने की चाह में नित

वो पगली ख़ुद को ख़ुद ही खो रही थी.. 


जिसे मारा था उसके हमनशीं ने

वो अपनी लाश ख़ुद ही ढो रही थी.... 


जिसे तुम पूछते हो क्या हुआ था

वो चोरी के समय पर सो रही थी.... 


बचाने के लिए अपनों का दामन

स्वधा फ़िर दाग़ उनके धो रही थी... 


शनिवार, 30 जुलाई 2022

किस दिशा में आज जाऊँ.......


सब नसें अब कट गयीं हैं

रक्त बाहर आ रहा है

प्राण मेरा किंतु अब तक बस तुम्हीं को गा रहा है

तुम बताओ किस तरह प्रिय आज मैं विश्राम पाऊँ

किस दिशा में आज जाऊँ....... 


इस कदर टूटन बढ़ी मैं ना स्वयं को रोक पाई

धार पर अपनी कलाई दे तुम्हारे लोक आई

अब नहीं है जिस्म बंधन, अब कभी भी मिल सकेंगे

अब तुम्हारे घाव सारे संग रह कर सिल सकेंगे

अब बताओ दायें बैठूँ या तुम्हारे बाएँ जाऊँ

तुम बताओ किस तरह प्रिय आज मैं विश्राम पाऊँ

किस दिशा में आज जाऊँ....... 


थी करी विनती बहुत, तुम साथ मेरा छोड़ना मत

जो ज़रा सा शेष है तुम वो भरोसा तोड़ना मत

किंतु तुमने प्रश्नवाचक चिन्ह हिस्से में दिये थे

प्रेम के बदले दुखद एहसास के किस्से दिये थे

सब किया तुम पर समर्पित अब कहो क्या और लाऊँ

तुम बताओ किस तरह प्रिय आज मैं विश्राम पाऊँ

किस दिशा में आज जाऊँ....... 


मैं नहीं हूँ जानती क्या पाप है क्या पुन्य होगा

ईश वाली उस बही में तुम मिले या शून्य होगा

किंतु इतना जानती हूँ मृत्यु सब कुछ शांत करती

घाव कैसे भी लगे हों, एक पल में कष्ट हरती

आओ हाथों में घड़ा ले और पहने तुम खड़ाऊँ

तुम बताओ किस तरह प्रिय आज मैं विश्राम पाऊँ

किस दिशा में आज जाऊँ....... 


मुक्त हो तुम अब तुम्हें कोई सताने आयेगा ना

याद की सांकल बजा कर अब कोई मुस्कायेगा ना

अब शिकायत को लिखे वो पत्र तुमको ना मिलेंगे

अब तुम्हारे और मेरे घर में सन्नाटे मिलेंगे

तुम चले जाना किसी शिवधाम गर मैं याद आऊँ 

तुम बताओ किस तरह प्रिय आज मैं विश्राम पाऊँ

किस दिशा में आज जाऊँ....... 





गुरुवार, 28 जुलाई 2022

हलधर



चार पत्तों से छिपाये 

घूमता है सर

आज फ़िर हलधर।। 


था किताबी ज्ञान से अनिभिज्ञ लेकिन

जिंदगी को पास से उसने पढ़ा था

शब्द के मोती पिरो कर हर दफा ही

भावना से काव्य ज़ेवर को गढ़ा था

वो हलाहल बीच से भी ले ही आता

फिर घटभ अपना अमिय से भर


आँधियों में,बारिशों में 

हो रहा है तर

आज फिर हलधर।। 


तन भले कृषकाय था लेकिन हृदय में

स्नेह की स्निग्ध गंगा बह रही थी

दूसरों के कष्ट भय दुख और विपदा

बिन कहे वो आत्मा ख़ुद सह रही थी

आग तो सारे विपिन मे ही लगी थी

पर जला वो जो गया भीतर


आंगनों की खोज करता

जबकि हिस्से में नहीं है घर

आज फिर हलधर।। 


उम्र के अंतिम पड़ावों में मिला है

वेदनाओं को सदा सम्मान सच है

झूठ सिंहासन पे बैठा हँस रहा है

सत्य लेकिन आज तक सबको अपच है

मान पाकर काव्य को फ़िर से मिला है

दीर्घ आयु वो रहे यह वर


होंठ पर मुस्कान धारे

दिख रहा जर्जर 

आज फिर हलधर।। 










बुधवार, 27 जुलाई 2022

मेरे दायित्व

 



तुम संभाल लेना मेरे दायित्व 

अगर जाकर ना लौटूँ।


तुम पर है विश्वास मुझे उतना ही जितना खुद पर भी है

तुमसे जीवन के रहस्य सब कह दूं इसकी जल्दी सी है।

जाने किन राहों पर जीवन की संध्या दस्तक दे जाए

इसीलिए बस तुझपर प्रेम लुटा देने की जल्दी सी है

तुम संभाल लेना मेरा विश्वास अगर मैं इसको खो दूँ, 


तुम संभाल लेना मेरे कर्तव्य

अगर जाकर न लौटूँ।


जग तो जग है, वो ही देगा, जो उसके हिस्से आया है

सीधी राहें चलने वाला राही भला किसे भाया है

काँटे उसके रस्ते में हैं, जिसने सदा फूल ही बाँटे

जिसने जिता दिया दुनिया को, उसके हिस्से में सब घाटे

तुम संभाल लेना गर मन के आँगन में मैं कांटे बो दूँ


तुम संभाल लेना मेरा सर्वस्व

अगर जा कर ना लौटूँ।


हृदय व्यथित है, डरा हुआ है,ज़िंदा दिखता, मरा हुआ है

मेरी मुस्कानों के पीछे जाने क्या क्या छुपा हुआ है

तुझे आज आतंकित मन से अपने आज मिला देती हूँ

तुझको खोने के डर से मिटती हूँ रोज़, बता देती हूँ

तुम संभाल लेना मेरा भय, अगर कभी डर कर मैं रो दूँ


तुम संभाल लेना अकथित ये प्रेम

अगर जा कर ना लौटूँ।


मंगलवार, 26 जुलाई 2022

 


🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤


जिनके बग़ैर जीने की हसरत कभी न थी

उनके बग़ैर दोस्त जिये जा रहा हूँ मैं


इतना गिरा दिया मुझे मेरे मयार से

अब खुद को भी पहचान नहीं पा रहा हूँ मैं... 


🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤


शनिवार, 23 जुलाई 2022



सोने का बिछुआ 

सोने की पायल पहने हो

ठकुराइन हो क्या?? यह प्रश्न सताता है... 

है समाज की दशा आज भी वैसी ही

उठा प्रश्न यह, केवल यह बतलाता है....... 


घर की देहरी पार नहीं कर पाती है

बूढ़ी काकी जिसकी चमड़ी काली है

लेकिन घूम रही है घर में आँगन में

जो गोरी है, दिल दिमाग़ से ख़ाली है

उसकी गोरी त्वचा देख दादी पूछे

जात धर्म से ऊँचे कुल की लगती हो


मिश्राइन हो क्या?? यह प्रश्न सताता है

है समाज की सभी व्याधियाँ वैसी ही

उठा प्रश्न यह, केवल यह बतलाता है....... 


रंग बिरंगे कपड़े पहन मटकती है

घर भर में घर की बिटिया पगलायी सी

और अलग पीछे वाले एक कमरे में

बैठी है विधवा रधिया घबराई सी

श्वेत वसन, भीगी आँखें, मुंडवाया सर

देख पूछते हैं उससे ये जग वाले


किसकी विधवा हो?? यह प्रश्न सताता है

है समाज में अब भी कुंठित एक वर्ग

उठा प्रश्न यह, केवल यह बतलाता है.......


घर के कामों को समेट, बच्चों का कर

एक लड़की जब घर से बाहर जाती है

अपने मन के कपड़े मन के संसाधन

से अपने को थोड़ा बहुत सजाती है। 

मुस्काती है, लोगों से बातें करके

तब सबकी आँखें यह प्रश्न उठाती हैं


नगर वधू हो क्या??यह प्रश्न सताता है

है समाज में पूर्वाग्रह अब तक हावी

उठा प्रश्न यह, केवल यह बतलाता है.......


सोने का बिछुआ 

सोने की पायल पहने हो

ठकुराइन हो क्या?? यह प्रश्न सताता है... 

है समाज की दशा आज भी वैसी ही

उठा प्रश्न यह, केवल यह बतलाता है....... 


शुक्रवार, 22 जुलाई 2022

देवरानी जेठानी




कभी ज़रा छोटी होती है कभी बड़ी सी बात

देवरानी जेठानी में तो ठनती दिन और रात...... 


दोनों चक्की के पाटों सी 

सारा दिन हैं चलतीं

रहे व्यवस्थित सब कुछ घर में 

इस ख़ातिर हैं गलतीं

बर्तन जैसी बज जाती जब पड़ता है आघात

देवरानी जेठानी में तो ठनती दिन और रात...... 


मयके आई ननदी के

सुलटाएं सभी झमेले

अम्मा के कड़वे तानों को

मुस्का करके झेलें

लेकिन विषम परिस्थिति मे भी, करती न प्रतिघात

देवरानी जेठानी में तो ठनती दिन और रात...... 


दोनों दो अँखियों के जैसी

एक ओर ही जाएँ

भले लड़ाई कितनी भी हो

संग खेलें मुस्काएं

आख़िर दोनों ने झेले है एक जैसे ही घात

देवरानी जेठानी में तो ठनती दिन और रात......


बड़ा अजब सा रिश्ता है ये

बड़ा अनोखा चित्र

दोनों एक दूजे की दुश्मन

दोनों पक्की मित्र

एक दूजे की समझें दोनों बिन बोले हर बात

देवरानी जेठानी में तो ठनती दिन और रात......




गुरुवार, 21 जुलाई 2022

बड़ी बहू



दोनों पैरों में पहने है

वो अपने पाजेब

बड़ी बहू सर पर धारे है

घर भर के आसेब......... 


चूल्हा चौका झाड़ू पोछा

सब उठ कर निपटाती

सबके उठने से पहले

पानी भी वो भर लाती

फ़िर भी ख़ुश ना सास हुई

और ना खुश हैं साहेब


बड़ी बहू सर पर धारे है

घर भर के आसेब.........


उत्सव में सबसे पहले 

सबको करती तैयार

ननदी को दे देती अपना 

सोने वाला हार

फ़िर भी सब ही मुँह बिचकाते

पहने देख करेब


बड़ी बहू सर पर धारे है

घर भर के आसेब.........


चक्र व्यूह घर के भीतर

घर वाले नया बनाते

नई परीक्षाएं धर देते

कितने खेल खिलाते

इस घर की वो नहीं

सोच कर करते संग फरेब


बड़ी बहू सर पर धारे है

घर भर के आसेब.........


नियति अभी तक ना बदली है

बाबा की गुड़िया की

दुःख की ढपली बजा रही है

जो सुख की पुड़िया थी

हँसी ख़ुशी छन कर निकली

थी फ़टी हुई हर जेब


बड़ी बहू सर पर धारे है

घर भर के आसेब.........


बुधवार, 20 जुलाई 2022

 




क्या कभी भूखी अंतड़ियों में उठी 

उस कुलबुलाहट से, कहीं परिचय हुआ है

क्या कभी उस जेठ वाली दोपहर की

गर्मियों में तुम तपे हो ,

क्या कभी उसको छुआ है

क्या कभी बाटा लिबर्टी छोड़ कर 

तपती सड़क पर तुम चले हो

क्या कभी तुम एक रोटी के लिए

दिन भर गले हो

यदि नहीं ये सब किया तो किस तरह दुत्कारते हो


एक रोटी के लिए जो रात दिन मरता है

बोलो क्यों उसे फटकारते हो।


क्या कभी भी उन परिस्थितियों से 

जूझे हो बताओ

क्या कभी देखी है शाश्वत भूख से लड़ती 

तुम्हारी एक पीढ़ी, 

कह सुनाओ

क्या तुम्हें मालूम है 

इस हाल में वे किस तरह हैं

क्या मिला उनको अगर पूछूँ , 

तो क्या यह भी जिरह है

क्या तुम्हें मालूम है 

अधनंग चमड़ी पर पड़ी

उस गर्द के जमने की गाथा

क्या कभी देखा है तुमने फिक्र

चिंता से भरा वह एक माथा

फिक्र है इस बात की

कि दिन तो बीता, 

रात में गुड़िया कहाँ पर सोयेगी

एक रोटी में उसे कितना मैं दे दूं , 

जिससे वो न रोयेगी

चार रुपयों में कहां से 

आएगी माँ की दवाई

और कैसे क्रीम लूंगा 

जिससे भरनी है बिवाई

लाडले ने कल कहा था 

मैथ की कॉपी खत्म है

कैसे उस बिन पढ़ सकेगा 

उसको केवल एक गम है

फिक्र की उन सीढ़ियों पर चढ़ रहा था

रोज जीता था मगर वो मर रहा था

क्या तुम्हें मालूम है ये , 

किस तरह तुम शब्द भेदी मारते हो


एक रोटी के लिए जो रात दिन मरता है

बोलो क्यों उसे फटकारते हो।


सोचते हो तुम कभी 

हर रात कैसे ये खुशी से झूमता है

पूरा दिन जो चिलचिलाती धूप में

चमड़ी जलाता, ईंट ढोता घूमता है

काम से थक हार कर

जो द्वंद खुद से कर रहा हैं

भाग्य रेखा पर उभर आई दरारें 

आज तक जो भर रहा हैं

क्या तुम्हें मालूम है ये

वह कभी चुनता न यह पथ

गर न स्थितियों ने काटे 

होते उसके स्वप्न के रथ

गर अकेले बैठ रख कर हाथ 

उसके हाथ पर पूछोगे उससे

वह नहीं बोलेगा उसकी छलछलाती

आँख तब पूछेगी तुमसे

क्या तुम्हें मालूम है ये किस तरह 

अवहेलना के बाण उसको मारते हो


एक रोटी के लिए जो रात दिन मरता है

बोलो क्यों उसे फटकारते हो।


हो अगर मानव तो मानव धर्म समझो

कर्म छोटा न बड़ा यह मर्म समझो

बांटना होता तो ईश्वर बाँट देता

तुमको नीला उसको पीला रक्त देता

एक के हिस्से सकल सुख आये होते

एक के हिस्से में होती वेदनायें

पर ज़रा सोचो ख़ुदा ने इस तरह के

भेद करते नियम क्या हैं बनाए

उसने मोती, भाव वाले हर हृदय में हैं संजोये

फिर भला तू सीपियों को देख 

क्यों मन को डुबोये

यदि मनुज का धर्म तुमको है पता तो

क्यों नहीं एक दूसरे को तारते हो


एक रोटी के लिए जो रात दिन मरता है

बोलो क्यों उसे फटकारते हो।




सोमवार, 18 जुलाई 2022

एक प्रयास



 जो मन में आ गया वही करते रहे हैं हम

बस इसलिए जहान को खलते रहे हैं हम।। 

 

जिनको नहीं था मेरी लगावट का मोल कुछ

उनके लिए ही आग में जलते रहे हैं हम।। 


मंज़िल का कुछ पता था न रस्तों की थी ख़बर

जिस ओर वो दिखे वहीं चलते रहे हैं हम।। 


गिरगिट का डर नहीं है न सांपों का खौफ़ है

बस कुछ सफ़ेद पोशों से डरते रहे हैं हम।। 


सागर मथा गया तभी अमृत पिये सभी

बस विष से अपने आप को भरते रहे हैं हम।। 


तुमने भी अपनी हमपे उठाई है उंगलियां

फ़िर उसके बाद ख़ुद से भी डरते रहे हैं हम।। 


संदीपनी के कहने पे कान्हा चले गए

दीवानगी में राधा से, मरते रहे हैं हम।। 


स्वधा कहा तुम्ही ने चलो सीधी राहपर

बस इसलिए ही प्यादों पे मरते रहे हैं हम।।